३१ श्रीमेघविजय का मेघदूत-समस्यालेख

श्री मेघविजय जैन मुनि थे। व्याकरण, न्याय, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, अध्यात्म के भी वे विद्वान थे। मेघविजय की काव्य-प्रतिभा विलक्षण थी। ‘सप्त-सन्धान’ महाकाव्य में इनकी वर्णना-शक्ति, कल्पना तथा भाषासौन्दर्य का दर्शन होता है। इन्होंने युक्तिप्रबोध नामक नाटक की रचना की है। मन मेघदूत’ की अन्तिम पंक्ति को समस्या मानकर यह काव्य ‘मेघदूत-समस्यालेख’ १७वीं शताब्दी में लिखा गया है।

काव्य-सार

इस काव्य में कवि ने अपने गुरु श्री विजयप्रभसूरि के पास मेघ द्वारा सन्देश भेजा है। मेघविजयजी अपने गुरु के आदेश से औरंगाबाद में अपना चातुर्मास्य प्रारम्भ करते हैं। भाद्रपद मास में पंचमी के दिन वे अपने गुरु के वियोग से व्याकुल होते हैं। इसी समय आकाश में बादल देखते हैं और उसे वे अपना सन्देश देकर गुरु के पास भेजते हैं। मेघ औरंगाबाद से देवपत्तन जाता है। कवि ने इस प्रसंग में औरंगाबाद, देवगिरि पर्वत, एलौर पर्वत, तापी नदी, नर्मदा नदी, भृगुपुर, हरिगृह नगर और द्वीपपुरी (देवपत्तन) का रोचक वर्णन किया है। देवपत्तन में कवि ने गुरु के आश्रम का वर्णन किया है। गुरु के तप, तेज, व्रत का और उदात्त चरित्र का वर्णन किया है। कवि ने अपने गुरु विजयप्रभसूरि का जीवनवृत्त, महिमा और आश्रम का वर्णन करने के बाद अपना सन्देश सुनाने की मेघ से प्रार्थना की है। Pho hE सि विक (S-IPF) जैन आत्मानन्दसभा, भावनगर से वि.सं. १७0 में प्रकाशित। सन्देशकाव्यपरम्परा ३५१ 5 सन्देश में कवि ने गुरु के प्रताप की महिमा गायी है। तदनन्तर गुरु के वियोग में अपनी व्याकुल अवस्था का वर्णन किया है। अन्त में गुरु से प्रार्थना की गई है कि वह अवसर कब आयेगा जब ध्यानावस्था में गुरु की साक्षात् स्तुति कर सकेगा। गुरु के हृदय में आश्रय पाने की कामना कब पूर्ण होगी ? ने की शाम | गुरु को सन्देश सुनाकर उसका प्रत्युत्तर लाने का मेघ को परामर्श दिया गया है। कि कवि की प्रार्थना सुनने के बाद मेघ उसके गुरु के पास जाकर और गुरु का प्रतिसन्देश लेकर लौटता है। गुरु की कुशलवार्ता तथा कृपादृष्टि की वार्ता पाकर कवि प्रसन्न होता है। किसान र PLEAREE तिर मा किशि शिन्जमा

काव्य-सौन्दर्य

यह काव्य दूतकाव्य तथा समस्यापूर्ति इन दोनों दृष्टिकोणों से बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। मन्दाक्रान्ता छन्द है। अन्तिम श्लोक अनुष्टुप छन्द में है, जहाँ कवि ने अपना उल्लेख किया है। ‘मेघदूत’ के अनुकरण पर लिखे गये इस काव्य की भाव और विषय में भिन्नता है। अनी रस शान्त है। मेघदूत के पद की चतुर्थ पंक्ति को समस्या मानकर यह काव्य लिखा गया है। कवि ने औरंगाबाद की समृद्धि का सुन्दर वर्णन किया है। मेघदूत में जिस प्रकार अलका नगरी का शृगाररसपूर्ण वर्णन किया है, उसी प्रकार देवकपत्तन नामक नगरी का वर्णन है। कवि ने समस्या-पूर्ति में कुशलता का परिचय दिया है। ‘मेघदूत’ में यक्ष अपनी प्रेयसी की विरहावस्था का वर्णन करते हुए कहता है। साभ्रेऽस्नीव स्थलकमलिनी न प्रबुद्धा न सुप्ता।।२।२६।। इस काव्य में वैरिसिंह जब व्रतचर्या के लिये माता की आज्ञा माँगता है, तब माता की अवस्था का वर्णन इस प्रकार है का काम न जाता माताऽवचनविषयाऽसत्यदुःखाभिघातात साभ्रेऽस्नीव स्थलकमलिनी न प्रबुद्धा न सुप्ता।। १०३।। कवि ने विरहावस्था के प्रसंग में प्रयुक्त हुई पंक्ति को कुशलता से वात्सल्य-भाव के प्रसंग में प्रयुक्त किया है। माधुर्य और प्रसाद गुण तथा वैदर्भी शैली से परिपूर्ण इस काव्य में पाठक को ‘मेघदूत’ काव्य के आनन्द की प्राप्ति होती है। बता