इस महाकाव्य के प्रणेता मुनि पुण्यकुशल हैं, उन्होंने प्रत्येक सर्ग की पुष्पिका में अपना नाम पुण्योदय दिया है, और महाकाव्य के अन्त की पुष्पिका में पुण्यकुशल तथा पुण्योदय को पर्याय सूचित किया गया है। की माया पुण्यकुशल तपोगच्छ के मुनि विजयसेनसूरि के प्रशिष्य तथा सौमकुशलगणि के शिष्य थे। इस महाकाव्य की रचना संवत् १६५२ से १६५६ के बीच हुई थी। एक नि विषयवस्तु : इस महाकाव्य में भरत तथा बाहुबलि नामक दो राजाओं के पारस्परिक संघर्ष तथा अन्त में धर्मदीक्षा लेने का वृत्तान्त है। भरत अग्रज है। वह बाहुबलि का अपना अधीनस्थ बनाना चाहता है। बाहुबलि भी युद्ध के लिये तैयार हो जाता है। दोनों में भयंकर । युद्ध होता है। देवगण रक्तपात बचाने के लिए दोनों को केवल परस्पर द्वन्द्वयुद्ध करने के लिये प्रोत्साहित करते हैं। भरत बाहुबलि पर चक्र चलाता है, जो बाहुबलि का स्पर्श किये बिना ही लौट आता है। बाहुबलि उस चक्र को चूर्णित करने के लिए मुष्टिप्रहार करने को होता है, तो उसके मुष्टिप्रहार से तीनों लोकों के ध्वस्त हो जाने की आशंका से डर कर देवगण उसे रोकते हैं। बाहुबलि अपनी उसी मुष्टि से केशलुंचन कर के मुनि बन जाता है। भरत भी उसके आचरण से प्रभावित होकर उस अपने अनुज को प्रणाम कर के तथा उसके पत्र को तक्षशिला के राज्य पर अभिषिक्त करके अपने राज्य अयोध्या लौट आता है। फिर उसके हृदय में भी वैराग्य उत्पन्न हो जाता है और वह संन्यास ले कर निर्वाण प्राप्त करता है। वर्णन : इस महाकाव्य में प्रारम्भ में तक्षशिला की समृद्धि तथा बाहुबलि की राजसभा का प्रभावशाली वर्णन है। दौत्य, सैन्यप्रयाण, शरदृतु तथा राजमहिषियों का अलंकरण (सर्ग-५), सैन्यनिवेश, जलकेलि, सन्ध्या, चन्द्रोदय, सुरत, सूर्योदय (सर्ग ६-८),चैत्यालय में जिनस्तुति (सर्ग-१०), सैन्यप्रोत्साहन (सर्ग-१२) तथा युद्ध (सर्ग-१४-१५) और द्वन्द्वयुद्ध (सर्ग-१७) आदि प्रमुख वर्ण्य विषय हैं। मामिल निशान । कथा-स्रोत : भरत तथा बाहुबलि की कथा जिनसेन के आदिपुराण (नवम शती) तथा हेमचन्द्र के त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित में दिगम्बर तथा श्वेताम्बर परम्पराओं के अनुसार वर्णित है। ये दोनों ग्रन्थ इस महाकाव्य के लिये उपजीव्य प्रतीत होते हैं। रसयोजना : शान्तरस का इस महाकाव्य में प्राधान्य है, पर उसके साथ वीररस का पुष्ट परिपाक हुआ है। युद्ध का वर्णन बड़ा ओजस्वी है। कवि कहता है कि युद्ध वीरों का उत्सव है, जो कायर में भी ओजस् का संचार कर देता है। वसुधा उस वीर के लिये विहार का उत्संग बन जाती है - हठाद् रिपूणां वसुधा विशेषात् कान्ता मृगाक्षीव सुखाय पुंसाम्। उत्सङ्गमेते सममुत्सवे हि किं कातरत्वं विदधाति धीरः।। ६।६२ जैन-महाकाव्य तथा चरितकाव्य ३८६ मा वीररस के साथ-साथ शृङ्गार का भी निवेश कवि ने यथास्थल किया है, तथा सम्भोग के साथ ही विप्रलम्भ का भी निरूपण इस महाकाव्य में मिलता है। अपनी प्रिया से युद्धप्रयाण के अवसर पर विदा लेते सैनिक का चित्र है - वियोगदीनाक्षमवेक्ष्य वक्त्रं तदेव कस्याश्चन सङ्गराय। वाष्पाम्बुपूर्णाक्षयुगः स्वसौधान्नम्राननः कोऽपि भटो जगाम। (६७) (अपनी प्रिया को वियोग से दीन वदन देखकर आंसू से डबडबाये नयनों वाला सैनिक मुख झुकाये अपने भवन से बाहर निकला।) ही, इस महाकाव्य में छन्दोयोजना में वैविध्य है, कुल उन्नीस प्रकार के छन्द प्रयुक्त हुए हैं।