१६ रुद्रन्यायपञ्चानन का भ्रमरदूत

रुद्रन्यायपञ्चानन ने सत्रहवीं शताब्दी में ‘भ्रमरदूत’ की रचना की। रुद्रन्यायपञ्चानन के पिता काशीनाथ विद्यानिवास तथा पितामह रत्नाकर विद्यावाचस्पति नवद्वीप (बंगाल) में रहते थे। इन्होंने लगभग २६ ग्रन्थों की रचना की। बंगाल के एक प्रमुख नैयायिक तथा कवि के रूप में इन्होंने संस्कृत साहित्य को समृद्ध बनाया है। काव्य की कथा : इस काव्य की कथा रामायण की कथा से सम्बद्ध है। कवि ने अपनी कल्पना से एक और घटना बढ़ा दी है। रावण जब सीताहरण करता है, उसके पश्चात् रामचन्द्रजी माल्यवान् पर्वत पर पहुंचते हैं। वहाँ से सीताजी की खोज के लिए हनुमान् को लंका भेजते हैं। लंका से सीताजी का पूरा पता लगाकर तथा उनकी चूड़ामणि लेकर हनुमान जी एक दिन वापिस आ जाते हैं। इधर रामचन्द्रजी सीताजी के विरह में व्याकुल तो रहते ही हैं कि निकट के एक सरोवर में एक भ्रमर-मिथुन उन्हें दिखलाई पड़ जाता है। बस वे भ्रमर को ही दूत बनाकर लंका में अशोकवाटिका में स्थित सीताजी के पास अपना प्रेम-सन्देश देकर भेज देते हैं। सर्वप्रथम राम ने भ्रमर को अपना परिचय देकर दुःख के कारण अपनी दयनीय दशा बताई है। फिर वहाँ से लंका तक का मार्ग बताते हुए चित्रकूट, नर्मदा और विन्ध्याचल होते हुए चक्करदार मार्ग से लंका जाने का निर्देश दिया है, तब कर्नाटक से कावेरी नदी पार कर काञ्ची नगर में पहिले शिवकाञ्ची फिर विष्णुकाञ्ची जाने का परामर्श दिया है, फिर नद-नदी और समुद्र को पार करने के बाद लंका नगरी की अशोकवाटिका में सीता के दर्शन करने का निर्देश कथित है। इस प्रकार भ्रमर के वहाँ पहुँचने पर पहिले सीता की कष्टमय अवस्था का वर्णन है, तब सीताजी से अपना सन्देश कहने का भ्रमर से आग्रह किया गया है। फिर भ्रमर के प्रति मंगलकामना प्रकट कर काव्य समाप्त किया गया है। काव्य-सौन्दर्य : बंगाल के सरस सन्देश-काव्यों में भ्रमरदूत का विशेष स्थान है। मन्दाक्रान्ता छन्द में निबद्ध यह सन्देश-काव्य एक सरस और सुन्दर काव्य है। विप्रलम्भ शृङ्गार के अनुकूल ही काव्य में माथुर्य गुण तथा वैदर्भी रीति है। यह काव्य मेघदूत का सफल अनुकरण है, फिर भी यह काव्य सुन्दर कल्पनाओं से तथा कबि की स्वतन्त्र उद्भावनाओं से परिपूर्ण है। इस काव्य में उपमा, यमक, अनुप्रास, काव्यलिंग तथा अर्थान्तरन्यासादि अलंकारों का मनोरम सौन्दर्य है। निम्नांकित श्लोक में वृत्यनुप्रास का सौन्दर्य द्रष्टव्य है। यथा - १. डॉ. यतीन्द्र बिमल चौधरी द्वारा सन् १६४० में कलकत्ता से प्रकाशित। सन्देशकाव्यपरम्परा लीलोद्यानं ललितलवलीलम्बिरोलम्बमालं किती मन्दोन्मीलबकुलमुकुलामोदमेदं विपश्येः ।। २०।। कवि ने सीताजी की विभिन्न विरहावस्थाओं का वर्णन करते हुए सुन्दर उपमा दी है। यथा - स्निग्धाशोकदुमपरिसरे तत्र रात्रिञ्चरीभिः । व्यग्रामेकां प्रकृतिकृपणां मित्र जायां प्रपश्येः। वाष्पासारस्नपितनयनां पाणिलीनाननेन्दु बनामार यूथभ्रष्टामिव मृगव● मद्गतप्रौढरागाम् ।। ८६ ।। मार्गवर्णन के प्रसंग में कवि ने प्राकृतिक दृश्यों, नगरों तथा नगरवासियों का भावपूर्ण सरस चित्र प्रस्तुत किया है। सीताजी के वियोग में रामचन्द्रजी के साथ ही पालित मयूर और हरिण को भी व्याकुल और निश्चेष्ट वर्णित किया गया है। इस काव्य में अनेक स्थलों में मेघदूत से शब्द-साम्य और भाव्य-साम्य पाया जाता है। यथा - (१) आपृच्छस्व प्रियसहचरी त्वद्गतप्रौढरागाम्।। १४ ।। भ्र.दू. आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुङ्गमालिंग्य शैलम् ।। १।। ४८ मेघ. BARD