१६ जम्बूस्वामिचरित

कवि और रचनाकाल : दिगम्बर सम्प्रदाय के कवि राजमल्ल, जम्बूस्वामिचरित काव्य के रचयिता हैं। वे जैनागम के महान् वेत्ता तथा प्रौढ़ पण्डित थे। वे काष्ठासंघी विद्वान् थे। उन्होंने अपने को हेमचन्द का आम्नायी कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि वे मुनि नहीं थे। सम्भवतः, वे गृहस्थाचार्य थे अथवा ब्रह्मचारी आदि पद पर प्रतिष्ठित थे। १. यशोधरचरित, ७/१५७-१८ २. वही, २/४५ ३. लाटीसंहिता की भूमिका, पृ. २३ दिन का काम किया जा जैन-महाकाव्य तथा चरितकाव्य जम्बूस्वामिचरित काव्य की रचना सं. १६३२ की चैत्र, कृष्णा, अष्टमी को मुगल सम्राट अकबर के राज्य-काल में हुई थी। 11 साल जिम्बूस्वामिचरित राजमल्ल की महत्त्वपूर्ण रचना है। विषय-साम्य होने पर भी ब्रह्मजिनदासरचित जम्बूस्वामिचरित से प्रस्तुत काव्य में कवित्व तथा कथा-संयोजन की दृष्टि से पर्याप्त अन्तर है। यह पौराणिक शैली में लिखा गया काव्य है, जिसका कथानक जैन-धर्म के दोनों सम्प्रदायों में सुप्रसिद्ध तथा समादृत है। इसमें कुल तेरह सर्ग हैं। जी हां नि प्रथम सर्ग में मुगल सम्राट अकबर की वंश-परम्परा, उसके शासन, शौर्य और शाह टोहर के कुल का वर्णन है। द्वितीय सर्ग से पञ्चम सर्ग के पूर्वार्द्ध पर्यन्त मूल कथा की पूर्वपीठिका है। इसमें वीरप्रभु के समवसरण की रचना तथा मगधराज श्रेणिक की जिज्ञासा से गौतम द्वारा विद्युन्मालीदेव, सौधर्म मुनि, यक्ष, विद्युच्चर आदि के पूर्वभवों का वर्णन है। छठे सर्ग में जम्बूकुमार के यौवन, वसन्त-केलि और उसके द्वारा हाथी ‘विषमसङ्ग्रामसुर’ को दमन करने का वर्णन है। सातवें सर्ग में केरल-नरेश मृगाङ्क की पुत्री को आतङ्कित करने वाले विद्याधर रत्नचूल को युद्ध में परास्त कर वह अपने शौर्य की प्रतिष्ठा करता है। आठवें सर्ग में जम्बूकुमार, शक्तिशाली रत्नचूल को पराजित कर मृगाङ्क को बन्धनमुक्त कराता है। जम्बूकुमार का भव्य स्वागत होता है और श्रेणिक को केरलराज की पुत्री विलासवती प्राप्त होती है। नवें सर्ग में मुनि सौधर्म की प्रेरणा से जम्बूकुमार में निर्वेद का उदय होता है, किन्तु माता-पिता के आग्रह से वह विवाह के एक दिन बाद दीक्षा लेना स्वीकार करता है। नगर की चार रूपवती कन्याओं के साथ उसका विवाह होता है। दसवें तथा ग्यारहवें सर्ग में क्रमशः आठ कथाओं द्वारा उसकी वैराग्य-सम्पदा का उपहास और उसे विषयों में आसक्त करने का प्रयत्न करते हैं। वह उनके प्रत्येक तर्क का दृढ़तापूर्वक खण्डन करता है। बारहवें सर्ग में, जम्बूस्वामी तापस-व्रत-ग्रहण करते हैं और घोर तपश्चर्या के बाद शिवत्व को प्राप्त करते हैं। तेरहवें सर्ग में बारह अनुप्रेक्षाओं का निरूपण तथा विद्यच्चर की सिद्धि-प्राप्ति का वर्णन है। यह कथानक की उत्तरपीठिका है। कि जम्बूस्वामिचरित में प्रायः सभी रसों के उदाहरण प्राप्त हैं, परन्तु वैराग्य की प्रधानता । होने के कारण, अनीरस के रूप में शान्तरस का परिपाक हुआ है। उदाहरणार्थ - जीवितं चपलं लोके जलबदबदसन्निभम। 2PER रोगैः समाश्रिता भोगा जराक्रान्तं हि यौवनम्।। शाही मलात ह सन्दियं क्षणविध्वंसि सम्पदा विपदन्तकाः मधुबिन्दूपमं पुंसां सौख्यं दुःखपरम्परा।। २ है किकक कि जिनका Ep शिव पिता कि का 315 १. प्रान्तप्रशस्ति, गद्यभाग। २. जम्बूस्वामिचरित, १३/१३-१४ - जिला ही कारवाया E F काव्य-खाण्डका शाक (इस संसार में जीवन चंचल है, यह पानी के बुलबुले के समान है। भोग रोगों से आक्रान्त हैं और यौवन बुढ़ापे से आक्रान्त है। सौन्दर्य क्षणिक है, सम्पत्तियों का अन्त विपत्ति में होता है। इस दुःखपरम्परा में यहां लोगों को सुख मधुबिन्दु के समान ही उपलब्ध होता मगत जम्बूस्वामिचरित काव्य में कवि ने यथास्थान प्राकृतिक दृश्यों और प्रकृति के प्रति नैसा कि अनुराग का परिचय दिया है। इस महाकाव्य में समाज, धर्म और दर्शन की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। इसमें भाषात्मक वैविध्य का अभाव है। काव्य में अनुष्टुप् छन्द की प्रधानता है। अनुष्टुप, वंशस्थ, उपजाति, शार्दूलविक्रीडित, वसन्ततिलका; इन्द्रवज्रा, स्रग्धरा तथा मालिनी कुल आठ छन्द प्रयुक्त हैं। गालि फिट फटीष्ट्रि 15 किए शामली प्रतिलिपि सत्तामा का