०२ लङ्केश्वर के स्तोत्र

दुर्वासा की ही भाँति लकेश्वर का भी वास्तविक अभिज्ञान तथा देशकालनिर्णय कठिन है। लड्केश्वर के नाम से प्राप्त शिवस्तुति (पृथ्वी छन्द में १० पद्य) तथा रावण के नाम से प्राप्त शिवताण्डवस्तोत्र । (पञ्चचामर छन्द में १५ पद्य) दोनों में ओजस्विता, प्रगाढबन्ध और पदों की नृत्यत्प्रायता अपूर्व है। शौर्य और पराक्रम की अभिव्यञ्जना करने वाली फड़कती हुई पदावली के ऐसे सटीक प्रयोग के कारण ही कदाचित् लकेश्वर या रावण का कर्तृत्व इन दोनों स्तोत्रों के साथ जुड़ा होगा। छाया में काम का “शिवस्तुतिः’ का पाँचवां पद्य अप्पय दीक्षित ने कुवलयानन्द में अनुज्ञा अलंकार के उदाहरण में उद्धृत किया है। कुवलयानन्द में उद्धृत होने के कारण स्तोत्र का रचनाकाल अप्पय दीक्षित (१६वीं शती) से पूर्ववर्ती होगा, इसमें सन्देह नहीं। इस स्तोत्र में निर्वेद के भाव की मार्मिक अभिव्यक्ति के साथ शिवभक्ति प्रकट की गयी है। व्यास-शैली का चमत्कार तथा वक्रोक्ति की विच्छित्ति का भी रमणीय संयोग इसमें हुआ है। चन्द्रमा को माथे पर धारण करने वाले शिव के लिये ‘कुमुद्वतीरमणखण्डचूडामणि’ तथा गजाजिन धारण करने के कारण उनके लिये ‘कटीतटपटीभवत्करटिचर्म’ जैसे विशेषणों का प्रयोग भाषाशैली के परिष्कार का परिचायक है। विद्युन्नटी के अनुकरण में पट कमलालय या लक्ष्मी के विलास को त्याग कर परब्रह्मस्वरूप शिव में रमने की कामना करता हुआ स्तोत्रकार कहता है - किस उम्र मकान - विहाय कमलालयाविलसितानि विद्युनटा- माय सिविडम्बनपट्टान म विहरण विधत्ता मनःनि कम कीमा IT कपर्दिनि कुमुद्वतीरमणखण्डचूडामणी विवाह जोपासा कटीतटपटीभवत्करटिचर्मणि ब्रह्मणि।। (४) मा कि मि शिवताण्डवस्तोत्र में गौडीरीति तथा ओजोगुण का निर्वाह भी अप्रतिम है। भक्तिभाव की गहनता, गेयता और अनुप्रासमयता के कारण यह स्तोत्र लोकप्रिय भी रहा है। अनुरणनमूलक पदावली के प्रयोग ने इसके आकर्षण और सौन्दर्य को और भी चमका दिया है। यथा-आरम्भ का ही पद्य देखिये - hणी कीमत जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-काम ण विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि । धगद्धगद्धगज्ज्वल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ।।