धोयीरचित ‘पवनदूत’ कालिदासकृत मेघदूत की परम्परा में एक श्रेष्ठ सन्देश-काव्य है। कालिदास के मेघदूत के आदर्श पर बङ्गाल के राजा लक्ष्मणसेन के आश्रित कवि ने आश्रयदाता महाराज को नायक बनाकर बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ‘पवनदूत’ की रचना की। इनके समकालीन राजाश्रित कवि जयदेव थे। कविराज धोयी की एकमात्र रचना ‘पवनदूत’ मिलती है। परन्तु उनके अन्य ग्रन्थ होने के पर्याप्त संकेत मिलते हैं; यथा - पवनदूत में ही ‘वाक्सन्दर्भा कतिचिदमृतस्यन्दिनो निर्मिताश्च" का स्पष्ट संकेत कवि की १. पवनदूत, श्लोक संख्या १०४ सन्देशकाव्यपरम्परा ३१५ अन्य सरस रचना की ओर है। सुभाषित ग्रन्थ- ‘सदुक्तिकर्णामृतम्’ में कवि के कुछ पद्य उद्धृत हैं।
पवनदूत’ की कथावस्तु
गौड देश के राजा लक्ष्मणसेन दिग्विजय करते हुए मलयाचल तक पहुँचते हैं। वहाँ कनकनगरी में रहने वाली कुवलयवती नाग की गन्धर्वकन्या राजा को देखकर मुग्ध हो जाती है। राजा जब अपनी राजधानी में लौट आता है तो वह विरह में व्याकुल होकर वसन्त-ऋतु के वायु को अपना सन्देशवाहक बनाकर राजा के पास अपनी विरह-व्यथा सुनाने के लिये भेजती है। काव्य की मूल कथा इतनी ही है। कुवलयवती पवन को मलयगिरि से बङ्गाल तक का मार्ग बताती है और महत्त्वपूर्ण स्थलों का वर्णन करती है। सभी स्थलों का कवि ने कवित्वमय वर्णन किया है। कुछ महत्त्वपूर्ण स्थलों के परिचय में तत्कालीन भौगोलिक स्थिति चित्रित है। मलयगिरि से पवन पाण्ड्य देश की राजाधानी उग्रपुर जाता है, वहाँ से काँची होता हुआ वह माल्यवान् पर्वत पर जाता है। आन्ध्र देश से होते हुए पवन कलिंग नगरी, पश्चात् विन्ध्य पर्वत की ओर चलता है और नर्मदा का दर्शन करता है। फिर वहाँ से ययाति नगरी, दक्षिण-पश्चिम बंगाल जाकर त्रिवेणी होता हुआ लक्ष्मणसेन की राजधानी विजयपुर में पहुँचता है। राजा को कुवलयवती का सन्देश सुनाता है।
साहित्यिक समीक्षा
‘मेघदूत’ के अनुकरण पर ‘मन्दाक्रान्ता’ छन्द में माधुर्यव्यञ्जक वैदर्भी रीति में यह काव्य लिखा गया है। कवि की शैली ललित, मधुर एवं प्रसादपूर्ण है। कवि की प्रगल्भ कल्पना माल्यवान् पर्वत-वर्णन में तथा विजयपुर की राजधानी के वर्णन में द्रष्टव्य है। माल्यवान् पर्वत से बहने वाले झरनों में रामचन्द्रजी के अश्रुपात की कल्पना नितान्त सुन्दर एवं सजीव है। यथा तत्राद्यापि प्रतिझरजलैर्जर्जरा प्रस्थभागाः। मांग निपल तला सीताभर्तुः पृथुतरशुचः सूचयन्त्यश्रुपातान।। २५ सरी कुवलयवती के विरह-वर्णन में जो ३० पद्य हैं वे सजीव और करुणापूर्ण हैं। यथा विन्यस्यन्ती शशिनि नयने दुर्दिनैरश्रुवारां पनि र धाराश्वासैर्बकुलकुसुमामोदमाघ्रातुकामा।। शुश्रषश्च भ्रमरविरुतं मूर्च्छया रक्षितासी । देतातो कि वीक्ष्यावस्थां क इव करुणाकातरः स्यान तस्याः।। । १. संस्कृत साहित्य परिषद् कलकत्ता से १E२६ ई. में प्रकाशित २. पवनदूत, श्लोक सं. १८ ३. वहीं, श्लोक सं. ७८। .३१६ काव्य-खण्ड Bा सा ‘पवनदूत’ में संयोग शृङ्गार और विप्रलम्भ-शृङ्गार दोनों का ही पूर्ण परिपाक मिलता है। यह एक रसपेशल काव्य है। इनमें शृङ्गाररस के अतिरिक्त करुण, वीर आदि रसों को भी यथोचित स्थान मिला है। मामला किया नि आधा ‘पवनदूत’ में कवि ने उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, अतिशयोक्ति, अर्थान्तरन्यास एवं अपनुति आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। कवि ने अलंकारों के प्रयोग में पर्याप्त कुशलता का परिचय दिया है। उपमा का सौन्दर्य निम्नांकित पद्य में है- कति उनक E या गडगेव प्रकतिसभगा जायते केरलीनां PPERORPI कंत कनक कति शीर किलिम केलिस्नाने कचमलयजैः पाण्डिमानं दधाना।-MRPARARE कमालयजैः पाण्डिमानं दधाना। शश्वद्गोत्रस्खलनजनितत्रासलौलस्य सिन्धो - गाई शिला कदीचिप्रश्चरणपतनप्रेमवाचां रसज्ञाकार ERODE का अर्थान्तरन्यास का उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है, यथा -कमी की कि छानाजति णिशी त्वत्तः प्राणाः सकलजगतां दक्षिणस्त्वं प्रकृत्या जङ्घालं त्वां पवन मनसोऽनन्तरं व्याहरन्ति। तस्मादेव त्वयि खलु मया सम्प्रणीतोऽर्थिभावः प्रायो भिक्षा भवति विफला नैव युष्पद्विधेषु ।। २ । 1 शिकार नई कालिदास के ‘मेघदूत’ का अनुकरण करते हुए भी कवि की मौलिक कल्पना का चमत्कार प्रमुदित करता है। भाव, भाषा और शैली की दृष्टि से यह एक सफल सन्देशकाव्य है।
पूर्णसरस्वती का हंससन्देश
पूर्णसरस्वती केरल के ब्राह्मण थे। पूर्णसरस्वती का रचनाकाल ई. ११५० से १५६० के मध्य में ही कहीं पर हो सकता है। इनके गुरु पूर्णज्योति थे, जिनकी प्रशंसा उन्होंने अपनी सभी रचनाओं में की है। पूर्णसरस्वती ने ‘हंस-सन्देश’ नामक गीतिकाव्य के अतिरिक्त रूपकों और टीकाओं की रचना की है। इनकी मेघदूत की टीका का नाम ‘विद्युल्लता’ है। इसके अतिरिक्त उन्होंने मुरारि के ‘अनर्घराघव’, भवभूति के ‘मालतीमाधव’, शंकराचार्य के ‘विष्णुपादादि-केशस्तोत्र’ की टीका भक्तिमन्दाकिनी लिखी। कमलिनी-राजहंस नामक नाटक और शिवकेशपादादिस्तवव्याख्या भी इनकी लिखी हुई है। १. वहीं, श्लोक सं. १६।. २. पवनदूतम्, श्लोक सं.४। ३. त्रिवेन्द्रम् संस्कृत सीरीज से ग्रन्थसंख्या १२६ के रूप में सन् १६३० ई. में प्रकाशित। फिर सन्देशकाव्यपरम्परा ३१७
काव्य की कथा
इस काव्य की कथा काल्पनिक ही है। दक्षिण भारत के कांचीपुर नगर की कोई स्त्री किसी उत्सव के अवसर पर श्रीकृष्ण की विजय-यात्रा देखकर उनके प्रेम में मुग्ध हो जाती है। कृष्ण-विरह में व्याकुल होकर वह पुष्पवाटिका में जाती है, वहीं राजहंस को देखकर उसका स्वागत करती हुई अपने प्रिय कृष्ण के पास सन्देश ले जाने की प्रार्थना करती है। हंस को दूत-कार्य के लिये प्रोत्साहित किया है। इसके बाद विभिन्न स्थानों में कृष्ण की खोज करने का हंस को परामर्श दिया गया है। किश न मार्ग-वर्णन के प्रसंग में सर्वप्रथम हंस को चोल देश जाने का परामर्श दिया गया। है। तत्पश्चात् कावेरी नदी के तट पर विश्राम करते हुए श्रीरंगपुर, वहाँ से पाण्ड्य देश की नगरी श्रीनगरी से होते हुए केरल देश के अनन्तशयन नामक नगर और रक्तद्रुमः नामक स्थान पर जाने का हंस से आग्रह किया है। यमुना पार करके वृन्दावन में नन्द के घोष में कृष्ण के मिलने की निश्चित रूप से सम्भावना की है। यहाँ कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का और स्वरूप का सुन्दर चित्रण किया गया है। कृष्ण की प्रसन्न मुद्रा देखकर हंस से सन्देश-कथन की प्रार्थना की गई है। सन्देश में नायिका ने अपनी विरहावस्था का वर्णन करके अपनी रक्षा के लिये प्रार्थना की है। अन्त में कृष्ण के प्रसन्न होने की आशा न के साथ काव्य समाप्त होता है।
काव्य-समीक्षा
‘हंस-सन्देश’ काव्य में १०२ श्लोक मन्दाक्रान्ता छन्द में निबद्ध हैं। ‘मेघदूत’ की प्रेरणा और अनुकरण पर यह काव्य लिखा गया है। वैदर्भी रीति के अनुकूल माधुर्य और प्रसादगुणयुक्त भाषा का प्रयोग कवि ने सर्वत्र किया है। कवि की कल्पना तथा भाव-विन्यास सहज-सुन्दर है। स्थान-स्थान पर कवि ने सुन्दर उपमाओं तथा उत्प्रेक्षाओं का भी प्रयोग किया है। अनुप्रास की छटा भी दर्शनीय है। यथा-पणार महापाईही समित समाज की सफलता का कुजे-कुजे कुसुमिततले कान्तमन्विष्य यत्नाद्- इत्यादि ।। ४६ ।। विरहिणी नायिका की मोहवेग सी ढकी हुई भावना के लिये कवि ने सुन्दर उपमा दी है। यथा - ME निगालो मा हा दिग्धं कान्त्यां रहसि भवतो दिव्यमङ्गं लिखन्ती नि सद्यःस्विद्यच्चलकरगतां तूलिकामुद्वहन्ती। ताकि कानामा मध्ये मध्ये वहति पिहितां भावनां मोहवेगै –तिम लोकन का- मबर्बाला नीलैरिव जलधरैश्चन्द्रिकामिन्दुरेखा ।। ८७।। पकतनशत-शत यि दक्षिण-भारत के सन्देश-काव्यों में विषय-वस्तु की दृष्टि से यह कवि का सर्वथा नूतन तथा स्तुत्य प्रयास है। कृष्ण-भक्ति-साहित्य में यह काव्य शैली तथा भाव की दृष्टि से एक विशिष्ट स्थान पाने के योग्य है। इसमें शृङ्गार और भक्ति का रमणीय सामञ्जस्य काव्य-खण्ड अशा
वेंकटनाथ या वेदान्तदेशिक का हंससन्देश’
वेदान्तदेशिक दक्षिण भारत के महान् आचार्य और वैष्णव सम्प्रदाय के सर्वोच्च उन्नायक थे। इनका जन्म कांजीवरम् के निकट तुप्पिक ग्राम में वि.सं. १३२५ (१२७८ ई.) में हुआ था। कवितार्किकसिंह, वेदान्तदेशिक और सर्वतन्त्रस्वतन्त्र भी इनकी उपाधि थी। इनका महाकाव्य यादवाभ्युदय और अन्य सैकड़ों रचनायें प्रसिद्ध हैं। उन्होंने हंससन्देश की रचना १४वीं वि. शती में की। हंससन्देश की कथा : इस काव्य की कथावस्तु रामायण से सम्बद्ध है। सीताजी की खोज करने के बाद जब हनुमान लंका लौट आते हैं, तब श्री रामचन्द्रजी रावण से युद्ध करने की तैयारियाँ करने से पूर्व अन्तरिम काल में सीताजी को सान्त्वना देने के लिए . राजहंस को अपना दूत बनाकर लंका भेजते हैं। इस प्रसंग में माल्यवान् पर्वत से लंका नगरी तक मार्ग-भ्रमण करने में कवि ने यत्र-तत्र रमणीय स्थलों का वर्णन किया है। अशोकवाटिका में सीताजी से मिलने का परामर्श दिया है। हंस रामचन्द्रजी के अनेक कष्टों और विरहावस्थाओं का वर्णन सीताजी से करता है। इसके बाद राम का समुद्र पर पुल बाँधकर लंका पहुँचने, लंका का विध्वंस करने और रावण के संहार के बाद सीताजी को वापिस ले आने का आश्वासन देता है। सीताजी को किसी प्रकार जीवन-यापन करने का परामर्श देता है।
- इस प्रकार हंस द्वारा सन्देश भेजकर तथा सेतु द्वारा समुद्र पार कर रामचन्द्रजी लंका पहुँचते हैं। वहाँ रावण को मारकर सीताजी को लेकर प्रसन्नता से अयोध्या आते हैं। और राज्य को पुनः चलाते हैं। यहीं काव्य समाप्त होता है। तमाम गाँ काव्य-समीक्षा : प्रस्तुत काव्य सुन्दर सन्देशकाव्य है। इसमें २ आश्वास तथा १११ श्लोक हैं। प्रसाद और माधुर्य गुण से युक्त यह काव्य मन्दाक्रान्ता छन्द्र में निबद्ध है। काव्य का मुख्य रस विप्रलम्भ शृङ्गार है। राम और सीता के विरह का भावपूर्ण चित्रण है। कवि ने सीता की विरहावस्था का सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करते हुए कहा है शून्या दृष्टिश्श्वसितमधिकं मीलितं वक्त्रपद्म धाराकारं नयन-सलिलं सानुबन्धो विलापा। इत्थं दैन्यं किमपि विधिना दुर्निवारेण नीता सिगार, सा मे सीता तनुतरतनुस्तप्यते नूनमन्तः।।२।। २३ यह सन्देश-काव्य मेघसन्देश का सफल अनुकरण है। विप्रलम्भ-शृङ्गार के साथ-साथ करुण रस भी विद्यमान है। हंस को दूत बनाए जाने का विचार नल-दमयन्ती वृत्तान्त से ही ग्रहण किया है। वि का जित- FIFTS: १. गवर्नमेन्ट प्रेस, मैसूर से तथा बी.रामस्वामी शास्त्रुतु एण्ड सन्स, मद्रास से सन् १६३७ में एक साथ प्रकाशित।
३१ - कुछ विद्वानों की धारणा है कि इस काव्य में शरद ऋतु में हंस ही परमहंस आचार्य है। रामरूपी परब्रह्म से सीतारूपी जीव का विरह मनरूपी दशानन के द्वारा संसाररूपी समुद्र के पार ले जाने के कारण उत्पन्न कर गुरुरूपी हंस को जीव-ब्रह्म के मध्य में सन्देशवाहक बनाकर शरद-ऋतु का वर्णन करते हुए शान्त रस का परिपोष किया है। का भाव, भाषा, छन्द तथा प्रक्रिया की दृष्टियों से यह सन्देश-काव्य अपनी विभिन्न । साहित्यिक विशिष्टताओं के कारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
अज्ञात कवि का हंससन्देश
विक्रम के पञ्चदश शतक में किसी अज्ञात कवि का ‘हंससन्देश’ अपनी विशेषता रखता है। इस सन्देश-काव्य के अन्तर्गत प्रतीकात्मक शैली में ‘वेदान्त’ का विषय बड़े सरस ढंग से समझाया गया है। इस काव्य पर पद्यात्मक टीका मिलती है। खेद की बात है कि कवि तथा टीकाकार दोनों के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं
काव्यसार
कोई शिवभक्त शिवभक्तिरूपी अपनी प्रेयसी के सम्पर्क से अद्वैतानन्द में मग्न है, अपने पूर्व-कर्मों के प्रभाव से माया के वशीभूत हो जाने के कारण वह शिवभक्ति से वियुक्त हो जाता है। कुछ समय बीतने पर वह अपने मनरूपी हंस को दूत बनाकर शिवलोक में स्थित अपनी प्रेयसी शिवभक्ति के समीप प्रेम-सन्देश देकर भेजता है। इस प्रसंग में कवि ने भूमि से शिवलोकपर्यन्त मार्ग तथा मध्यवर्ती स्थान और उन स्थलों के देवताओं का रोचक वर्णन किया है।EETAPF तिः रताला नि सर्वप्रथम हंस से उत्तर दिशा की ओर जाने की प्रार्थना की गई है। तत्पश्चात् गंगा (पिंगला), यमुना (इडा) और सरस्वती (सुषुम्ना) इनके संगम पर स्थित मूल-स्थान तीर्थ होते हुए वहाँ पर विराजमान ईश, गणेश, तारकारि और दुर्गा की पूजा करने के पश्चात् पार्वती के तपोवन में अपर्णा के दर्शन करने का आदेश दिया है। वहाँ से कैलास पर शिवलोकन में ज्ञान-कमल में शिवजी और पार्वती जी को विहार करते हुए बताया गया है। यहाँ पर शिवजी की श्रद्धापूर्वक पूजा करने के बाद शिवभक्ति से हंस के मिलने का उल्लेख किया गया है। यहीं पर शान्ति के साथ विहार करने वाली शिवभक्ति को सन्देश सुनाने की हंस से प्रार्थना की गई है। सन्देश में भक्त ने अपनी दीनावस्था तथा शिवभक्ति की महिमा का । वर्णन किया है। हंस के प्रति अन्त में शुभकामना दी गई है। जिसके बाद की
काव्य-सौन्दर्य
सन्देश-काव्यों की परम्परा में यह काव्य विषय की दृष्टि से नूतन है। भक्तिकाव्य या शान्तरस-प्रधान काव्यों में यह अनुपम है। ‘मेघदूत’ के अनुकरण पर लिखे गये इस काव्य में १०१ श्लोक हैं। मन्दाक्रान्ता छन्द में निबद्ध इस काव्य की भाषा । १. त्रिवेन्द्रम् संस्कृत सीरीज, मद्रास ग्रन्थसंख्या १०३ में सन् १९३० में प्रकाशित। ३२० प्रासादिक, सरस है। शान्त रस की प्रधानता है। अध्यात्ममार्ग, योगमार्ग तथा शैवसिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाले इस काव्य में माधुर्य है और सरसता से कवि ने शुष्क विषय का प्रतिपादन किया है। इस काव्य में मेघदूत के समान ही भाव और भाषा है। कवि की: कल्पना-शक्ति अलौकिक है। उपमा, उत्प्रेक्षा और अनुप्रास का सौन्दर्य स्वाभाविक है। योग के गहन मार्ग को सरल उपमाओं द्वारा सुगम बनाने का प्रयत्न किया है। सुषुम्ना मार्ग का वर्णन करते हुए कवि कहता है - - काक THE TE H SITE फटे मिनाकामा महि लाक्षागृह इव तदा दह्यमाने समन्तात Sist बिना किस किमान सौषुम्नं तत् प्रविश सुषिरं वृत्तिभेदैश्च शक्त्या। मात्रा सुप्तैः सह च सहजैर्भीमसेनः सुरुङ्गा यद्वत् प्राप्तो विदुरगुरुणा पूर्वमेवोपदिष्टाम् ।। १, ३१॥ कवि ने मेघदूत के भावों को भक्ति के प्रसंग में ग्रहण करते हुए मौलिक प्रतिभा को भी दिखाया है। निम्नांकित श्लोक में ‘उत्प्रेक्षालंकार’ में इसकी झलक द्रष्टव्य है। यथा- : की पुग मा पृच्छवासी चिरमुपनिषच्छारिकामन्तिकस्थांस पंसः किन्न स्मरसि रसिके त्वं हि तत्प्रेमपात्रम।। २.२७॥ - शिस कला उपनिषत् को सारिका मानकर कवि ने यहाँ पर सुन्दर उत्प्रेक्षा की है। ला कि २ प ‘मेघदूत’ का अनुकरण करते हुए भी यह काव्य विषय की नूतनता तथा कवि की काव्य-प्रतिभा से अपना विशिष्ट स्थान रखता है। हो म गीत गया कि
लक्ष्मीदास का शुकसन्देश
मालाबार प्रान्त के सन्देश-काव्य-लेखकों में लक्ष्मीदास का नाम विशेष महत्त्वपूर्ण है। यह कवि केरल का नाम्बूतिरि ब्राह्मण था। उनकी आवासभूमि अल्वाये नदी के तट पर थी। शुकसन्देश श्वीं और १४वीं शताब्दी के सन्धिकाल में प्रणीत हुआ होगा। कुछ विद्वानों ने इसकी रचना चौदहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मानी है। गिगारी
काव्य की कथा
शरद्-ऋतु की एक रात्रि में गुणकापुरी या गुणपुरी में दो स्निग्ध प्रेमी अपने प्रासाद में सुखमय विहार में मग्न थे। इतने में नायक को अकस्मात् ऐसा स्वप्न आता है कि वह अपनी प्रेयसी से बिछुड़ गया है और घूमते-घूमते रामेश्वर के समीप रामसेतु पर पहुँच गया है। तदनन्तर वह स्वप्न में ही अपनी प्रेयसी के पास एक शुक के द्वारा अपना सन्देश पहुँचाता है। इस प्रसंग में रामेश्वरम् से गुणकापुरी तक के रम्य मार्ग : का विशद वर्णन है। रामेश्वरम् से शुक को सागरतट, सेतु-बन्ध, ताम्रपर्णी नदी और १. श्री पी.एस. अनन्तनारायण शास्त्री द्वारा प्रणीत टिप्पणी सहित मंगलोदयम् प्रेस, तंजोर से प्रकाशित। सन्देशकाव्यपरम्परा पाण्ड्य-देश की राजधानी (मनालोर) मणलूर तथा सह्य पर्वत पार करके केरल को प्रेषित किया है। वहीं से कन्याकुमारी क्षेत्र को प्रणाम करके शिव के एक मन्दिर और खण्डहर का वर्णन है। आम्रवृक्ष पर विश्नाम करके शुक विविध सरिताओं, पर्वतों तथा राजमार्गों को पार करके सन्ध्यावेला में गुणकापुरी पहुँचकर यथावसर विरह-विधुरा प्रेयसी को उचित स्थान में प्रिय का सन्देश सुनाता है। शुक के प्रति मंगल कामनासहित काव्य समाप्त होता
काव्य-समीक्षा
इस सन्देश-काव्य में दो भाग हैं। प्रथम में मार्ग-वर्णन और द्वितीय में नायिका की विरहावस्था तथा सन्देश-कथन का विधान है। कविता की दृष्टि से यह काव्य लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण है। मन्दाक्रान्ता छन्द में रचित यह काव्य अलंकार-योजना, भावपूर्ण सरस-वर्णन तथा कोमल कल्पनाओं से परिपूर्ण है। शुकसन्देश की लोकप्रियता इसकी सात टीकाओं से व्यक्त होती है। शुकसन्देश गीतिकाव्य के लिये रुचिकर विषय रहा काव्य के अनुशीलन से स्पष्ट है कि कवि का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। सन्देश-काव्य के उपयुक्त प्रवाहमयी ललित भाषा में कवि ने यह सुन्दर रचना की है। शृङ्गार रस के अनुकूल प्रसादगुणयुक्त ललित भाषा का प्रयोग सर्वत्र है। अनुप्रास की अनुपम छटा निम्नांकित पद्य में द्रष्टव्य है - का स्थायं स्थायं तरुषु धरणीस्थायिनो वञ्चयित्वा ही विमान प्रति कि पर ग्राहं ग्राहं नयन-हृदय-ग्राहिणी: सस्यपङ्क्तीः । मसाल पायं पायं परिलघु पयः पदिमनीनामजन गायं गाय पुनरपि भवान् गाहिता व्योम येषु ।। १ ।। सावका कवि ने अपनी इस रचना में उत्कृष्ट, परिष्कृत रुचि का परिचय दिया है। विरह वर्णन में कहीं-कहीं शुकसन्देश में मेघदूत की अपेक्षा अधिक भावप्रवणता पाई जाती है। कवि ने कुछ स्थलों को मेघदूत की अपेक्षा पल्लवित करने की चेष्टा की है। कहीं-कहीं मेघदूत के समानान्तर भाव भी पाये जाते हैं।