मधुसूदन सरस्वती सोलहवीं शती के महान् दार्शनिक, सन्त तथा कवि हैं। अद्वैतसिद्धि, प्रस्थानभेद, भगवद्गीताटीका, महिम्नस्तवटीका, सिद्धान्तबिन्दुटीका तथा भक्तिरसायन आदि इनके प्रबन्ध प्रख्यात हैं। ‘आनन्दमन्दाकिनी २ इनकी स्तोत्रसाहित्य को अमर देन है, वस्तुतः इस काव्य में संस्कृत की स्तोत्रकविता साहित्य के सर्वोच्च तथा परम भास्वर शिखर पर विराजमान हुई है। १०२ पद्यों में शार्दूलविक्रीडित छन्द में निबद्ध इस स्तोत्र में मधुसूदन सरस्वती ने सौन्दर्य, भक्ति, श्रृंगार, वात्सल्य और माधुर्य के अद्भुत संसार की रचना करते हुए श्रीकृष्ण की स्तुति की है। श्रीकृष्ण का नखशिख, बाललीलाएं, रासकेलि आदि के वर्णन में कवि ने रसावेशवैशद्यमय चित्त तथा भावैकतानता के साथ दर्शन, अध्यात्म और साधना की त्रिवेणी संगमित कर दी है। शंकराचार्य की सौन्दर्यलहरी के समान नवीन कल्पनाओं और अलंकारों के सहज सन्निवेश ने इस स्तोत्र की चित्ताकर्षकता को और अधिक बढ़ा दिया है। कृष्ण को सम्बोधित करते हुए कवि कहता है -काना सौन्दर्यामृतदीर्घिके तव दृशौ पक्ष्मावलिश्चैतयोः कूले कामकृषीवलेन रचिता शृङ्गारसस्योन्नतिः। गाँध निकाय ए दृग्भङ्गीर्निगदन्ति यास्तु विबुधा रत्यम्भसां वीचयस्- की। E SPREM ताः स्युर्गोपवधूहृदम्बुजवनीदोलायिता यत्नतः।। (११) का फिशी पर (हे कृष्ण, आपकी आँखें सौन्दर्यरूपी अमृत से भरी दो बावड़ियाँ हैं। जिनके किनारे काम रूपी कृषक ने श्रृगार की फसल उगा रखी है। जिन्हें विद्वज्जन तुम्हारे नेत्रों की भंगिमाएं कहते हैं, वे रतिजल की लहरें हैं, जो गोपवधुओं के हृदयरूपी कमल वनों में दोलायित होती रहती हैं। भक्ति के साथ दार्शनिक अवधारणाओं का प्रतिपादन करते हुए कवि ने श्रीकृष्ण को अनादि और अनन्त परब्रह्म के रूप में भी देखा है और मानव के रूप में भी। निर्गुण और निराकार से साकार सगुण रूप में परिणति के सोपानों का उन्मीलन भी मधुसूदन सरस्वती ने कविदृष्टि से किया है १. काव्यमाला गुच्छक १० में प्रकाशित । २. काव्यमाला, द्वितीय गुच्छक में प्रकाशित का गलत है सनीय मानवारिता काव्य-खण्ड सृष्ट्यादौ प्रकृतिर्गुणत्रयमयी या स्वीकृतासीत त्वया कर सेयं सत्त्वमयी सुखाय जगतां हाराकतिस्ते भवि। IRRIER TO की कि गुञ्जादाममिषान्मुकुन्द दधती राणाद् रजोविग्रह नाभीसीम्नि तमोमयी पुनरियं रोमावली राजते।। (४१) हे मुकुन्द, सृष्टि के आरम्भ में आपने जिस गुणत्रयमयी प्रकृति को अंगीकार किया था, वही सत्त्वमय रूप में सारे जग को सुख देने वाली आपके हार की आकृति बनकर कण्ठ में विराजमान है, और गुञ्जा (घुघचियों) के व्याज से वह राग से रंग कर रजोगुणमिश्रित हो जाती है तथा नाभी की सीमा में वही तमोमय रोमावली के रूप में विराजमान है। ही श्रीकृष्ण में परम सौन्दर्य का साक्षात्कार करता हुआ कवि इसके आगे कहता है कि सौन्दर्यरूपी अमृतसागर में कामदेवरूपी जलजीव के तिरने-उतराने से जो लहरें बनीं, चमकते इन्द्रनील की कान्ति से युक्त लक्ष्मी से संपुटित उनमें तीन वीचियां ही आपके उदर में वलित्रय के रूप में विराजमान हैं (४२)। राणा आनन्दमन्दाकिनी में कवि श्रीकृष्ण के बाल्य पर विशेष मुग्ध है। वात्सल्य का अपूर्व उद्रेक बाललीलाओं के प्रसंग में भक्ति के साथ-साथ हुआ है। यशोदा के लिये कथन है का पति पिकली निक धूलीधुसरितं मुखं तव शरत्पूर्णेन्दुनिन्दावहं. HEFTE व्यालोलालक कुण्डलद्युति चलनेत्रश्रिया प्रोल्लसत्। याऽऽलोक्याईविलोचना स्मितमुखी प्रस्यन्दमानस्तनी पाणिभ्यामवलम्ब्य चुम्बितवती तां नन्दजायां भजे।। (६३) (हे कृष्ण, शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा की निन्दा कराने वाले तुम्हारे छितरायी अलकों और हिलते कुण्डलों से आलोकित चंचल नेत्रों की कान्ति से उल्लसित तथा धूलि में लिपटे मुख को देख कर मुस्कुराती हुई आईनयन वाली, प्रस्यन्दमान वक्ष वाली उस मुख को दोनों हाथों में भर कर चूमती यशोदा की मैं भक्ति करता हूँ। संक्षेप में आनन्दमन्दाकिनी स्तोत्र साहित्य की सभी विशेषताओं का उज्ज्वल निदर्शन है, भक्ति और समर्पण, चिन्तन और दर्शन, श्रृंगार और माधुर्य, राग और निर्वेद सभी का उदात्त समवाय इसमें है।