कवि और रचनाकाल : प्रस्तुत महाकाव्य के रचयिता पद्मनाभकायस्थ हैं। उन्होंने जैन-दर्शन का अध्ययन भट्टारक गुणकीर्ति के सानिध्य में किया और उन्हीं की कृपा से वे काव्य-कला में प्रवृत्त हुए थे। यशोधरचरित की रचना गोपाद्रि (ग्वालियर) नरेश वीरमेन्द्र के राज्यकाल में उसके महामात्य कुशराज के अनुरोध से की गयी थी। इस तथ्य का उल्लेख प्रत्येक सर्ग की पुष्पिका में किया गया है। अतएव इसकी रचना पन्द्रहवीं शताब्दी में (सन् १४०० से १४२२ ई. के मध्य) मानी गयी है। मियह एक पौराणिक महाकाव्य है। काव्य में अभयरुचि के भवान्तरों की कथा वर्णित है और इसमें कवि का प्रचारवादी स्वर मुखरित हो रहा है। इसमें सर्ग हैं। प्रथम सर्ग में यौधेयदेश के अन्तर्वर्ती राजपुर का शासक मारिदत्त, खेचरी विद्या प्राप्त करने के लिए योगी भैरवानन्द की दुष्प्रेरणा से काली को नर-बलि प्रदान करने की योजना बनाता है। एतदर्थ, वह एक मुनिकुमार और एक मुनिकन्या को पकड़वाता है। उनकी मुखाकृति और वाणी से प्रभावित होकर वह उन्हें छोड़ देता है। द्वितीय सर्ग में मुनिकुमार का आत्म-परिचय है। तृतीय सर्ग में महाराज यशोधर पलितकेश को वार्धक्य का अग्रदूत मानकर प्रव्रज्या ग्रहण करते हैं तथा राज्य का शासनसूत्र यशोधर को सौंपते हैं। अमृतमती से यशोधर को एक पुत्र यशोमति की प्राप्ति होती है। कुलटा अमृतमती अपने पति यशोधर और उसकी माता चन्द्रमती को विष देकर मार डालती है। पाँचवें सर्ग में यशोधर और चन्द्रमती के भवान्तरों का वर्णन है। वे जीवहत्या के कारण श्वान, मत्स्य, अज आदि निकृष्ट योनियों में भटकते हैं। छठे सर्ग में उनका जीव कुक्कुटों के रूप में जन्म लेता है, जिनका पालन-पोषण चाण्डाल करता है। मुनि सुदत्त उनके पूर्वभवों का वर्णन करते हैं। वे अगले १. यशोधरचरित, १०७ २. काव्यप्रशस्ति, ४ ३. डॉ. सत्यवत, जैन संस्कृत महाकाव्य, पृ. ३५ ४. इसी विषयवस्तु को लेकर पुष्पदन्त ने अपाश में जसहरचरिउ तथा बादिराज ने यशोधरचरित काव्य लिखा। (संस्कृत काव्य के विकास में जैन कवियों का योगदान पृ. १६) नाशिकलाMP काव्य-खण्ड जन्म में यशोमति की पत्नी की कुक्षि से अभयरुचि और अभयमती के रूप में पैदा होते हैं। सातवें सर्ग में अपने पिता और पितामही की भवान्तरों की दुर्गति सुनकर यशोमति का मन ग्लानि से भर जाता है और वह तापसव्रत ग्रहण कर लेता है। आठवें सर्ग में अभयरुचि से हिंसा का दुष्परिणाम सुनकर देवी चण्डमारी और मारिदत्त को भी अपने कुकृत्यों से ग्लानि होती है। नवें सर्ग में मारिदत्त की प्रार्थना से मुनि सुदत्त सभी के भवों का वर्णन करते हैं। मारिदत्त और देवी मुनि से तापसव्रत ग्रहण करके मरने के पश्चात् सद्गति को प्राप्त करते हैं यशोधरचरित शान्तरसप्रधान काव्य है। अभयरुचि का यह निर्वेद शान्तरस में परिणत हुआ है - मूलं पापस्य भोगोऽयं भोगोऽयं धर्मनाशनः। । श्वभ्रमस्य कारणं भोगो भोगो मोक्षमहार्गला।। एतादृशममुं जानन्कथं खलमुपाये। एतस्मिन्कः स्पृहां कुर्यात् स्थितिज्ञो मादृशो जनः।।’ मा महाकाव्य में श्रृङ्गार, करुण, भयानक, बीभत्स आदि का सहायक रसों के रूप में चित्रण किया गया है। प्रकृति-चित्रण में मरुस्थल मरुउद्यानों का मनोरम चित्रण हुआ है। काव्य की भाषा अत्यन्त सरस और सजीव है, यथावसर अलकारों के समुचित सन्निवेश से काव्य में चमत्कार उत्पन्न हो गया है उपमालकार का सुन्दर निदर्शन द्रष्टव्य है दोषान निःकाश्य विविशुच्चित्ते सकला गुणाः। भृङ्गान् कमलकोशेभ्यः प्रातः सूर्यकरा इव ।। २ उसके चित्त में दोषों को निकाल कर गुणों ने उसी प्रकार निवास किया, जैसे सूर्य की किरणें प्रातः कमलकोशों से भौरों को निकाल कर उनमें प्रवेश करती हैं। -धन यशोधरचरित में कुल आठ प्रकार के छन्दों का प्रयोग प्राप्त होता है।। शाम