२० पादुकासहस्र

यह स्तोत्र वेदान्तदेशिक का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं चिरपरिचित स्तोत्र है। भगवान् रघुनाथ की पादुकाओं की प्रशस्ति में लिखित यह काव्य ३२ पद्धतियों में बंटा हुआ है। पद्धतियों में प्रसिद्ध नाम हैं - १. प्रस्तावपद्धति, ३. समाख्यापद्धति, ३. समर्पणपद्धति, ४: नादपद्धति, ५. चित्रपद्धति। श्री भगवान् की पादुका के चालन का प्रभाव इस पद्य में अवलोकनीय है - वृद्धिं गवां जनयितुं भजता विहारान् कृष्णेन रङ्गरसिकेन कृताश्रयायाः। सञ्चारतस्तव तदा मणिपादरक्षे वृन्दावनं सपदि नन्दनतुल्यमासीत् ।। । काव्यमाला गु.-१, पृ.१ स्तोत्रकाव्य ४१५ यह स्तोत्र उत्तम काव्य गुणों से ओतप्रोत है। भक्ति और दर्शन के तथ्यों को इसमें सुन्दर रीति से प्रस्तुत किया गया है। विभित्र चित्रालङ्कारों का प्रयोग इसे चित्रात्मक एवं मधुर बना देता है। यह एक रसोपेत कृति है।