कवि और रचनाकाल
इस महाकाव्य की एक हस्तलिखित प्रति, कारंजा के जैन भण्डार में है। उसमें ६ श्लोकों की एक प्रशस्ति मिलती है। तदनुसार, इस ग्रन्थ के रचयिता कवि महासेन सूरि हैं। वे लाटबर्गट संघ में सिद्धान्तों के पारगामी जयसेन मुनि के शिष्य गुणाकरसेन के शिष्य थे। वे परमारनरेश मुञ्ज के द्वारा पूजित थे और सिन्धुराज उनके चरणकमलों का अनुरागी था। काव्यनिर्माण का समय प्रशस्ति में नहीं दिया गया है। मुज और सिन्धुल के उल्लेख से कवि के समय का अनुमान किया जा सकता है। सिन्धुराज का समय लगभग वि.सं. स१०५२-१०५५ (६६५-६६८ ई.) है। अतएव, इस ग्रन्थ की रचना भी इन्हीं वर्षों में होनी चाहिए। १. प्रद्युम्नचरित, प्रशस्ति, श्लोक ३-४ २. डॉ. गुलाबचन्द्र चौधरी, पोलेटिकल हिस्ट्री ऑफ नार्दन इण्डिया फाम जैन रिसोर्सेज, पृ. ६५) काव्य-खण्डवा ३६६
विषयवस्तु
प्रद्युम्नचरित’ महाकाव्य चौदह सर्गों में उपनिबद्ध है, जिसमें कुल मिलाकर १५३२ श्लोक हैं। इसके कथानक का आधार भागवतपुराण में तथा विष्णुपुराण है। जिनसेन के हरिवंशपुराण तथा गुणभद्राचार्य के उत्तरपुराण में भी प्रद्युम्नचरित वर्णित है। इस महाकाव्य में श्रीकृष्ण के रुक्मणी महारानी के गर्भ से उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र प्रद्युम्न का जीवन-चरित वर्णित है। जैन-धर्म में प्रद्युम्नचरित अत्यन्त लोकप्रिय है। हरिवंशपुराण एवं प्रद्युम्नचरित की कथावस्तु में पर्याप्त साम्य है। कथावस्तु : इस महाकाव्य में कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का चित्र देखना, नारद का दोनों को परामर्श या सन्देश, रुक्मिणीहरण, शिशुपालवध आदि घटनाओं का निरूपण उक्त वैष्णव पुराणों के समान है। रुक्मिणी से उत्पन्न शिशु (प्रद्युम्न) का धूमकेतु नामक दैत्य अपहरण कर लेता है। अयोध्या के राजा अरिंजय की दीक्षा, मधु, कैटभ और हेमरथ असुरों का अगले जन्म में प्रद्युम्न आदि के रूप में अवतरण, कालसंबर नामक असुर के द्वारा प्रद्युम्न को यौवराज्य, उसकी रानी कांचनमाला का प्रद्युम्न पर अनुरक्त होना, प्रद्युम्न पर बलात्कार का दोष लगाया जाना, दुर्योधन की पुत्री उदधि का अपहरण और उसका रुक्मिणी के भवन में लाया जाना - आदि घटनाओं के निरूपण में जैन परम्परा का अनुवर्तन है। कृष्ण और प्रद्युम्न का युद्ध छिड़ जाता है, तभी नारद दोनों को एक दूसरे का वास्तविक परिचय देते हैं। फिर उदधि के साथ प्रद्युम्न का विवाह हो जाता है। जाम्बवतीपुत्र जाम्ब का चरित्र भी प्रसंगतः इस महाकाव्य में वर्णित है। अन्त में समीर राजकुमार तीर्थकर नेमिनाथ से दीक्षा ग्रहण कर लेते हैं, रुक्मिणी और सत्यभामा भी दीक्षा लेती हैं तथा प्रद्युम्न कठोर तपश्चर्या के पश्चात् निर्वाण प्राप्त करते हैं।
समीक्षा
वर्णनों में नायक को देखने के लिये नगर की रमणियों का अपने-अपने कार्य छोड़ ससम्भ्रम दौड़ पड़ना, गर्भावस्था आदि के वर्णन इस महाकाव्य में कालिदास से प्रभावित हैं। उपमाएं प्रायः परम्पराप्राप्त हैं, और अन्यच्छायायोनिता होने पर भी कवि की अलंकारयोजना में अप्रस्तुतविधान के सटीक और सन्तुलित प्रयोग से काव्यगुण की अभिवृद्धि हुई है। कुण्डिनपुर में शिशुपाल के आगमन पर कवि कहता है कि शिशुपाल ने उस नगरी को अपनी विशाल सेना से उसी प्रकार घेर लिया था, जिस प्रकार तारागण मेरु पर्वत के शिखर को घेर लें - मा पूर्वमेव शिशुपालभूपतिस्तत्परीत्य परितः पुरं तदा। । नमी गोल भूयसा निजबलेन तस्थिवान् मेरुशृङ्गमिव तारकागणः ।। - ३३ १. माणिकचन्द्र दि. ग्रन्थमाला बम्बई वि.सं. १६७३ में प्रकाशित । २. भागवतपुराण, दशम स्कन्ध, अ. ५२-५५। ३. विष्णुपुराण, पंचम अंश, अ.-२६-२७ र कम किमी काही जैन-महाकाव्य तथा चरितकाव्य ३६७ वर्णनों में कवि ने मुहावरों या आभाणकों के विन्यास के द्वारा विच्छित्ति का आघान कर दिया है। वसन्त ऋतु का उद्दीपन के रूप में वर्णन करता हुआ वह कहता है - सर्वतो मुकुलयन् सहकारान् पुष्पयन्नुं वनं वनराजीम्। अन्तरेव समवाप वसन्तः क्षारसेवनमिव क्षतमध्ये।। - ७३७ । विरहोद्दीपक इसी प्राकृतिक रम्यता के बीच आम्र-वृक्षों को मुकुलित करता हुआ, वन और वनराजी को पुष्पित करता हुआ वसन्त आ गया, तो जैसे विरहियों के घाव पर नमक छिड़क दिया गया। वर्णनों में कहीं-कहीं ग्राम-जीवन तथा जनसाधारण के अनुभवों को अभिव्यक्ति देकर कवि ने अपनी महाकाव्य की रचना को नया आयाम दिया है। उदाहरण के लिये शीत ऋतु में किसानों के त्रास का विवरण देता हुआ वह कहता है -
- शीतलवायु प्रवाहित होने से संसार काँप रहा है। बादलों से मूसलाधार वृष्टि हो रही है। कृषकगण काँपते हुए हलोपकरणों को खेतों में छोड़कर घर चले गये हैं - लेकर सीत्कारवायुपरिकम्पितविश्वलोके, Afro ETF TEET वेगाद् विमुञ्चति जलं नववारिवाहे। सर्व हलोपकरणं च विहाय तस्मिनु, कृच्छाज्जगाम भवनं प्रतिवेपिताङ्गैः ।। (५।१०४) F कवि का प्रमुख लक्ष्य, प्रसाद, मधुर वाणी द्वारा संस्कृत-काव्य की सरस रचना करना था। काव्य वैदर्भी रीति में लिखा गया है। दुरूह से दुरूह विषय को सरल ढंग से कहना कवि के काव्य की मुख्य विशेषता है। महाकाव्य में शब्दों का वैविध्य है।