१९ चरितकाव्य

ऐतिहासिक महाकाव्यों की ही एक परपंरा चरितकाव्यों में मिलती है। इन काव्यों में किसी इतिहास-पुरुष, युगनिर्माता संत या महापुरुष का तथ्यात्मक जीवनचरित निबद्ध किया जाता है। ऊपर उल्लिखित जगडूचरित इस प्रकार का काव्य है। जैनमहाकाव्यविषयक अध्याय में वर्णित अनेक महाकाव्य भी इसी श्रेणी में आते हैं। यहां पर कुछ और चरितकाव्यों का विवरण प्रस्तुत है, जिनका उल्लेख अन्यत्र नहीं हुआ है।

शङ्कराचार्यविषयक चरितकाव्य

शकराचार्य के जीवनवृत्त-विशेषतः उनके दिग्विजय-को लेकर लिखे गये महाकाव्यों या काव्यों की लंबी परपंरा संस्कृत साहित्य में है। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने अपने ग्रंथ ‘शंकराचार्य में ऐसे बाईस उपलब्ध प्रबंध काव्यों का परिगणन किया है। इनमें से कतिपय काव्यों का विवेचन प्रस्तुत है।

शङ्करविजयमहाकाव्यम्

इस महाकाव्य में बारह सर्ग हैं। इसके कर्ता व्यासाचल हैं। यह आदिशंकर की उपलब्ध जीवनियों में सबसे प्राचीन माना गया है। आत्रेय कृष्ण शास्त्री १. योऽयं विजयते वीरः पर्वतानामधीश्वरः दाक्षिणात्यो महाराजः शाहराजात्मजः शिवः ।। स एकदात्मनिष्ठं मां प्रसाद्येदमभाषत यानि यानि चरित्राणि विहितानि मया भुवि। विधीयन्ते च सुमते तानि सर्वाणि वर्णय ।। (अ० श्लो० २४,२५,२६) । ३०० काव्य-खण्ड ने अपने तमिल ग्रंथ ‘शंकरगुरुपरपंरा’ में दक्षिण के ६५ शंकराचार्यों का परिगणन किया है, जिसमें इस काव्य के रचयिता व्यासाचल ५२वें हैं। वे कांचीकामकोटिपीठ पर १४६८ -ई० से १५०७ ई० तक रहे। विजयनगर के राजा नरसिंहदेवराय के १५०७ ई० के एक ताम्रपट्ट में उनका नाम मिलता है। व्यासाचल का मूल नाम कृप्पण, पीठासीन होने पर संन्यासाश्रम का नाम महादेवेन्द्रसरस्वती तथा व्यासाचल पर घोर तप करने के कारण व्यासाचल इनका उपाधिनाम हुआ। व्यासाचलीय महाकाव्य को अनेक परवर्ती शंकरचरितकारों ने अपना उपजीव्य माना है। सायण के बड़े भ्राता माधव के द्वारा रचित माने गये ‘सङ्क्षपशङ्करविजय’ में तो व्यासाचल के दाय को कण्ठतः स्वीकार किया गया है। यही नहीं सक्षेपशङ्करविजय के कई श्लोक शदशः व्यासाचलीय महाकाव्य से उद्धृत किये गये हैं और इस महाकाव्य की प्रशंसा करते हुए कहा गया है-सी कि गायिक नेता यत्रोल्लसति भगवत्पादसंज्ञो महेशः शान्तो यत्र प्रकचति रसः शेषवानुज्ज्वलाद्यैः । जाम मचा यत्राविद्याक्षतिरपि फलं तस्य काव्यस्य कर्ता मानिसलाई धन्यो व्यासाचलकविस्तत्कृतिज्ञाश्च धन्याः।। उस इसी प्रकार शकराचार्यचरित के कर्ता गोविन्दनाथ ने और केरलीय शकरविजयकार ने भी व्यासाचल की प्रशस्ति की है।

शङ्करदिग्विजयमहाकाव्य

इस महाकाव्य का शङ्करविजय तथा सङ्क्षपशङ्करविजय नाम, भी प्रयुक्त मिलता है। इसका कर्तृत्व माधवाचार्य अर्थात् शृङ्गेरी मठ के आचार्य विद्यारण्य (१३००-१३५८ ई०) को दिया जाना सर्वथा संदिग्ध है, क्योंकि इसमें उपर्यक्त व्यासाचलीय महाकाव्य का उल्लेख है। किन्तु स्वामी विद्यारण्य का नाम जुड़ जाने से इस महाकाव्य को शंकरचरितकाव्यों में सर्वाधिक ख्याति मिली। देवी भारती की प्राश्निकता से हुए मण्डनमिश्र के साथ शंकर के शास्त्रार्थ का इस महाकाव्य में विशद वर्णन है । माहिष्मती में आचार्य शंकर मण्डन के घर का पता पूछते हैं और नर्मदा के घाट पर जल भरती स्त्रिया उन्हें बताती हैं जगद् ध्रुवं स्याज्जगदघुवं स्यात् कीराङ्गना यत्र गिरो गदन्ति। द्वारस्थनीडान्तरसन्निरुद्धा जानीहि तन्मण्डनपण्डितौकः।। णातील जभा स्वतः प्रणामं परतः प्रणाम कीराङ्गना यत्र गिरं गदन्ति। द्वारस्थनीडान्तरसन्निरुद्धा जानीहि तन्मण्डनपण्डितौकः ।। (८। ६, ८)

बृहच्छङ्करविजय

इस काव्य के कर्ता स्वामी चित्सुखाचार्य कहे गये हैं, जो आदिशंकराचार्य के साक्षात् शिष्य थे। पण्डित बलदेव उपाध्याय ने शंकरचरितकाव्यों में इसी को सर्वप्राचीन माना है। ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य शङ्कराचार्यचरित-श्री कष्णमाचारियर ने इसका कर्ता अनन्त कवि को बताया है। पण्डित बलदेव उपाध्याय ने एक अज्ञात कर्तृक शङ्कराचार्यचरित का उल्लेख किया है। दोनों काव्यों की भिन्नता या अभिन्नता अनुसंधेय है। RATE प्राचीनशङ्करविजयम्-श्रीकष्णमाचारियर के अनुसार यह काव्य आनन्दगिरि का रचा हुआ है, जबकि पं० बलदेव उपाध्याय ने इसका कवि मूलशंकर माना है। इसी परपंरा में शङ्करचरित को विषय बना कर अनेक चम्पूकाव्य तथा गद्यकाव्य भी लिखे गये हैं। छ शङ्कराभ्युदय-इस महाकाव्य के प्रणेता सत्रहवीं शताब्दी के प्रख्यात साहित्यिक राजचूडामणि दीक्षित हैं, जिनका परिचय महाकाव्यविषयक अध्याय में दिया गया है। कवि को उनके गुरु गीर्वाणेन्द्र सरस्वती ने स्वप्न में शङ्कराचार्यचरित्रविषयक महाकाव्य लिखने के लिये प्रेरित किया था (शकराभ्युदय, १।६, १०)। यह महाकाव्य दस सर्गों का बताया गया है, पर इसके आठ ही सर्ग मिले हैं। इसमें शकराचार्य का शुकदेव के रूप में व्यासमुनि से साक्षात्कार, कुमारिलभट्ट से वार्तिक लिखवाने के लिये आग्रह, सुरेश्वराचार्य द्वारा आचार्य शङ्कर की प्रेरणा से नैष्कर्यसिद्धि का प्रणयन तथा शङ्कराचार्य द्वारा ब्रहमसूत्र, सौन्दर्यलहरी आदि की रचना के प्रसंग उल्लेखनीय हैं, शेष वृतांत अन्य शकरचरित-काव्यों के समान ही है। शङ्कराचार्य के अनेक शिष्यों का भी उल्लेख इसमें कवि ने किया है, जो अन्यत्र सर्वथा सुलभ नहीं हैं। महाकाव्योक्त समस्त लक्षणों के निर्वाह के स्थान पर कवि ने चरित उपनिबद्ध करने का अपना ध्यान अधिक दिया है। इसीलिये कवित्व की समृद्धि के साथ-साथ सर्वत्र प्रसन्न, प्रांजल वैदर्भी का उसने आद्यन्त प्रयोग किया है।

अन्य चरितकाव्य

शङ्कराराध्य कवि ने बसवेशविजय में दक्षिण के धर्मगुरु बसव का चरित उपनिबद्ध किया है। बसव वीरशैव सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। कवि शङ्कराराध्य कलचुरि वंश के राजा भिज्जल के प्रधानमंत्री थे, जिनका शासनकाल बारहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध है। बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही कवि सोमनाथ ने पण्डिताराध्यचरित लिखा है। इस महाकाव्य में वीरशैव सम्प्रदाय के ही दूसरे महान् संस्थापक आचार्य पण्डिताराध्य की जीवनी प्रस्तुत की गयी है। सोमनाथ विद्वानों के विख्यात आश्रयदाता महाराज प्रतापरुद्र 27807775६.३० + समकालिक मानविपणन