२१ नानकचन्द्रोदयमहाकाव्यम्

नानकचन्द्रोदयमहाकाव्य एक चरित-प्रधान महाकाव्य है, जिसमें गुरुनानक का जीवनचरित श्रद्धाभाव के साथ प्रस्तुत किया गया है। इसके कर्ता श्रीदेवराज शर्मा हैं। देवराज शर्मा उदासी मत के पंडित थे तथा नानक की कथा उन्होंने स्वयं नानक-शिष्य श्री द्वारकादास के श्रीमुख से सुनी थी। कवि देवराज शर्मा काशी के शांडिल्यगोत्री त्रिपाठी रघुपति शर्मा के आत्मज थे तथा गुरुगोविन्दसिंह और गुरुरामदास के समकालिक थे। गुरुगोविन्दसिंह का समय १६६६ ई० से १७०८ ई० तक है। देवराज ने नानकन्द्रोदय महाकाव्य की रचना के लिये गुरुमुख से अधिगत सामग्री के अतिरिक्त गुरुग्रन्थसाहिब का अच्छा अध्ययन किया है। नानकचन्द्रोदय महाकाव्य में न केवल गुरुनानक का विशद रूप से चरित वर्णित है, उनके अतिरिक्त नौ गुरुओं का जीवन, ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य उपदेश और विचारदर्शन भी कवि देवराज ने विस्तार से यहाँ प्रस्तुत किया है। इस महाकाव्य. का विभाजन सर्गों के स्थान पर प्रस्तावों में हुआ है तथा इसमें कुल २१ प्रस्ताव हैं। नानक पर हार्दिक श्रद्धाभाव से कवि ने उनके संबंध में प्रचलित अलौकिक वृत्तान्तों को यथावत् उपन्यस्त किया है, जैसे नानक जी का एक क्षण में मक्का से चलकर अपने घर पक्षक आ जाना, एक क्षण में ही उनका सशरीर वैकुण्ठ जा पहुँचना और फिर भगवान् विष्णु से उपदेश ग्रहण करना, समुद्र पार करना, ध्रुव से बातें करना आदि। वह इस महाकाव्य में २१ प्रस्तावों में कुल ३५७६ पद्य हैं, जिनमें विविध छन्दों का प्रयोग किया गया है। १६ प्रस्तावों में गुरुनानक तथा अवशिष्ट दो प्रस्तावों में बाकी गुरुओं का चरित और संदेश वर्णित है। कवि देवराज की शैली पर राजशेखर का प्रभाव विशेष रूप से परिलक्षित होता है। कि तलाशनामिका एक

  • इस महाकाव्य में उदासी मत का प्रतिपादन बड़ी प्रभावशाली शैली में किया गया है तथा धर्म के नाम पर प्रचलित पाखंड पर कवि ने निर्भय होकर प्रहार किया है। नानक के कथन हृदय में सीधे उतरते चलते हैं-तिका पुण्ड्रं तव स्वच्छतरं ललाटे माला विहाला हदि काष्मयः। ते तूर्ध्ववस्त्राण्यति निर्मलानि मलीमसं कर्म करोषि किं भोः।। (१६ । ६४) नानक द्वारा विष्णु और शिव की स्तुति के प्रसंगों में भक्तिभाव तरंगायित है।