२३ नारायणीय

श्रीमद्भागवतपुराण को आधार मानकर नारायण भट्ट ने ‘नारायणीय’ काव्य की रचना की है। इसमें १०३६ पद्य हैं जो शतात्मक दशकों में बँटा है। यह ग्रन्थ इतना उत्तम है कि आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इसे ‘नारायण भट्ट की काव्य प्रतिभा का मेरुदण्ड’ कहा है। केरल के स्तोत्र साहित्य में नारायणीय का उच्च स्थान है। कि नारायणीय के कतिपय पद्य यहाँ इसके महत्त्व को जानने के लिए प्रस्तुत हैं - रास में न जाने वाली गोपिका को विचार मात्र से कैसे मोक्ष मिला - (B) काश्चिद् गृहात् किल निरेतुमपारयन्त्य स्त्वामेव देव! हृदये सुदृढ़ विभाव्य । देहं विधूय परिचित-सुखरूपमेकं त्वामाविशन् परमिमा ननु धन्यधन्याः।। वैकुण्ठ का यह वर्णन वास्तव में सुन्दर बन पड़ा है - माया यत्र कदापि नो विकुरुते भाते जगद्भ्यो बहिः नगमा शोकक्रोधविमोहसाध्वसमुखा भावस्तु दूरं गताः।। सान्द्रानन्दझटी च यत्र परमज्योतिः प्रकाशात्मक तत् ते धाम विभावितं विजयते वैकुण्ठरूपं विभो।। और पूतना के चरित की एक झलक यों है - ललितभावविलासहृतात्मभिर्युवतिभिः प्रतिरोद्धुमपारिता। मसामना . स्तनमसौ भवनान्तनिसेदुषी प्रददुषी भवने कपटात्मने।। सम्पूर्ण रूप में नारायण भट्ट एक श्रेष्ठ कवि हैं तथा उनका नारायणीय भारतीय वाङ्मय का एक जाज्वल्यमान रत्न है। नारायण भट्टरचित ‘नारायणीय’ काव्य की रचना १५६० ई. में समाप्त हुई। ‘मानमेयोदय’ मीमांसा का ग्रन्थ है। इसके एक भाग (मान की इन्होंने रचना की है।) प्रक्रियासर्वस्व व्याकरण का ग्रन्थ है। उत्तर भारत में भट्टोजि दीक्षित की सिद्धान्तकौमुदी का जो स्थान है, दक्षिण भारत में वही स्थान प्रक्रियासर्वस्व का है। यह ग्रन्थ कई खण्डों में १. कोटिबिरहम का परिचय अगले अध्याय में दिया गया है। २. डॉ. डे ने इसका रचनाकाल १५८५ ई. माना है (हिस्ट्री आफ संस्कृत लिटरेचर डे तथा दासगुप्त, पृ. ३८२) ४१७ स्तोत्रकाव्य प्रकाशित है। ‘धातुकाव्य" में १६४४ धातुओं का प्रयोग किया गया है। इस काव्य में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है। यह ग्रन्थ नारायण भट्ट के वैयाकरणत्व का पर्याप्त सूचक है। इसके अतिरिक्त नारायण भट्ट के प्रबन्धकाव्य (चम्पूकाव्य) चाक्यारों (केरल के नाटक के अभिनय करने वाले) के उपयोग के लिए प्रणीत है। इस प्रकार नारायण भट्ट व्याकरण तथा साहित्य- दोनों के प्रकाण्ड पण्डित थे। इनका समय १६वीं शती का उत्तरार्ध तथा १७वीं शती का आरम्भ है।लिए शिमला की कणा में मार पाए । F कीमाः ति का मालिक समिा का काम