०९ पार्श्वनाथचरित

इस काव्य के रचयिता वादिराजसूरि हैं, जो द्रविडसंघ के अन्तर्गत नन्दिसंघ (गच्छ) और असंगल अन्वय (शाखा) के आचार्य थे। ये श्रीपाल के प्रशिष्य, मंतिसागर के शिष्य और दयापाल मुनि के सतीर्थ्य (गुरुभाई) थे। इन्होंने पार्श्वनाथचरित काव्य का प्रणयन, चौलुक्य चक्रवर्ती जयसिंहदेव की राजधानी कट्टगेरी में निवास करते हुए शक् सं. वि. १०४२ (सन् १०२५ ई), दार्तिक शुक्ला तृतीया को किया था। इस काव्य पर भट्टारक विजयकीर्ति के शिष्य गुणभद्र ने टीका लिखी थी। कथास्रोत : इस काव्य में तेईसवें तीर्थङ्कर पार्श्वनाथ का जीवन काव्यात्मक शैली में वर्णित है। कवि ने इसे ‘पार्श्वनाथजिनेश्वरचरित’ महाकाव्य भी कहा है। इस काव्य की कथावस्तु का मूल स्रोत उत्तरपुराण है, जिसके ७३वें पर्व में पार्श्वनाथ के चरित का वर्णन हुआ है। यह काव्य १२ सर्गों में विभक्त है। -

कथावस्तु

इस महाकाव्य के प्रत्येक सर्ग का नाम वर्ण्यवस्तु के आधार पर किया गया है। प्रथम सर्ग का नाम अरविन्दमहाराजसंग्रामविजय, दूसरे का नाम स्वयंप्रभागमन, तीसरे का नाम वज्रघोषस्वर्गगमन, चतुर्थ का नाम वजनाभचक्रवर्तिप्रादुर्भाव, पाँचवें का नाम वजनाभचक्रवर्तिचक्रप्रादुर्भाव, छठे का नाम वजनाभचक्रवर्तिप्रबोध, सातवें का नाम वज्रनाभचक्रवर्त्तिदिग्विजय, आठवें का नाम आनन्दराज्याभिनन्दन, नवें सर्ग का नाम दिग्देविपरिचरण, दशर्वे का कुमारचरित, ग्यारहवें का केवलज्ञानप्रादुर्भाव और बारहवें सर्ग का नाम भगवन्निर्वाणगमन है।

समीक्षा

इस काव्य में शान्त रस की प्रधानता है। काव्य की भाषा, माधुर्यगुणोपेत है और कवि का भाषा पर असाधारण अधिकार है। कवि ने भाव और भाषा को सजाने के लिए अलङ्कारों का प्रयोग किया है। शब्दालड्कारों में अनुप्रास का प्रयोग अधिक हुआ है। अर्थालङ्कारों में उपमा, उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यासादि का प्रयोग स्वाभाविक रूप से हुआ है। प्रत्येक सर्ग की रचना पृथक्-पृथक् छन्दों में हुई है। सर्गान्त में छन्दः-परिवर्तन की योजना भी की गयी है। प्रथम, सप्तम और एकादश सर्गों में अनुष्टुप् छन्द और षष्ठ सर्ग में विविध छन्दों का प्रयोग हुआ है। सप्तम सर्ग में व्यूहरचना के प्रसङ्ग में मात्राच्युतक, गूढचतुर्थक, अक्षरच्युतक, अक्षरव्यत्यय, निरोष्ठ्य आदि का अनुष्टुप् छन्दों में ही प्रदर्शन किया गया है। हु प्रकृति-वर्णन में कवि ने अनेक स्थलों पर नैसर्गिक उपादानों का मानवीकरण करते हुए चमत्कारपूर्ण कल्पनाओं की सृष्टि की है। हेमन्त के आगमन पर शरद् ऋतु अपने अवसान को निकट आया जान कर रोती है, उसके आंसू ही आकाश से टपकते हिमबिन्दु हैं

१. सं. पं. मनोहरलाल शास्त्री, पं. मानिकचन्द्र दि. जैन ग्रन्थमाला, बम्बई वि.सं. १८७३। २. पार्श्वनाथचरित प्रशस्ति-श्लोक -५ शिडा जैन-महाकाव्य तथा चरितकाव्य ३७१ अवबुध्य निजात्ययं विषादाद् रुदितायाः शरदो हिमागमादौ। भृशमशुलवैरिव प्रसने हिमबिन्दुप्रकरैर्वियत्यपारे।। - (५।२७) । वादिराज का पांचवे सर्ग का ऋतुवर्णन विशेष रमणीय बन पड़ा है। उनकी शैली की संगीतात्मकता तथा अनुप्रासों और पदावली का अनुरणन भी प्रभावशाली है। उदाहरणार्थ अनारतं यद् वनवत्सवत्सलं निरस्तसर्वासु मदापदापगम्। कति चकास्ति विद्याविनयालयालयं पवित्रचर्या पवमानमानवम् ।। – (४६०) वादिराज जैन आचार्यों की परम्परा में सुप्रतिष्ठित हैं, उन्हें षट्तर्कषण्मुख, स्याद्वादविद्यापति और जगदेकमलवादि आदि उपाधियों से सम्मानित किया गया था। तदनुरूप इस महाकाव्य में चिन्तन की गुरुता तथा उपदेशपरायणता है और पदे पदे सुन्दर सूक्तियों का प्रयोग है। स्मरचरित की असारता बताते हुए प्रभविष्णु अभिव्यक्ति कवि ने की है - विवेकवीतं विरसीक्रियान्तं सङ्कल्परम्यं चरितं स्मरस्य। माया न तेन कुर्वन्ति यशो मलिष्ठं लोकद्वयश्लाघ्यगुणं गुणाढ्याः।। ।

  • (२।३७) साम्प्रदायिक पक्षपात और परमत के प्रति धिक्कारभाव भी वादिराज के काव्य में मिलता है। इस दृष्टि से बौद्धों तथा शिव के लिए अपशब्दों का प्रयोग अरुचिकर और असंयत है।’ वादिराज शृंगारपूर्ण तथा ललित कल्पनाओं के विन्यास में दक्ष हैं। सम्भोग शृंगार के प्रसंगों में उत्प्रेक्षाओं की उन्होंने लड़ियां गूंथ दी हैं। इसी प्रकार की उत्प्रेक्षा देखिये - रहः परामृष्टतदघिपल्लवं प्रमोदयन्तं कुपितामिव प्रियाम्। लता जहासेव नवप्रसूनकैर्युवानमन्तर्गतभृङ्गनिःस्वनैः।। (पार्श्व. ८४०) इसी प्रकार विप्रलम्भ के चित्रण में भी वे व्यभिचारी भावों के समुचित प्रयोग के द्वारा अनुभूति की सघनता निर्मित करते हैं। कमठ और वसुन्धरा के बिना संसार फीका लगने लगता है धृत्वा लताङ्गी करपल्लवे तामसक्तमाकृष्टमिवानिवृत्तम्। निरुद्धपञ्चेन्द्रियवृत्तिचित्तं तं मृत्यवे यच्छलिव क्षणेन।। (२।१२) १..-पार्श्वनाथचारित, १२०,२४ ३७२ इसी ने वसुन्धरा का चित्त जीतकर उसे कमठ तक खींच कर लाने में देर लगा दी, तो कमठ सारे इन्द्रियव्यापार को रोक कर क्षण भर में मृत्यु जैसी अवस्था को दे दिया गया।