१८ राघवचैतन्यकृत महागणपतिस्तोत्र

गणपतिस्तोत्रों में राघवचैतन्य का यह स्तोत्र सर्वप्रमुख कहा जा सकता है। स्तोत्र की पुष्पिका में राघवचैतन्य को परमहंस परिव्राजकाचार्य कहा गया है। काव्यमालासम्पादक के अनुसार ये शा घरपद्धति के संकलयिता शानघर के पूर्ववर्ती हैं, क्योंकि शाघर ने राघवचैतन्य के नाम से कतिपय पद्य अपने संग्रह में उद्धृत किये हैं। शानघर के पितामह राघवदेव हम्मीर चौहान की राजसभा में थे, इन्हीं का नाम संन्यस्त होने पर राघवचैतन्यकाव्य-गाण्ड प्रसिद्ध हुआ- यह भी अनुमान है। ’ हम्मीर की मृत्यु वि.सं. १३५२ (१२६५ ई.) में हुई। तदनुसार राघवचैतन्य का समय इसके पूर्व माना जा सकता है। _महागणपतिस्तोत्र पर राघवचैतन्य के शिष्य की टीका मिलती है, पर टीकाकार ने अपना नाम निर्दिष्ट नहीं किया है। महागणपतिस्तोत्र में १६ शार्दूलविक्रीडित श्लोक हैं जिनमें आदिदेव गणेश की सुन्दर वन्दना की गई है। गणपतितन्त्र का भी यह आगमग्रन्थ है - कल्लोलाञ्चलचुम्बिताम्बुदतताविक्षुद्रवाम्भोनिधी मारक द्वीपे रत्नमये सुरद्रुमवनामोदैकभेदस्विनी ।। शिल मूले कल्पतरो महामणिमये पीठे ऽक्षराम्भोरुहे षट्कोणाकलितत्रिकोणरचना सत्कर्णिकेऽमुं भजे।। (३) (षट्कोणयुक्त त्रिकोणकर्णिकामय अक्षमोतृको-कमल महागणपति का मैं भजन करता हूँ, जो लहरों से चुम्बित मेघमय इक्षुद्रव के सागर में, रत्नमयद्वीप में कल्पतरु से सुवासित कानन में कल्पतरु के मूल में निर्मित महामणिमय पीठ पर आसीन हैं।) पूरा पूर्वार्ध केवल एक विशेषण में ही यहाँ समेट लिया गया है। निश्चय ही गणपति के विग्रह के अनुरुप यह गाठबन्ध का उत्तम निर्वाह है।