शतावधान कवि श्रीकृष्णदेव ने वि. अष्टादश शतक के पूर्वार्द्ध में ‘भृगदूत’ की रचना की। काव्यसार : परमपुरुष श्रीकृष्ण भगवान् के विरह में एक गोपी अत्यन्त व्याकुल रहती है। एक दिन प्रातःकाल मधुर गुञ्जन करता हुआ भौंरा देखकर, वह उसे ही दूत बनाकर श्रीकृष्ण के पास वृन्दावन भेजती है। कवि ने मार्ग-वर्णन के प्रसंग में वृन्दावन का सरस वर्णन किया है। नन्द-गृह, यशोदा और गोपियों की विलासमय चेष्टाओं का सरस वर्णन है। कवि ने भुंग को गोवर्धन पर्वत पर कृष्णजी की क्रीडाभूमि में गोपिकाओं और गोपालों के बीच में कृष्णजी के मिलने पर उचित अवसर देखकर सन्देश सुनाने के लिये प्रार्थना की है। कृष्ण की स्तुति करके यह सन्देश सुनाने के लिये कहा है कि हे गोपीरमण, एक गोपी ने अपनी विरहावस्था सुनाने के लिये मुझे आपके पास भेजा है। चाँदनी उसके लिये अग्नि के सदृश है, शय्या अंगारों का पुष्पहार हो रही है, बाँसुरी का स्वर तो उसे मुच्छित कर देता है। सभी प्राणी तुम्हारी माया के वश में हैं। एकमात्र प्रार्थना है कि तुम्हारे चरणकमलों को सदा हृदय में धारण किये रहूँ और सदैव तुम्हारे ध्यान में मग्न रहूँ। इतना सन्देश देकर शृंग को वृन्दावन के पुष्पों में विहार करने तथा कृष्ण की वैजयन्तीमाला में निवास पाने के लिये शुभाशीषु देती है। सन्देश समाप्त होते ही श्रीकृष्ण भगवान् साक्षात् प्रकट हो जाते हैं और उस गोपिका को अपने परमधाम को ले जाते हैं। काव्य-सौन्दर्यः ‘मेघदूत’ के अनुकरण पर लिखे गये इस काव्य में १२६ श्लोक हैं। मन्दाक्रान्ता छन्द है। कहीं-कहीं मेघदूत की पदावली का प्रभाव भी दिखलाई देता है। यथा - (१) सन्तप्तानां त्वमसि शरणं तत् पयोद! प्रियायाः। (मे.दू. ७) (२) सन्तप्तायां मयि करुणया याहि तूर्णं तथापि। ( .दू. २२) १. नागपुर विश्वविद्यालय पत्रिका सं. ३ दिसम्बर, सन् १९३७ में प्रकाशित। म नि सन्देशकाव्यपरम्परा ३३७ । वैष्णवों के भक्ति-साहित्य में यह काव्य अपनी भक्ति-भावना, रस, विषय और भाषा-शैली के कारण लोकप्रिय है। काव्य में उदात्त भावना है। यहाँ प्रेम को अपने दिव्य स्वरूप में निदर्शित किया गया है। कवि की कल्पनाशक्ति अनुपम है। उसने अपनी कल्पना से यमुना, गोवर्धन पर्वत, राजवीथी पर चलती हुई गोपियों के सजीव चित्र सरसता से अंकित किये हैं। गोपी की विरहव्याकुलता कवि ने भावपूर्ण शब्दों में कही है। उपमा और अनुप्रास का सौन्दर्य लोभनीय है। काव्य की भाषा प्रासादिक, माधुर्यगुणमण्डित है। काव्य में सर्वत्र पवित्र भावना की प्रधानता है। काव्य में मार्मिक उक्तियों का प्रयोग है। भाषा में सर्वत्र कोकिल, शुक और भौंरों के मधुर संगीत का प्रवाह है। उपमा और अनुप्रास द्रष्टव्य है। यथा का कामं कल्पद्रम इव भवानाश्रितानां जनानां शहरी गा l कामा नैके फलतु मम तु प्रार्थनैयं निसर्गात् ।। ६२१॥ कि एक विनि कुब्जे कुजे कतवसतिभिः कोमलं कित्ररीभि-दिल्ली जाता मिकामा स्तन्त्रीतालध्वनिसहचरं तायते यत्र गानम् ।। २।। किन _ ‘मेघदूत’ के समान ही इस काव्य में कवि ने मार्मिक उक्तियों का प्रयोग कुशलता से किया है। यथा - TATEMB | संसारेऽस्मिन् विकसितसुखं यत्सजातीयसंगात्। चाक कालि रिल तस्यावश्यं न खलु सदृशं जन्यते कैश्चिदन्यैः ।। ५८ र अनुपम काव्य-सौन्दर्य तथा कृष्ण-भक्ति की भावना से परिपूर्ण यह सन्देश-काव्य सदैव लोकप्रिय है।