२६ विक्रम कवि का नेमिदूत

‘नेमिदूत’ काव्य किसी विक्रम कवि का लिखा हुआ है। इसके जन्म के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह खम्भात का रहने वाला था, १४वीं शताब्दी के श्वेताम्बर एवं खरतर गच्छाधीश श्रीजिनेश्वरसूरि का श्रावक भक्त था। कुछ विद्वान् इसे वि. की १५वीं शताब्दी में मानते हैं। नेमिदूत की कथा : इस काव्य की कथावस्तु जैनियों के तीर्थंकर श्रीनेमिनाथ जी के जीवन से सम्बद्ध है। इसमें नायिका की प्रणय-कथा है, जिसके अनुसार नायक नेमि हैं, जो पहले द्वारका के राजा थे, किन्तु उन्होंने अपना राज्य छोड़कर मुनिवृत्ति अपनाई और रैवतक पर्वत पर तप करने लगे। राजीमती, जिससे उनका विवाह होने वाला था, यह वृत्तान्त सुनकर मूर्छित होती है। वह उन्हें अपने मन में पति रूप से ही मानती है। प्रथम वह वृद्ध ब्राह्मण को दूत बनाकर भेजती है, पश्चात् पिता की आज्ञा से वह स्वयं सखी के साथ रैवतक पर्वत पर पहुँचती है।। अपनी दीन-दशा का वर्णन करती हुई राजीमती श्री नेमिनाथजी से द्वारिका चलने की प्रार्थना करती है। इस प्रसंग में द्वारिका नगरी के सौन्दर्य और वैभव का वर्णन किया गया है। सब कुछ सुनकर नेमि विमुख रहे, तब सखी ने राजीमती की करुण अवस्था का वर्णन किया। अन्त में श्री नेमिनाथजी राजीमती पर दयाभाव दिखलाते हैं और धर्मोपदेश द्वारा मोक्षसुख की प्राप्ति के लिए उसको योग की सहचरी बना लेते हैं। PRATE काव्य-समीक्षा : ‘मेघदूत’ के पद्यों के अन्तिम चरणों को लेकर समस्यापूर्ति के रूप में यह काव्य लिखा गया है। समस्यापूर्ति के साथ-साथ कवि ने अपनी रचना में मूलभावों की रक्षा की है। इस काव्य में प्रसादगुण का शृङ्गारित माधुर्य है। गीतितत्त्व की विशेषता आदि से अन्त तक निर्भर है। सम्पूर्ण काव्य में १२६ श्लोक हैं। समग्र काव्य राजीमती के विरह तथा विलाप के वर्णन से भरा हुआ है। काव्य में विप्रलम्भ शृङ्गार और शान्तरस का अपूर्व संगम है। राजीमती के विरह-वर्णन में काव्य में ३२ पद्य लिखे गये हैं, भाव और भाषा की दृष्टि से ये पद्य अनुपम हैं और राजीमती का करुण चित्र पाठकों के सामने उपस्थित करते हैं। यथा १. जैन प्रेस, कोटा से प्रकाशित । ३४६ काव्य-खण्ड F लगा । या प्रागस्याः क्षणमिव नवर्गीतवार्ताविनोदै- कि निमा किन रासीत् शय्या-तल विगलितैर्गल्लभागं विलंघ्य। ‘कामना रात्रिं संवत्सरशतसमां त्वत्कृते तप्तगात्री तामेवोष्णविरहजनितैरश्रुभिर्यापयन्ती।। ६७।। समस्यापूर्ति के बन्धन में रहते हुए भी कवि ने अपनी रचना में कहीं पर भी कृत्रिमता नहीं आने दी है। प्रासादिक भावमधुर भाषा में कवि ने अपनी कल्पना को और भी प्रौढ़ता प्रदान की है। इसमें सखी का दौत्य होने से ‘नेमिदूत’ नाम की व्याख्या नेमि के लिये दूत इस रूप में अभीष्ट है। जिनका जनमत EEPIF