०१ जैन काव्यों की विशेषताएँ

१. ब्राह्मण काव्य नायक के एक जन्म की ही कथा का वर्णन करते हैं, परन्तु जैन संस्कृत काव्य अनेक जन्मों के द्वारा व्यक्तित्व के उदय तथा सम्पूर्णता को लक्ष्यकर नाना जन्मों की कथा सुनाते हैं। आरम्भिक कथानक में काम तथा अर्थ का भरपूर रोचक चित्रण रहता है तथा श्रोताओं का सहज मनोरञ्जन होता है, परन्तु कथानक की गति १. संस्कृत कवि दर्शन, चौखम्बा, वाराणसी, वि.सं. २०५०, आमुख पृ. १८, २. डॉ. गुलाबचन्द्र चौधरी, जैन साहित्य का बृहद् इतिहास, भाग-६ पृ. ७ - 2. The Jainas in the history of Indian literature by Winternitz, Edited by Jina Vijaya Muni. Ahmedabad 1946. P. ४. पद्मभूषण आचार्य बलदेव उपाध्याय, संस्कृत साहित्य का इतिहास पृ. २४० ३५६ काव्य-खण्ड के साथ मनोरञ्जन की गति धीमी पड़ जाती है। इन काव्यों की परिणति शान्त रस में ही होती है। श्रृगार, वीर आदि रसों का चित्रण अङ्गरस के रूप में ही किया जाता है। २. जैन कवि अपने धर्म की अभिवृद्धि के लिए ही काव्य का आश्रयण करता है। वह त्याग, संयम तथा अहिंसा के आदर्श की व्याख्या के निमित्त उपदेश देने से नहीं का चूकता। ३. जैन काव्यों में जैनधर्म के उपदेष्टा तीर्थकर, धार्मिक पुरुष और लोकोपकारी व्यक्ति भी नायक होते हैं। जैन तत्त्वों की शिक्षा जैन काव्यों का अविभाज्य अङ्ग होता