किसी अज्ञात कवि का (समय अनिर्धारित) ‘चेतोदूत’ भी मेघदूत के पद्यों के अन्तिम चरणों को लेकर समस्यापूर्ति के रूप में लिखा गया है। काव्य में कोई विशेष कथा नहीं है। एक शिष्य अपने गुरु के श्री-चरणों में प्रसत्ति (दया-दृष्टि) को ही प्रेयसी बनाकर अपने चित्त को उसके पास दूत बनाकर भेजता है। मन्दाक्रान्ता छन्द में १२६ श्लोक हैं। IFESS
१. जैन आत्मानन्दसभा, भावनगर से वि.सं. १८७० में प्रकाशित। ३५० काव्य-खण्ड कि काव्य-समीक्षा : ‘मेघदूत’ में विप्रलम्भ शृङ्गार के प्रसंग में कही गई उक्तियों को बड़े कुशल ढंग से शान्ति और भक्ति के वातावरण में प्रयुक्त किया गया है। इस काव्य में प्रसाद गुण है, भाषा भावों के अनुकूल है। लेखनशैली तथा विचार-तारतम्य में मेघदूत की छाया होने पर भी विषय में नवीनता है। काव्य-गुणों के साथ-साथ एक धार्मिक ग्रन्थ की भी विशेषतायें हैं। समस्यापूर्ति का सौन्दर्य निम्नांकित पद्य में देखिये - HT HANIDIOआचार किया दिम आशबद्धो गमयति दिनान् दैन्यवानेष साक्षा-31 मा निक " त्तस्यस्वामिन्! यदि न भविता संगमस्त्वत्प्रसत्तेः। किला स स्तोकाम्भः स्थितशफरिकैवातिदुःखातिरेका-TIPPIE FAEPIS जाचक अनि “त्मीनक्षोभाच्चलकुवलयश्रीतुलामेष्यतीति। - लाल वाट इस काव्य में परोपकार, करुणा, अहिंसादि पवित्र भावनाओं को चित्रित किया गया है। साहित्यिक सौन्दर्य के साथ-साथ इस काव्य में धार्मिक ग्रन्थ की उदात्त भावनाओं का चित्रण भी किया है। _IPPA का FERIोग