०६ उद्दण्डशास्त्री का कोकिलसन्देश

पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कोकिलसन्देश के रचयिता उद्दण्डशास्त्री तामिल ब्राह्मण थे। उनका आश्रयदाता मानविक्रम नामक साहित्यप्रेमी राजा था। कवि ने अपने नाटक ‘मल्लिकामारुत’ में अपने आरम्भिक जीवन का परिचय दिया है। उसके अनुसार उद्दण्ड कवि क्षीर (पालार) नदी के तट पर आधुनिक ‘चिंगलपुर’ नामक जनद में तोण्डामण्डल के निवासी थे। वे विधिवत् अध्ययन करके दिग्दिगन्तर का दर्शन करने के लिये आन्ध्र, कलिंग और चोल देशों में भ्रमण करके अन्त में केरल पहुँचे। केरल में आकर उद्दण्ड ने वहाँ के कवियों को चुनौती भी दी।F PE FRE ००५ काव्यकथा : एक प्रेमी अपने प्रासाद में प्रेयसी के साथ सो जाता है। प्रभात होते ही वह देखता है कि काञ्ची नगरी में देवी के मन्दिर के पास वह खड़ा है। वह यह आकाशवाणी सुनता है कि वकणपुर से अप्सरायें विमान में उसे ले आयी हैं और यदि पाँच महीने तक वह काञ्ची में रह ले तो उसका अपनी प्रेयसी से वियोग कभी न होगा। काञ्ची में वह किसी तरह तीन महीने काट लेता है, किन्तु वसन्त ऋतु के आने पर समीप ही कोकिल का कूजन सुनकर वह व्याकुल हो उठता है और उससे ही सन्देश ले जाने का निवेदन करता है। इस प्रसंग में काञ्ची नगरी के चूर्णा नदी के तट पर स्थित जयन्तमंगल नामक देश तक के मार्ग का कवित्वपूर्ण वर्णन है। काञ्ची से कोकिल की यात्रा प्रारम्भ होती है। मार्ग में श्रीकामाक्षी, श्रीविष्णु का दर्शन करके क्षीरसिन्धु नामक नदी से कावेरी नदी तथा इसके तट पर स्थित होसल देश पहुँचने का कोकिल को परामर्श दिया है। कोट्टयम् की चर्चा करते हुए महाराज हरिश्चन्द्र का उल्लेख किया है। वहाँ से शम्बर और कोलदेश से निला नामक नदी पार करके पोर्कलम् में महर्षि पय्यूर के आश्रम को देखने के पश्चात् चूर्णा को पार करके जयन्तमंगल नगरी में प्रेयसी को प्रियतम का सन्देश सुनाने की प्रार्थना की गई है। अन्त में अभिज्ञान-घटनाएँ बतला कर कोकिल को आशीर्वाद देकर काव्य समाप्त किया, गया है। काव्य-समीक्षा : कोकिलसन्देश का स्थान सन्देश-काव्यों में महत्त्वपूर्ण है। मन्दाक्रान्ता छन्द में निबद्ध सुरम्य स्थलों के वर्णन में भावपूर्णता है, विरही नायक और उसकी नायिका के वर्णन में कोमल भावों का माधुर्य है। उपमा, उत्प्रेक्षा और रूपक अलंकारों से काव्य हृदयंगम है। चूर्णा नदी का वर्णन करते हुए कवि ने नदी में नायिका आरोप किया है .. १. श्री पी.एस. अनन्त नारायण शास्त्री की टिप्पणी सहित मंगलोदयम् प्रेस, त्रिचूर से १E३E में प्रकाशित।३२४ काव्य-खण्ड नि चारुस्वच्छा शफरनयना चक्रवाकस्तनश्रीः कल्लोलभूः कमलवदना कम्रर्शवालकशा। संसेव्या स्यात् सरसमधुरा साऽनुकूलावतीर्णै की दुहिान्यैरिति हि सरणिः काऽपि गाम्भीर्यभाजाम्।। १ ।। ८६ अनेक स्थलों पर मेघदूत के समान भाव तथा शब्द पाये जाते हैं। मेघदूत का यह सफल अनुकरण है।