१३ आलबन्दारस्तोत्रम् (स्तोत्ररत्न)

यामुनाचार्यरचित ‘आलबन्दार-स्तोत्र’ में ६६ पद्य हैं। भगवान् के सम्मुख दीनभाव के साथ समर्पण और निष्ठा की मार्मिक अभिव्यक्ति दी है - बिहान तवामृतस्यन्दिनि पादपङ्कजे निवेशितात्मा कथमन्यदिच्छति। काली काही स्थिरेऽरविन्दे मकरन्दनिर्भरे मधुव्रतो नेक्षुरसं समीहते ।। आरती १. संस्कृत साहित्य का इतिहास-या. गरोला (१७८५ ई.) पृ. ७७८) RITES २. वही, पृ. वहीं मा ४०६ काव्य-खण्ड हे भगवन! मेरा चित्त आपके अमृतरस चुवाने वाले पद-पद्मों में रम गया है। भला अब वह किसी दूसरी वस्तु को क्यों चाहेगा? पुष्परस से भरे हुए कमल की उपस्थिति में क्या भौंरा ताल-मखाने के फूल को देखता है? उसे चखने की अत्यल्प भी इच्छा क्या उसके मन में जागती है। भगवान् की खोज में व्याकुल कवि की यह अनुप्रास उक्ति कितनी मनोहर एवं मनोरम कः श्रीः श्रियः परमसत्त्वसमाश्रयःकः गणना गर कः पुण्डरीकनयनः पुरुषोत्तमः कः। कस्यायतायतशतैककलांशकांशेय विश्वं विचित्रचिदचित्पविभागवृत्तम् ।। स्तोत्र का अन्तिम पद्य इस प्रकार है - यत्पदाम्भोरुहथ्यानविध्वस्ताशेषकल्मषः। वस्तुनामुपयानोऽहं यामुनेयं नमामि तम्।। सम्पूर्ण रूप में ‘आलबन्दार-स्तोत्र की सुषमा वैभवशालिनी है, अतः भक्तगण इसे ‘स्तोत्र-रत्न’ के नाम से अभिहित करते हैं।