२२ नारायण भट्ट

नारायण भट्ट का समय १६वीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जाता है। भट्ट जी मेप्पुत्तूर नामक मठ, निकट तिरुनावा मन्दिर, नीलनदी उत्तर तट (केरल) के निवासी थे। इनके पिता का नाम मातृदत्त था तथा ये ब्राह्मण परिवार से थे। ये अम्बलुप्पल के नरेश देवनारायण के सभा पण्डित थे तथा इन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की। वायुरोगाक्रान्त होने से इन्होंने गुरुवायूर मन्दिर में भगवान् श्रीकृष्ण की विशाल स्तोत्र ‘नारायणीयम्’ के माध्यम से वन्दना की, ऐसी जनश्रुति है। आपकी कृतियों के नाम इस प्रकार है- १. नारायणीयम्, २. मानमेयोदय, ३, प्रक्रियासर्वस्व, ४, धातुकाव्य, ५. अष्टमीचम्पूकाव्य, ६. कैलासशैलवर्णना, ७. कौन्तेयाष्टक, ८. अहल्याशापमोक्ष, ६. पुष्पोभेद, १०. शूर्पणखाप्रलाप, ११. रामकथा, १२. दूतवाक्यप्रबन्ध, १३. नालायनीचरित, १४. नृगमोक्षप्रबन्ध, BHAIR P १. बालकतेवटपलाशमितस्य यस्य ब्रह्माण्डमण्डलममददरैकदेशे। E PERIE तस्यैव तद् वरद हन्त कथं प्रभूतं वाराहमास्थितवतो वपुरद्भुतं ते॥ भत्तास्य दानवशिशोः परिपालनाय भद्रा नृसिंहकुहनामधिजग्मुषस्ते। स्तम्भकवर्जमधुनापि करीश नूनं त्रैलोक्यमेतदखिलं नरसिंहगर्भम् ।। कामं जगत्कपटपाटवतामुपेतं त्रैधा करीश स भवन्निदधे पदानि। अद्यापि जन्तब इमे विमलेन यस्य पादोदकेन विघृतेन शिवा भवन्ति ।। येनाचलाप्रकृतिना रिपुसंक्षयार्थ वारानिधि वरद पूर्वमलंघयस्त्वम्। = तं वीक्ष्य सेतुमधुनापि शरीरवन्तः सर्वे षडूमिबहुल जलधि तरन्ति ।। राजपाक मारा । (वरदराजपञ्चाशत २२-३५) ही गार किती। काव्य-खण्ड १५. राजसूयप्रबन्ध, १६. सुभद्राहरणप्रबन्ध, १७. स्वाहासुधाकर, १८. कोटिबिरह।।