१२ हंसदत

चैतन्य महाप्रभु के शिष्य रूपगोस्वामी ने एक हंसदूत की भी रचना की है। कथा काल्पनिक है। भागवत के एक प्रसंग से प्रेरणा प्राप्त हुई है। मूल घटना में कवि ने अपनी प्रतिभा से एक और चमत्कारपूर्ण घटना जोड़ दी है। काव्य की कथा इस प्रकार है - भगवान् श्रीकृष्ण जब अक्रूर के साथ मथुरा चले जाते हैं, तब राधा उनके विरह में बड़ी चिन्तित रहने लगती है। किसी दिन खिन्नमना राधा मनोरंजन के लिये यमुना-तट पर जाती है, लेकिन कृष्ण की स्मृति से वह तत्काल मूर्छित हो जाती है। उसकी सखियों के उपचार के अवसर पर एक सखी ललिता को एक हंस दिखाई पड़ जाता है। वह उसे ही अपना दूत बनाकर कृष्ण की सभा में मथुरा भेजती है। अक्रूर वाला मार्ग ही हंस से अपनाने को कहा है। प्रथम कदम्ब वृक्ष, रासस्थली, वनशाला सदन के बाद गोवर्धन पर्वत और कदम्ब वनवाटी से होते हुए भाण्डरी वन तथा ब्रह्मा के मोहन स्थान का वर्णन किया गया है। फिर हंस से कालियहद के मधुर जल को पीकर तथा उसके निकट ही विराजमान वृन्दा देवी की वन्दना करके आगे बढ़ते हुए एकादश तथा द्वादश वन को पार करने के बाद हंस के मथुरा पहुँच जाने का वर्णन है। कृष्ण के अन्तःपुर और क्रीडागृह का भी वर्णन किया गया है। कृष्ण के मधुर स्वरूप का कुछ दिग्दर्शन कराने के बाद उचित अवसर देखकर कृष्ण को अपना सन्देश सुनाने की ललिता ने हंस से प्रार्थना की है। सन्देश में ललिता ने कपिला गाय, गोकुल तथा गोपियों की दीन दशा का वर्णन किया है। पश्चात् राधा की कृष्णविरहजन्य विभिन्न भावनायें और अवस्थायें वर्णित हैं। अन्त में हंस से भगवान् कृष्ण की वनमाला, मकरकुण्डल, कौस्तुभमणि और पाञ्चजन्य शंख की प्रशंसा करने के लिये कहा गया है। हंस से कृष्ण के दशावतारों की कथा सुनाने का परामर्श दिया है। अन्त में हंस को मथुरा जाने के लिए प्रोत्साहित किया है। यहाँ पर काव्य की समाप्ति है। जी मकान माल

काव्य-सौन्दर्य

शिखरिणी छन्द में निबद्ध काव्य में कुल १४२ श्लोक हैं। कृष्ण की लीलास्थली का वर्णन चित्ताकर्षक है। गोवर्धन गिरि, कालियहद का चित्रांकन आनन्ददायक है। शृङ्गार रस में भक्ति का पुट देकर कवि ने रसिक तथा भक्तजनों के मन को प्रमुदित किया है। कालियहद के वर्णन में कवि ने गोपियों की आतुरता, उत्कण्ठा और चिन्ता का सुन्दर चित्रण किया है। मथुरा का सौन्दर्य-वर्णन करते हुए कवि कहता मा. शशीत मोकनाशिक १. श्री जीवानन्द विद्यासागर द्वारा सन् १६८८ में कलकत्ता से प्रकाशित। सन्देशकाव्यपरम्परा 339 पुरी यस्मिन्नास्ते यदुकुलभवां निर्मलयशो-जा पता विमान भराणां धाराभिर्धवलितधरित्रीपरिसरा।। ३२।। Rai कवि ने कृष्ण के अनुपम सौन्दर्य का वर्णन पाठकों और भक्तों के समक्ष प्रस्तुत कर उनके हृदय में आनन्द की लहर उमड़ा दी है। ललिता ने राधा की विरहावस्था का वर्णन किया है। वह कहती है कि राधा के प्राणरूपी हरिण आजकल में उसके शरीररूपी वन में कृष्ण के विरह की आग लगी हुई है तथा कामदेवरूपी शिकारी अपने बाणों से उसे निरन्तर पीड़ा पहुँचा रहा है - समन्तादुत्तप्तस्तव विरहदावाग्निशिखया कृतोद्वेगः पञ्चाशुगमृगयुवेधव्यतिकरैः। गलती पर सरकार तनूभूतं सद्यस्तनुवनमिदं हास्यति हरे | PRETRIETY हठादद्य श्वो वा मम सहचरीप्राणहरिणः।। ८६|| यहाँ रूपक के आवरण में कवि ने राधा की विरह-वेदना का मार्मिक वर्णन किया इस काव्य के कुछ पद्यों में मेघदूत की छाया है। यह काव्य कृष्णभक्ति का अमर सन्देश पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है।