जैन मेघदूत के रचयिता अंचलगच्छ मेरुतुड्ग हैं। मारवाड़ में स्थित नाणी नामक ग्राम में इनका जन्म हुआ। इनके आचार्य श्री महेन्द्रप्रभसूरि थे। १३८१ ई. में इन्हें गच्छनायक की पदवी दी गई। १४१५ ई. में पूर्णिमा के दिन इस विद्वान् का स्वर्गवास हो गया। इस कवि ने लघुशतपदी, धातुपारायण, षड्दर्शन-समुच्चय, बालबोध व्याकरण, सूरिमंत्रकल्पसारोद्धार इत्यादि ग्रन्थों की रचना की। के काव्य की कथा : यदुकुल शिरोमणि प्रभु नेमिनाथजी बाल्यावस्था से ही इन्द्रिय सुखों से उदासीन थे। विवाह के अवसर पर सहस्र पशुओं के बलि किये जाने का समाचार पाकर घर-बार, पत्नी का त्याग करके मोक्ष-प्राप्ति के लिये वे रैवतक पर्वत पर तपस्या करते हैं। उनकी पत्नी राजीमती विरह से व्याकुल होकर मेघ के द्वारा अपना सन्देश पहुँचाती है। इस प्रसंग में श्रीनेमिनाथ जी की बालक्रीडा, पराक्रम-वर्णन और विवाहोत्सवादि का वर्णन करके राजीमती की विरहव्याकुल अवस्था का वर्णन है। मेघ द्वारा प्रभु नेमिनाथजी को सुनाये जाने वाले सन्देश को सुनकर राजीमती की सखियाँ कहती हैं कि अब उसे इस महामोह का प्रतिबोध रूपी शस्त्र से नाश करना चाहिये। राजीमती भी यह सुनकर शोक का परित्याग करके नेमिनाथजी के पास जाकर व्रत ग्रहण कर लेती है। स्वामी के ध्यान से तन्मयत्व पाकर मुक्तिपद प्राप्त करती है। काव्य-समीक्षा : कालिदास के ‘मेघदूत’ के अनुकरण पर लिखे गये काव्यों से यह भिन्न है। मन्दाक्रान्ता छन्द में निबद्ध इसमें १६६ श्लोक हैं। कवि का भाषा पर पर्याप्त अधिकार है। प्रसाद गुण का अभाव है। काव्य में यत्र-तत्र क्लिष्ट और श्लिष्ट कल्पना से युक्त पद मिलते हैं। कामदेव की युद्ध-सज्जता का वर्णन करते हुए कवि कहता है - १. शीलरत्नसूरि विरचित वृत्तिसहित, जैन आत्मानन्दसभा भावनगर से १६२४ ई. में प्रकाशित। सन्देशकाव्यपरम्परा ३४७ F की मी वानस्पत्याः कलकिशलयैः कोशिकाभिः प्रवालैःमिलन 16: तस्या राजनिव तनुभृतो रागलक्ष्मीनिवासाः। हार की जरूस लिग EFFउद्यन्मोहप्रसवरजसा चाम्बरं पूरयन्तोऽi सलाही कि प्रत्र RAMIE भीकाभीष्टा मलयमरुतः कामवाहाः प्रशंसः ।। २॥ ॥ शान इस श्लोक के पूर्वार्द्ध में अपनुति और रूपक अलंकार है और उत्तरार्द्ध में उत्प्रेक्षा और श्लेष अलंकार है। एक ही पद्य में चार अलंकार हैं। काव्य का प्रारम्भ विप्रलम्भ शृङ्गार से ही है। वसन्त वर्णन-इत्यादि के प्रसंग में शृङ्गारमय वर्णन भी पाये जाते हैं। कवि ने कृष्ण की पत्नियों की श्रीनेमिनाथ के साथ सरस क्रीडाओं का ललित वर्णन किया है। अन्त में कवि ने काव्य का पर्यवसान शान्त रस में किया है। विचारतारतम्य और रस की दृष्टि से यह काव्य उच्च कोटि का है। जैन संस्कृत साहित्य में यह रचना विशिष्ट स्थान । रखती हैं। माना कि कि कितनी शिम कि फिर ) माझाए