२० भोजचरित्र

भोजचरित्र के प्रणेता राजवल्लभ जैनाचार्य थे तथा धर्मघोषगच्छ के महीतिलकसूरि के अनुयायी थे। इन्होंने १४४० ई० के लगभग या इसके कुछ पूर्व भोजचरित्र की रचना की। भोजचरित्र आख्यानशैली में प्रायः अनुष्टप् छन्द में रचित सरल काव्य है, जिसमें ३०२ काव्य-खण्ड भोजविषयक कथाचक्र के साथ-साथ कतिपय ऐतिहासिक घटनाओं का भी समावेश किया गया है। योजचरित्र पांच प्रस्तावों में निबद्ध है, प्रथम प्रस्ताव में ३३३, द्वितीय में ८६, तृतीय में १६४, चतुर्थ में ६०१ तथा पंचम में ३८८ पद्य हैं। प्रथम प्रस्ताव में धारानरेश सिंधुराज को मंत्र नामक शिशु की प्राप्ति, अनंतर उनकी रानी रत्नावली का गर्भधारण और उससे पुत्र सिंधुल का जन्म, सिंघुराज का मुंज को उसके तरुण होने पर उसकी प्राप्ति का रहस्य बताना, मुंज का पर्यंक के नीचे रहस्य सुनती अपनी पत्नी का सिर काट डालना, उसका राज्याभिषेक, सिंधुल का अंधा होना, भोज का जन्म, मुंज द्वारा भोज की हत्या कराने का षड्यंत्र, तैलप और मुंज का युद्ध, मुंज का बंदी बनाया जाना तथा भोज द्वारा अंत में तैलप से बदला लेना-इतनी घटनाओं का वर्णन है। इसमें महाकवि धनपाल से संबंद्ध वृतान्त भी बड़ा महत्त्वपूर्ण है, तथा इसके साथ ही भोज द्वारा विशाल सरोवर बनवाने का भी विवरण दिया गया है। राजवल्लभ के शेष प्रस्तावों में भोज संबंधी लोककथाओं का संग्रह अधिक है। इस ग्रंथ के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि राजवल्लभ के समय तक भोज का चरित लोकगाथा के रूप में चारणों, भाटों द्वारा जनता के सामने गाया जाता होगा। इसीलिए राजवल्लभ ने कथा के बीच-बीच में विभिन्न पात्रों की प्रचलित उक्तियों या संवादों के रूप में कुछ प्राकृत गाथाओं का समावेश किया है, जो लोकगाथा के वंश जान पड़ती हैं। तृतीय और चतुर्थ प्रस्तावों में कई अतिप्राकृत घटनाओं का भी वर्णन है, जिनमें भोज की परकाय प्रवेशविद्या सीखना, एक शुक के देह में उनका प्रवेश आदि कुतूहलवर्धक वृतान्त है। अंत में भोज का मदनमंजरी से विवाह, उससे बच्छराज तथा देवराज-इन दो पुत्रों की प्राप्ति का विवरण दिया गया है। राजवल्लभ मेरुतुङ्गाचार्य के प्रबन्धचिन्तामणि से पर्याप्त प्रभावित प्रतीत होते हैं।