संस्कृत सन्देशकाव्यपरम्परा को तीन कोटियों में विभाजित किया जा सकता है - (शृङ्गारपरक सन्देशकाव्य, माया जमा लिया (२) जैन सन्देशकाव्य तथा शिक्षा नि ! मह कि र (३) बौद्ध सन्देशकाव्य सन्देशकाव्यपरम्परा शृंगारपरक सन्देश-काव्यों में विप्रलम्भ शृङ्गार अगी है। इनकी भावधारा सम्प्रदायमुक्त तथा कालिदास के मेघसन्देश से अनुप्राणित है। इन सभी में सन्देश का प्रेषण नायक या नायिका के द्वारा किया जाता है, तथा सन्देशहारक पशु, पक्षी या नैसर्गिक उपादानों में से कोई है।
- जैन सन्देशकाव्य-परम्परा पर भी मेघदूत का सर्वातिशायी प्रभाव है। यही नहीं, कालिदास की इस अमर रचना की लोकप्रियता देखकर जैन कवियों ने धर्मप्रचार के लिये इसका उपयोग किया। मेघदूत का प्रत्येक पद्य उस काल में सहृदयों का कण्ठहार बन गया होगा, अतः जैन कवियों ने मेघदूत की एक-एक पंक्ति की समस्या लेकर भी सन्देशकाव्य लिखे। इस प्रकार जैन-परम्परा ने सन्देशकाव्य और समस्यापूर्तिकाव्य का बेजोड़ संगम किया है। जैन सन्देश-काव्यों में विप्रलम्भ शृङ्गार के स्थान पर शान्त रस की प्रधानता है। कुछ काव्यों में तो नायक-नायिका के स्थान पर गुरु-शिष्य या भक्त और आराध्य सन्देशदाता या सन्देशगृहीता के रूप में प्रस्तुत किये गये हैं। ‘उक्त दोनों काव्यपरम्पराओं से सर्वथा भिन्न कोटि बौद्ध सन्देशकाव्य की है, क्योंकि इस पर मेघदूत का कोई प्रभाव नहीं है। बौद्ध सन्देशकाव्य के सन्देशदाता तथा सन्देशगृहीता ऐतिहासिक पात्र हैं। सन्देश भी पत्र द्वारा दिया गया है तथा भौतिक दृष्टि से वास्तविक है।