०७ उदय कवि का मयूरसन्देश

उदय कवि के ‘मयूरसन्देश’ का रचनाकाल पंचदश शतक का पूर्वार्द्ध अथवा १४०० ई. के कुछ बाद का ही है। इस लेखक ने ‘ध्वन्यालोक’ की लोचन नामक टीका पर ‘कौमुदी’ नाम की स्वयं अपनी टीका लिखी है। इसमें एक श्लोक (सं. ६५) सन्देश-काव्य के उत्तर-भाग में भी पाया जाता है। काव्य की कथा: मालाबार के राजा श्रीकण्ठ के परिवार का कोई राजकुमार अपनी रानी मारचेमन्तिका के साथ प्रासाद की छत पर विहार कर रहा था। उसी समय कुछ विद्याधर आकाश-मार्ग से जाते हुए उन्हें शिव और पार्वती समझकर उनकी पूजा करने लगे। नायक उनकी भ्रान्ति देखकर हँसा। विद्याधर ने उसे शाप दे दिया-एक मास तक पत्नी से वियुक्त रहो। नायक त्रिवेन्द्रम् जा पहुंचा और वहाँ से अन्नकर में रहने वाली प्रेयसी के पास उसने मयूर से सन्देश भेजा। त्रिवेन्द्रम् से अन्नकर तक के मार्ग का सुन्दर वर्णन है। यात्रापथ के वर्णन में मार्ग के पड़ने वाले नगरों, मन्दिरों, नदियों तथा समुद्रतट का वर्णन है। मार्ग-वर्णन के बाद अन्नकर नगरी, नायिका के गृह, उद्यान और प्रीतिलता का वर्णन है। यहीं पर विरहशय्या पर पड़ी हुई नायिका के मिलने की सम्भावना की गई है। यहीं पर मयूर को प्रेयसी के पास सन्देश पहुँचाने की सम्भावना कर अन्त में राजकुमार उसके प्रति शुभकामना व्यक्त करता है। 12 साहित्यिक समीक्षा : इस काव्य में वस्तु-वर्णन, छन्द तथा शिल्पविधान में मेघ-सन्देश से साम्य है। माधुर्य और प्रसाद गुण के सौन्दर्य के साथ ही काव्य में समासबहुला क्लिष्ट पदावली भी है। कर्णप्रिय अनुप्रास और यमक यत्र-तत्र काव्य में पाठक को प्रमुदित करते हैं। यथा - १. डा. सी. कुन्हन राजा द्वारा सम्पादित तथा ओ.बी.ए. पूना से सन १E४४ में प्रकाशित । AIEEE ३२५ सन्देशकाव्यपरम्परा जोगी। गफ १. कुंजे कुंजे कुसुमिततले यत्र कूजाच्छलेन।। २।। मंड २. जानीहि त्वं जनितजनतानन्द जायाविमुक्तम्।। १।। १६ उपर्युक्त पद्यांश में अनुप्रास का सौन्दर्य विद्यमान है। विरह के करुण चित्रांकन में भावसौन्दर्य है, कवि की मौलिक प्रतिभा के दर्शन होते हैं, कवि की शैली प्रभावपूर्ण है। दक्षिण भारत के सन्देशकाव्यों में इस काव्य का साहित्यिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान है।