मुनिसुव्रतकाव्य के रचयिता अर्हद्दास हैं। इनका समय तेरहवीं शती का उत्तरार्ध है। आशाधर इनके काव्यगुरु थे। आशाधर के अन्तिम ग्रन्थ अनगारधर्मामृत की पूर्ति सं. १३०० के लगभग हुई। सुव्रतकाव्य की प्रशस्ति में अर्हद्दास ने लिखा है कि वे अपने गुरु आशाधर के धर्मामृत का पान कर सुपथ तथा काव्यरचना के पथ पर अग्रसर हुए हैं। इससे अनुमान किया जा सकता है कि उन्होंने इस महाकाव्य की रचना आशाधर के ग्रन्थ अनगारधर्मामृत की रचना के पश्चात् की होगी। अर्हदास स्वाभिमानी तथा अध्यात्म के रस में डूबे रहने वाले विरागी कवि हैं। लौकिक नायकों की प्रशस्ति करना वे उचित नहीं समझते हैं। उनका कथन है जिन कवियों ने सरस्न्ती रूपी कल्पलता को जिनेन्द्ररूपी पारिजात के सहारे संवर्धित करने की इच्छा की है, वे भला उसको प्राकृत नायक रूपी कांचीरवृक्षों पर आरोपित क्यों करेंगे? सरस्वती कल्पलतां स को वा संवर्धयिष्यन् जिनपारिजातम्। का न विमुच्य काञ्चीरतरूपमेषु व्यारोपयेत् प्राकृतनायकेषु ।। - (१।१२) अर्हद्दास का व्यक्तित्व उदात्त तथा उदार था। उन्होंने वैदिक परम्परा के देवों के प्रति भी आदरभाव व्यक्त किया है। (द्र. सुव्रतकाव्य ६१) विषयवस्तु : इस महाकाव्य में बीसवें तीर्थकर मुनिसुव्रतस्वामी का जीवन चरित्र वर्णित है। इसके कथानक का आधार गुणभद्रकृत उत्तरपुराण है। इस काव्य का अपर नाम ‘काव्यरत्न’ है। यह काव्य १० सों में विभक्त है। इसमें मुनिसुव्रतस्वामी की जन्म से लेकर मोक्षपर्यन्त घटनाओं का रोचक वर्णन किया गया है। प्रथम सर्ग में मङ्गलाचरण के पश्चात, मगध देश तथा राजगृह का वर्णन है। द्वितीय सर्ग में मगधनरेश सुमित्र और उसकी रानी पद्मावती का वर्णन है। तृतीय सर्ग में देवागनाएँ पद्मावती की परिचर्या और १, मुनिसुव्रतचरित १। २० ३८२ की काव्य-खण्ड राजा को तीर्थङ्कर के पूर्वभव का वृत्तान्त सुनाती हैं। चतुर्थ सर्ग में पुत्रजन्मोत्सव का वर्णन है। पञ्चम सर्ग में इन्द्राणी जिनमाता की गोद में कपट-शिशु को डालकर जिनेन्द्र को उठा लाती है। इन्द्र उसे ऐरावत हाथी पर बैठाकर मन्दराचल ले जाते हैं। षष्ट सर्ग में इन्द्रादि देव, विविध तीर्थों और सागरों के जल से जलाभिषेक-वर्णन है। सप्तम सर्ग में मुनिसुव्रत की युवावस्था, विवाह और राज्याभिषेक का वर्णन है। अष्टम सर्ग में मुनिसुव्रत का पट्टगज भोजन करना छोड़ देता है। एक यति इसका कारण बतलाते हैं कि यह गज पूर्वभव में जैन विरोधी राजा नरपति था। यह कुपात्रदान से गज हुआ। प्राग्जन्म की स्मृति से यह भोजन नहीं करता है। इस घटना को सुनकर मुनिसुव्रत को वैराग्य हो जाता है। वे अपने पुत्र को राज्य देकर नीलीवन में जाकर दीक्षा ग्रहण करते हैं। नवम सर्ग में मुनिसुव्रत एक वर्ष तक कायक्लेश तप करते हैं। दशम सर्ग में उन्हें केवल ज्ञान उत्पन्न होता है और वे देव-निर्मित समवसरण में देशना करते हैं। तदनन्तर, विहार करते हुए सम्मेदाचल जाते हैं, जहाँ उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। इन्द्रादि देव उनका मोक्ष कल्याण मनाते हैं।
समीक्षा
काव्य में धारावाहिकता, गतिशीलता व अविच्छिन्नता है। इसमें सुमित्र, पद्मावती और मुनिसुव्रत यही तीन पात्र हैं। कवि ने इनके चरित्र का विधिवत् विकास किया है। प्रकृति-चित्रण को भी इस काव्य में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। अन्य पौराणिक काव्यों की तरह इसमें अवान्तर कथाओं का अभाव है। यह वैराग्यमूलक काव्य है, अतएव, इसमें शान्त रस की प्रधानता है। वीर, वीभत्स, रौद्र और भयानक रसों का नितान्त अभाव है तथा शृङ्गार का चित्रण भी अत्यन्त मर्यादित और उदात्त भावबोध से संवलित है। अर्हदास की कल्पनाशक्ति अत्यन्त उर्वर है। कहीं-कहीं तो वे ऐसी उत्तम कल्पनाएं प्रस्तुत कर देते हैं, जिनसे उनकी समाधि गुण की सिद्धि और अयोनि काव्य रचने की क्षमता प्रकट होती है। मगध के धान के खेतों का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा है । पाकावनम्राः कलमा यदीयाः पादावनम्रा इव मातृभक्त्या। hary आघ्रायमाणाः स्वशिरःसु भान्ति विकासि पद्माननया धरित्र्या ।। (१।२६) पके हुए धान से लदे पौधे खेत में झुके पड़ रहे हैं। लगता है, जैसे वे मातृभूमि धरती की वन्दना में सिर झुका रहे हों और वात्सल्य से भरी धरती भी अपना कमल रूपी आनन उठाकर उनके सिर को सूंघ रही है। मार- अर्हदास ने प्रकृति को मानवीय संवेदनाओं में रंग कर काव्य में अनूठा भावसंसार रच दिया है। उनकी उत्प्रेक्षा तथा उपमाएं मौलिक भी हैं तथा सटीक भी। पृथ्वी और सूर्य के संवाद का उन्होंने यह अद्भुत दृश्य रचा है - धात्रीदरीमुखगतैर्विपिनस्थलीनां व्यादीर्णवेणुगलितैर्मणिभिर्विरेजे। मा लोकमित्र शिखिनो मम पीडयेति दीनं प्रकाशितरदेव दिनाधिपाय।।। जैन-महाकाव्य तथा चरितकाव्य बांसो के फट जाने से मणियां धरती की दरारों में जा फंसती हैं। इस पर कवि उत्प्रेक्षा करता है कि धरती अपना मुख विदीर्ण करके दाँत दिखाती हुई सूर्य से प्रार्थना करती है कि मेरे पुत्रसम इन पौधों को तुम तेज धूप में मत जलाओ। दरारों में चमकती मणियां ही धरती के दांत हैं। कि अर्हदास के काव्य में शब्दालङ्कारों में अनुप्रास तथा अर्थालङ्कारों में उपमा, उत्प्रेक्षा, भान्तिमान् और परिसंख्या का प्रयोग अधिक हुआ है। छन्दोविधान महाकाव्य परम्परा के अनुकूल है। षष्ठ तथा दशम सर्गों में विविध छन्दों की योजना हुई है। इसमें कुल १२ छन्दों का प्रयोग मिलता है, जिनमें उपजाति की संख्या अधिक है।