०३ कलेवर तथा विषयवस्तु

इस महाकाव्य में बाईसवें तीर्थड्कर नेमिनाथ तथा श्रीकृष्ण के समकालिक वराम नामक पुण्य पुरुष का जीवन-चरित्र विस्तार से वर्णित है। इसमें ३१ सर्ग और कुल २८१५ श्लोक हैं। कथानक इस प्रकार है १. आदिपुराण १३५ २. जैन साहित्य का बृहद् इतिहास, भाग-६, पृ. १८७ ३. वही, पृ. १८८ ४. यह महाकाव्य मराठी अनुवादसहित पं. जिनदास पार्श्वनाथ फड़कुले द्वारा सम्पादित होकर रावजी सखाराम दोशी, सोलापुर द्वारा सन् १६२७ ई. में प्रकाशित है। जैन-महाकाव्य तथा चरितकाव्य ३५७ विनीत देश के उत्तमपुर नगर में राजा धर्मसेन और रानी गुणवती से वराङ्ग नामक राजकुमार हुआ। युवावस्था प्राप्त करने पर उसका विवाह १० राजकुमारियों से होता है। भगवान् नेमिनाथ के प्रधान शिष्य वरदत्त से राजा धर्मसेन और राजकुमार दोनों धर्म-श्रवण करते हैं। संसार की निस्सारता को समझकर बराङ्ग उनसे अणुव्रत ग्रहण कर सभी प्राणियों के प्रति मैत्री और प्रेम का आचरण प्रारम्भ करता है। राजा वराग की गुणवत्ता से प्रभावित होकर उसे युवराज बना देता है। इससे वराङ्ग की सौतेली माता मृगसेना और उसका पुत्र सुषेण ईावश वराम को भगाने के लिए सुबुद्धि नामक मंत्री से सहायता मांगते हैं। मंत्री द्वारा सुशिक्षित एक दुष्ट घोड़ा वराङ्ग को चढ़ने के लिए दिया जाता है। वह एक घने वन में ले जाकर वराग को पटक देता है। वहाँ एक बार व्याघ्र से बचने के लिए वह एक हाथी से सहायता प्राप्त करता है। वहीं एक चिड़िया एक सुन्दरी स्त्री का रूप धारण कर वराङ्ग को लुभाना चाहती है, परन्तु उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी वन में भ्रमण करते हुए वह भीलों द्वारा पकड़ा जाता है। परन्तु उनके मुखिया के पुत्र को सर्पदंश से अच्छा करने के कारण वह मुक्त कर दिया जाता है। एक बार वराङ्ग भीलों से संघर्ष करके एक वणिग्दल की रक्षा करता है और उनके मुखिया के साथ ललितपुर आकर अपना नाम कश्चिद्भट धारण करके वहाँ रहने लगता है। इधर वराग के गायब हो जाने से उसके माता-पिता व पत्नियाँ दुःखी होती हैं। एक मुनि से सान्त्वना पाकर वे सभी धार्मिक जीवन व्यतीत करने लगते हैं। एक बार मथुरा का राजा ललितपुर पर चढ़ाई करता है। कश्चिद्भट (वराग) वहाँ के राजा की सहायता करता है और मथुरानरेश को पराजित करता है। इस कृत्य पर ललितपुर नरेश अपनी कन्याओं का विवाह उससे करके अपना आधा राज्य प्रदान करता है। एक समय उसके पिता के राज्य पर बकुलनरेश आक्रमण करता है। धर्मसेन ललितपुर नरेश से सहायता मांगता है। वराङ्ग स्वयं युद्ध-क्षेत्र में जाता है और विपक्षी राजा को पराजित कर अपने पिता के नगर में प्रवेश करता है। उत्तमपुर की जनता उसका स्वागत करती है। वह विरोधियों को क्षमा करके उत्तमपुर का शासन पुनः संभालता है और पिता की आज्ञा से दिग्विजय हेतु प्रस्थान करता है। वह एक नवीन राज्य की स्थापना कर आनर्तपुर को अपनी राजधानी बनाता है। एक रात्रि वराङ्ग आकाश में टूटते हुए तारों को देखता है। इससे उसे वैराग्य हो जाता है। वह अपने पुत्र सुगात्र को राज्यभार सौंपकर वरदत्त-केवली से दीक्षा ग्रहण करता है और तपस्या करके मुक्तिपद प्राप्त करता है।

समीक्षा

प्रस्तुत महाकाव्य में जैन सिद्धान्तों व नियमों का वर्णन बहुत अधिक है। कवि ने अनेक स्थलों पर जैनेतर मतों की आलोचना की है। कवि ने ब्राह्मणत्व का आधार विद्वत्ता, सत्यता और साधुता बतलाया है। काव्य का प्रधान रस शान्तरस है। यत्र-तत्र १. द्र. वराङ्गचरित, सर्ग -१०, २६, २७ २. वही, प्रस्तावना, पृ. ३२-३५, ६- ७० T OREE शिकार ३५८ काव्य-खण्ड अन्य रसों के भी दर्शन होते हैं। यथा वराग और उसकी नवोढ़ा पलियों के केलि-वर्णन में सम्भोग-श्रृंगार और चतुर्दश सर्ग के युद्ध-प्रसङ्ग में वीर रस की प्रधानता है। काव्य-शैली अधिक व्यवस्थित नहीं है। इसमें प्राकृत शब्दों का संस्कृत में प्रयोग हुआ है। महाकाव्यसम्मत लक्षणों की कुछ कमियों के होते हुए भी वराङ्गचरित अपने युग का महाकाव्य है। इस काव्य में प्रबन्धात्मकता के समुचित निर्वाह की कमी है तथा उसके स्थान पर उपदेश और वर्णन अधिक प्रधान हो गये हैं। चरितनिरूपण की दृष्टि से व्यक्तित्व की उदात्तता तथा गरिमा का अनुभव अवश्य यह महाकाव्य देता है। प्रकृतिवर्णन में जटिल कवि उतने नहीं रमे हैं। उनके वस्तुनिरूपण में अवश्य अनेक प्रसंग भावों के घात-प्रतिघात और मनुष्यस्वभाव के उपस्थापन के कारण प्रभावित करते हैं। बड़े भाई के रहते हुए भी वराङ्ग को युवराज पद दिये जाने के कारण विमाता के मन का क्षोभ और उसका अपने पुत्र ज्येष्ठ राजकुमार सुषेघ से मिल कर वराङ्ग के विरुद्ध दुरभिसन्धि करना, वराङ्ग का अन्धकूप में गिरना, घोर अरण्य में व्याघ्र, अजगर, भिल्ल आदि से उसका सामना - इत्यादि घटनाओं के निरूपण में नाटकीयता है। रसपरिपाक की दृष्टि से षष्ठ सर्ग में किरात से बराङ्ग के युद्ध का प्रसंग बड़ा रोमांचक तथा ओजस्वी है। आगे चल कर युद्ध-भूमि के वर्णन में कवि ने बीभत्स का भी अनुभव उदग्रता के साथ कराया है। धरती पर खून का सागर सा लगने लगता है, उसमें तिरते हाथी के पावों के टुकड़े कछुवों से दिखायी देते हैं और उनकी काटी गयी सूडें मकर की भांति लगती हैं। पिशाच, कौवे, गीध, कुत्ते आदि कच्चे मांस खाने के लिये वहां मंडराने लगते हैं - सर्व व्रणोत्थशोणितेनाभूत पृथिव्यां शोणितार्णवः। क का यत्रेभपादखण्डानि कच्छपोपमतां ययुः। मकराकारतामीयुश्छिन्नाश्च करिणां कराः।। प्राय पिशाचकाकगृद्धाश्च कुक्कुराः पिशिताशिनः। IPI विचेरुस्तत्र सानन्दाः पलास्वादनलम्पटाः।। (-2 19१७-११) मा दूसरे सर्ग में वराग के सुन्दरियों के साथ विहार करने के प्रसंग में श्रृगार, उसके अपहरण पर माता-पिता के विलाप (सप्तम सर्ग) में करुण तथा पर्यन्त में शान्त रस की सर्वाधिक पुष्ट व्यंजना इस महाकाव्य में मिलती है। शान्त रस की प्रधानता के निर्वाह के लिये कवि ने समुचित उपमान और कल्पनाओं का अनुभूतिप्रवण रूप में विन्यास किया है। उदाहरणार्थ लक्ष्मीरियं वारितरङ्गलोला क्षणे क्षणे नाशमुपैति चायुः। तारुण्यमेतत् सरिदम्बुपूरोपमं नृणां कोत्र सुखाभिलाषः ? ।। १३ ॥५ जैन-महाकाव्य तथा चरितकाव्य ३५६ (लक्ष्मी पानी की लहरों के समान चंचल है, आयु प्रतिक्षण नष्ट होता रहता है, यौवन नदी में आयी बाढ़ की भांति है, इस संसार में मनुष्यों के लिये सुखाभिलाष के लिये अवकाश ही कहां है?) का कि हा वराङ्गचरित में महाकाव्योक्त वर्ण्यविषयों का सन्निवेश भारवि, माघ आदि महाकवियों की कृतियों के समान हुआ है। नगर, ऋतु, क्रीड़ा, श्रृङ्गार, विवाह, पुत्रजन्म, मन्त्रणा, प्रयाण तथा युद्ध आदि प्रमुख वर्ण्य विषय इसमें समाविष्ट हैं। अनेक सर्गों में जैन दर्शन तथा धर्म के सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा की है। यान मार है छन्दोविधान : इस महाकाव्य में ४६९ अनुष्टप, १८७६ उपजातियां, ८६ द्रुतविलम्बित, पुष्पिताग्या २४, १० भुजङ्गप्रयात तथा ७७ मालभारिणी १२ मालिनी, ७० वसन्ततिलका तथा १६५ वंशस्थ वृत्त प्रयुक्त हैं। मां शैली : जटासिंह नन्दि की भाषाशैली अलंकृत और चमत्कारपूर्ण है। शब्दालंकारों का विन्यास उन्होंने अनेकत्र सायास किया है। नगर के वर्णन में रूपक और श्लेष का सटीक निर्वाह करते हुए वे कहते हैं-तराई की माला चलत्पताकोज्ज्वलकेशमाला प्राकारकाञ्चिः स्तुतितूर्यनादा। प्रपूर्णकुम्भोरुपयोधरा सा पुराङ्ना लब्धपतिस्तुतोष।। (६६६) (हिलती हुई पताकाओं के केशों वाली, प्राकार रूपी काञ्ची से युक्त, स्तुतियों के तूर्यनाद वाली, तथा जल से भरे मंगल घटों के पयोधर वाली वह नगरी रूपी अंगना पति (स्वामी, राजा) को पाकर सन्तुष्ट हो गयी।) नीति म कहीं-कहीं कवि ने सर्वथा नवीन उपमाओं का प्रयोग किया है। राजकुमार के शैशव का वर्णन करते हुए वह कहता है कि जैसे ग्रीष्म ऋतु में पंखा लोगों के बीच एक हाथ से दूसरे हाथ पहुंचता रहता है, उसी प्रकार वह शिशु लोगों के बीच एक हाथ से दूसरे के हाथों में पहुंचकर दुलराया जाता था कि निदाघमासे व्यजनं यथैव करात करं सर्वजनस्य याति। तथैव गच्छन् प्रियतां कुमारो वृद्धिं च बालेन्दुरिव प्रयातः।। (२८६)