२२ पुन्नशेरि श्रीधरन् नम्बी का नीलकण्ठसन्देश

“केरल के वल्लूवनाड तालुके में इंगयूर नामक ग्राम में पुत्रशेरि श्रीधरन् नम्बी का जन्म हुआ। परम्परा से इनके कुटुम्ब के लोग कोटिवकोट नामूदरि के सचिव रहे हैं। इनके आचार्य प्रसिद्ध मलयाली साहित्यकार भारत विशारदी थे। इनकी निम्नांकित कृतियाँ हैं - १. परिवेदनशतकम्, २. भागवतसंग्रह, ३. अष्टकावलि, ‘४. विक्रमादित्यचरितम् (५ सर्ग) ऐतिहासिक काव्य, ५. नीलकण्ठ-सन्देश। शीला श्रीधरन नम्बी द्वारा रचित ‘नीलकण्ठ-सन्देश’ काव्य विषय की दृष्टि से नवीन है। इस दूत-काव्य में १२६ श्लोक हैं। कवि की यह रचना १७७४-१८३१ ई. के मध्य की है। नायक स्वयं कवि है जो भारतपुल्ला के उत्तर में इंगयूर स्थल में कामविधुर होकर निवास करता है नियमशानी का TAPUR कश्चित्कान्तः विरहविधरः साश्रमे निस्सहाय- क निक शुमार का स्तदवकत्राम्भोरुहमपि सदा भावयन्नन्तरगे। RESE FIRTHER ईहाक्षेत्रे किमपि चनिलामुत्तरेणैव कामीणकाला डामेने किमपि चनिलामत्तरेणैव कामी लामाका चक्रे वासं भुवनजननीनित्यसान्निध्यपूर्णे।। १।। शित एक दिन वह नीलकण्ठ को देखता है और उसे अपना सन्देश सुनाने के लिये प्रियतमा के पास भेजता है। नीलकंठ भारतपुल्ला के उत्तर में स्थित इंगयूर स्थल से चेर्पुलशेरि जाता है। मार्ग-वर्णन में कवि ने पुष्पक्रोड, मरुत्पुरादि नगरी का, प्रियतमा के घर का, समृद्धि से परिपूर्ण देवालय का वर्णन किया है। भगवान् को प्रणाम करने के पश्चात् नीलकण्ठ को प्रियतमा को सन्देश सुनाने का आदेश है। दूत के सन्देश को पाकर अचिरेण नायिका उसकी कामविधुरता दूर करती है। नीलकण्ठ जिसका सहायक है, उसको क्या दुर्लभ है ? यथा -नए किस पर जिलागि का शिका - येषां तावत् भवति शरणं नीलकण्ठस्तु साक्षात् । - तेषां पुण्यप्रथितजनुषामत्र किं दुर्लभः स्यात्।। १२६।। उत्तरार्द्ध।। साहित्यिक दृष्टि से यह दूत-काव्य महत्त्वपूर्ण नहीं है।