१९ श्रीकृष्णसार्वभौम का पादाङ्कदूत

महामहोपाध्याय श्रीकृष्णसार्वभौम ने विक्रम सं. १७८० में पादाङ्कदूत नामक सन्देश-काव्य की रचना की। तत्कालीन नवद्वीप के राजा रघुरामराय के आदेश से यह दूत-काव्य लिखा गया। बंगाल के दूत-काव्यों में इस छोटे से काव्य का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। काव्य की कथा : कृष्ण के विरह में व्याकुल गोपिका यमुनातह पर एक कुञ्ज के समीप ही कमल, कुलिश, रथ आदि के चिह्नों से युक्त श्रीकृष्ण का चरणचिन देखती है। मेघों का घोर गर्जन सुनकर विरह में उन्मत्त होकर वह कृष्ण के चरणचिह्न को ही दूत बनाकर श्रीकृष्ण के पास मथुरा भेजना चाहती है। १. श्री जीवानन्द विद्यासागर द्वारा सन् १८८८ में कलकत्ता से प्रकाशित। २३८ ना सन्देश ले जाने के अभिप्राय से गोपी ने कृष्ण के चरणचिह्न की विविध प्रकार से प्रशंसा की। फिर यमुना के तट से मथुरा तक के मार्ग की मनोज्ञता, सुगन्धित और शीतल वायु द्वारा उसके स्वागत और तब उसकी निर्भीकता तथा सामर्थ्य का सहृदयपूर्ण वर्णन है। पैदल चलने में यदि चरणचिह्न को कष्ट हो तो वह गोपी अपना मनरूपी अश्व देने को प्रस्तुत हो जाती है। इस प्रकार चरण-चिहन को मथुरा जाने का प्रोत्साहन देकर बह गोपी अपनी विरह-व्यथा का भावपूर्ण कथन करती है, फिर कृष्ण से कहने के लिये अपना सन्देश सुनाती है। कि त REE FREE IS A कि कार किया F सन्देश में कृष्ण को केवल वृन्दावन की स्मृति ही दिलाई गई है तथा कुब्जाप्रेम पर उन्हें उपालम्भ भी दिया गया है। अन्त में कृष्ण-विरह से उत्पन्न अपनी मनोव्यथा का निवेदन कर गोपी सन्तुष्ट हो जाती है। इस दूतकाव्य की रचना श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के तीसवें अध्याय में आये हुए २४, २५, २६वें श्लोकों के आधार पर की गई है। काव्य-सौन्दर्य : श्रीमद्भागवत और मेघदूत का प्रभाव होते हुए भी कवि ने अपनी स्वतन्त्र कल्पनाशक्ति से काम लिया है। काव्य में मन्दाक्रान्ता छन्द है, अन्तिम श्लोक में शार्दूलविक्रीडित है। यह काव्य सुमधुर भावप्रवाह, ललित प्रासादमयी भाषा, सरस कल्पना तथा कृष्णभक्ति से परिपूर्ण होने के कारण प्रशंसनीय है। साहित्य, भक्ति और दर्शन इन तीन धाराओं का काव्य में अपूर्व संगम है। काव्य का अङ्गी रस विप्रलम्भ शृगार है। गोपी के विरह में प्रेम की सरलता और पवित्रता व्यक्त की गई है। गोपिका की विरह-वेदना को कवि ने निम्नांकित श्लोक में • भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया है। उत्तप्तोऽयं मदनजनितो वर्धते नित्यमुच्चै- प्रतिक वृन्दारण्ये वसतिरधुना केवलं दुःखहेतुः। किं चास्मार्क नयनसजिलैर्वर्धत चेत्रदीयं कला 2 केन स्थैर्य द्रूतगतिजलैराचिते कुञ्जमध्ये।। ३८॥ जादालारामात गोपी की प्रेम-भक्ति-भावनाओं का कवि नै सजीव चित्रण किया है। स्थान-स्थान पर दार्शनिक प्रसंगों की सहायता से कवि ने गोपियों के कथन को भावपूर्ण बना दिया है।