१७ यदुसुन्दरमहाकाव्य

कवि और रचनाकाल
यदुसुन्दरमहाकाव्य के प्रणेता पद्मसुन्दर हैं, जो श्वेताम्बर सम्प्रदाय के तपागच्छ से सम्बन्धित विद्वान थे। मुगलसम्नाट अकबर से घनिष्ठ रूप से । सम्बन्धित थे। पद्मसुन्दर सं. १६३७-३८ (सन् १५८०-८१) के आस-पास दिवङ्गत हुए थे। इनके माता-पिता के सम्बन्ध में कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती है। यदुसुन्दर के रचना-काल का कोई सकेत उपलब्ध नही है। डॉ. सत्यव्रत ने इसकी रचना सन् १६३२ | से १६३८ के मध्य माना है।" । यदुसुन्दरमहाकाव्यों में मथुराधिपति यदुराज समुद्रविजय के अनुज वसुदेव तथा * विद्याधर सुन्दरी कनका के विवाह तथा विवाहोपरान्त केलियों का वर्णन है। इस महाकाव्य पर श्रीहर्षरचित नैषधचरित का पूर्ण प्रभाव परिलक्षित होता है। बारह सर्गों में उपनिबद्ध इसकी कथावस्तु इस प्रकार है - गाय प्रथम सर्ग में मथुरा नगरी के वर्णन के पश्चात् यदु के उत्तराधिकारियों में कंस को साक्षात् राक्षस माना गया है। नगरवासी, पौरागनाओं के प्रति वसुदेव के अविनम्र व्यवहार की शिकायत उसके अग्रज समुद्रविजय से करते हैं। अग्रज की भर्त्सना से रुष्ट वसुदेव देश छोड़कर विद्याधरों की नगरी में शरण लेता है। द्वितीय सर्ग में एक हंस, कनका के महल में आकर वसुदेव के गुणों की प्रशंसा करता है। वसुदेव का चित्र देखकर कनका उस पर अनुरक्त हो जाती है। हंस मनोरथपूर्ति हेतु वचन देता है। विरहयुक्ता कनका को वसुदेव दिखाई पड़ता है और वह भी कनका को देखकर पुलकित हो जाता है। तृतीय सर्ग में सर्व प्रथम कनका के वियोग का वर्णन है, तदनन्तर, धनपति कुबेर वसुदेव को दूत बनाकर कनका के पास अपना प्रणय-प्रस्ताव भेजते हैं। वसुदेव अदृश्य रूप में अन्तःपुर पहुँच जाता है। दूत कनका से कुबेर को वरण करने की वार्ता करता है। कनका की सखी कहती है ५. डॉ. सत्यवत, जैन संस्कृत महाकाव्य, पृ. १०३ २. यह अभी तक अप्रकाशित है। हस्तलिखित प्रति एल.डी. इन्स्टीच्यूट, अहमदाबाद में है। जैन-महाकाव्य तथा चरितकाव्य कि वह वसुदेव के अतिरिक्त किसी को वरण नहीं कर सकती। कनका के अनुराग को देखकर दूत अपना परिचय देता है। कनका वसुदेव को देखकर लज्जित हो जाती है। वसुदेव कुबेर के पास आकर वास्तविकता से अवगत कराता है। चतुर्थ सर्ग में कनका का स्वयंवर होता है, जिसमें देवता और प्रतापी राजागण आदि आते हैं। वसुदेव कुबेर की अंगूठी धारण करने के कारण अदृश्य दिखाई पड़ता है। वेत्रधारिणी सर्वप्रथम कनका को देवताओं की सभा में ले जाती है और राजाओं का क्रमिक परिचय देती है। पञ्चम सर्ग में भी राजाओं का परिचय कराया जाता है। षष्ठ सर्ग में अंगूठी उतारने से वसुदेव का वास्तविक स्वरूप प्रकट हो जाता है और कनका उसका वरण करती है। सप्तम सर्ग में विवाह का वर्णन है। । अष्टम सर्ग में विवाहोपरान्त प्रीतिभोज तथा विदाई और नवम सर्ग में षड्ऋतु वर्णन है। दशम सर्ग में अरिष्टपुर की राजकुमारी रोहिणी, स्वयंवर में, विद्याबल से प्रच्छन्न वसुदेव का वरण करती है, जिससे अन्य राजाओं और वसुदेव में युद्धारम्भ, प्रतिद्वन्द्वी राजाओं की पराजय, समुद्रविजय, गुप्त वसुदेव को ललकारता है, बन्दीजनों से वसुदेव की वास्तविकता जानकर वह प्रसन्न होता है। ग्यारहवें सर्ग में नवदम्पती के मथुरा आगमन एवं सम्भोग-क्रीडा का वर्णन है। बारहवें सर्ग में सन्ध्या, चन्द्रोदय एवं प्रभात के परम्परागत वर्णन के साथ काव्य-समापन होता है। - THE 12 यदुसुन्दर महाकाव्य का अगीरस श्रृङ्गार है। कनका की विरहजन्य क्षीणता के वर्णन में कल्पनाओं की अतिशयता से उसकी व्यथा का लेशमात्र भी अनुभव नहीं हो पाता है। दशम सर्ग के युद्ध-वर्णन में वीर रस का सफल चित्रण नहीं हो सका हैं। महाकाव्य में प्रकृति-चित्रण अत्यन्त सजीव है। शिशिरकालीन दृश्य का वर्णन करते हुए कवि कहता कि शिक्षाका एमाला निर्माणा जिागर मेला -1 इह नहि मिहिकांशुदृश्यत छादित स्म- पकि । जो एन्नभसि मिहिकयाभ्रनान्तिबाधां दधत्या। गायकीमाती अहनि मिहिरबिम्बोद्दामधामापि लुप्तं क मा -) भज निजभुजबन्धं शैशिरा वान्ति वाताः।।’ महाकाव्य में वसुदेव और कनका दो ही प्रमुख पात्र हैं। क्रमशः नायक और नायिका के रूप में इनके चरित्राकन में कवि को महत्त्वपूर्ण सफलता मिली है। अलङ्कारों के प्रयोग से यत्र-तत्र भाषा में दुरूहता आ गयी है - जमा किी कि सारं गता तरलतारतरासारा सारङ्गता तरलतारतरङ्गसारा। सारं गता तरलतारतरङ्गसारा सारं गता तरलतारतरङ्मसारा।।' JETTE १. यदुसुन्दर, ६/६७ २. यदुसुन्दर, ६/५ोका कार को झी किार व ३८८ र काव्य-खण्ड -