१८ अन्य ऐतिहासिक महाकाव्य

अन्य ऐतिहासिक-महाकाव्यों के अन्तर्गत कतिपय महत्त्वपूर्ण रचनाओं का विवरण इस प्रकार है –

(१) मूषकवंश

यह उत्तर केरल के राजवंश का काव्यात्मक इतिहास है। इसके रचयिता का नाम अतुल है। महाकवि अतुल, बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इस वंश के श्रीकण्ठ या राजधर्म नामक राजा के आश्रित थे, उनके इस महाकाव्य के केवल १५ सर्ग ही मिलते हैं। यह ग्रन्थ महाराज पैलेस लाइब्रेरी त्रिवेनद्रम् में संगृहीत है। मूषकवंश-महाकाव्य का उपक्रम पौराणिक शैली में किया गया है। क्षत्रिय-निहन्ता परशुराम के द्वारा पति का वध कर दिये जाने पर हैहयकुल की कोई गर्भवती रानी मूषक-पर्वत में शरण लेकर रहने लगती है। वहाँ उसे जो पुत्र उत्पन्न होता है - उसी२६४ काव्य-खण्ड का के द्वारा ‘मूषकवंश’ नाम से नवीन कुल-परम्परा आरम्भ होती है। उस प्रथम राजा का नाम भी ‘मूषक रामघट’ ही प्रसिद्ध होता है। रामघट युवा होने पर दिग्विजय करके सम्राट् बनता है और अपना कुल-क्रमागत राज्य भी पुनः प्राप्त कर लेता है। अनेक विषयों का भोग करते हुए वृद्धावस्था आने पर वह अपने छोटे पुत्र ‘नन्दन’ को राज्य देकर वानप्रस्थाश्रमी हो जाता है। इसके बाद कवि ने षष्ट से दशम तक चार सर्गों में नन्दन के विलासपूर्ण इतिवृत्त का सुन्दर वर्णन किया है। इस वंश में नन्दन से छठा राजा उग्राश्व हुआ। उसने केरल के आक्रामक राजा को परास्त करके अपने राज्य को दृढ़ किया। उसका पुत्र शतसोम हुआ जिसने चेल्लूर नामक स्थान पर भगवान शंकर का एक भव्य मन्दिर बनवाया। शतसोम से २३वें क्रम में आने वाले नरेश बट्टकराम ने वट्टकेश्वर-मन्दिर का निर्माण करवाया, उसके पुत्र अहीरण ने प्रथमानदी के पश्चिमी तट पर एक दूसरा शिवमन्दिर निर्मित करवाया। अहीरण का पुत्र विनयवर्मा हुआ जिसने एक बौद्ध-विहार की स्थापना की। उसके बाद ‘विरोचन’ हुआ जिसने आक्रान्ता पल्लवों के औद्धत्य को प्रशमित किया। इसकी २३ पीढ़ियों के बाद ईशानवर्मा नामक एक अत्यन्त प्रतापी नरेश उत्पन्न हुआ, जिसने इस वंश की राज्यलक्ष्मी एवं प्रतिष्ठा दोनों को ही स्थिर करके इसका महत्त्व बढ़ाया। मूषकवंश के त्रयोदश और चतुर्दश सर्गों में महाराज बलभ (द्वितीय) के पराक्रमपूर्ण वृतान्त का चित्रण किया है। उसके द्वारा वल्लभपट्टन में दुर्ग-निर्माण, अनेक सामुद्रिक द्वीपों को जीतकर अपने राज्य में मिलाना आदि साहसिक कार्यों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसके बाद उसके भाई श्रीकण्ठ का चरित्र वर्णित हुआ है। उसका शासन-काल उपद्रवरहित एवं समृद्धिपूर्ण रहा। उपलब्ध काव्य इसी श्रीकण्ठ के अधूरे इतिवृत्त का वर्णन करते हुए, पंचदश-सर्ग की असम्पूर्णता में ही समाप्त हो जाता है। 1 day इस ऐतिहासिक विवरण के साथ-साथ इस काव्य में साहित्यिक चारुता भी पर्याप्त मात्रा में दिखलाई पड़ती है, इसका निदर्शन इन पद्यों में देखा जा सकता है - स शालिगोपीजनगीयमानं विशालमाकर्ण्य यशः स्वकीयम्। लज्जानतास्यो रमणीजनस्य निःशङ्कदृश्यो नृपतिर्बभूव।। is नाम FIR क्षत्रियस्य जननाद् भवति स्वं क्षोणिरेव चतुरन्तरसीमा, पालने तु नियमो बलतन्त्रः पूर्वभोगकथयाघ्र कृतं किम्।।’ किलो १. डा० रामजी उपाध्याय - संस्कृत साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास (पृष्ठ ४४०-४४१) ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य 7 २६५

(२) जगडूचरित

इस महाकाव्य के रचयिता का नाम है सर्वानन्द। इसकी कथावस्तु । पारम्परिक राजचरितों से हटकर है। इस काव्य में ‘जगडूशाह’ नामक एक धार्मिक गृहस्थ को महाकाव्य का नायक बनाया गया है, क्योंकि उसने गुजरात के १२२५ ई० से १२५८ ई० तक के भीषण दुर्भिक्ष में अपना कोष लुटाकर, अन्नसत्र खोलकर, कि अनेकों रूपों आदि का निर्माण कर सामान्य जनता की प्राणरक्षा की थी। महाकाव्य में सात सर्ग हैं, इसमें अनेक लोकोत्तर और अतिमानुष-व्यापारों की कल्पना करके ग्रन्थकार ने जगडूशाह को एक दिव्यपुरुष बना दिया है। इस काव्य से जगडू के उदार एवं परोपकारी जीवन का परिचय मिलता है। लोग जगडूशाहचरित की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है-भद्रेश्वरपुर में सोर नामक एक व्यक्ति रहता था, जिसके जगडू, राण और पद्म-ये तीन पुत्र हुए। एक बार जगडू ने एक बकरी के कण्ठ में सर्वसाधक मणि बंधीं देखकर उसे खरीद लिया। उस मणि के प्रभाव से वह अपार सम्पत्ति का स्वामी बन गया। उसने अपनी विधवा पुत्री का पुनर्विवाह करना चाहा, पर कुटुम्बी जनों के विरोध के कारण यह विचार त्याग दिया और पुत्री के कल्याण की कामना से धर्मकार्य में मन लगाया। पुत्रलाभ के लिये उसने रत्नाकर की आराधना की, तो रत्नाकर ने पुत्र देने में असमर्थता प्रकट कर उसे की उसकी सम्पत्ति के अटल रहने तथा जलयान के कभी समुद्र में न डूबने का वर रोक दिया। इसके पश्चात इस काव्य में जगडू के अनेक धर्म-विषयक कृत्यों तथा मित व्यापार में उसके धन की वृद्धि होते जाने का वृतान्त है। यहां तक कि जगडूशाह कि एक विशाल दुर्ग का निर्माण भी कराता है, जिसमें शासक पीठदेव ईर्ष्यावश विघ्न काम/ डालता है और अन्त में जगडू के प्रताप से घबराकर उसे उसके साथ सन्धि करनी FA पड़ती है। गुजराज में वि०सं० १३१२ से १३१५ (१२५५-१२५८ ई०) में पड़े मत अकाल का वर्णन तथा जगडू के द्वारा दुर्भिक्षपीड़ित लोगों की सहायता का वर्णन इस महाकाव्य में निर्विवाद रूप से ऐतिहासिक तथ्य है। म गर कमा कवि ने जगडू के चरित की महनीयता का गान बड़े मनोयोग के साथ किया है तथा मिछानश- उसकी कीर्ति के वर्णन में सटीक विशेषणों और उपमानों का प्रयोग किया है। पितः। उदाहरणार्थ - विHिER- कानिकल गङ्गातरविमलेन यशोभरेण दानोद्भवेन किल कल्पशतस्थिरेण। एकस्त्रिलोकमखिलं धवलीचकार धिक्कारकृतकलिरिपोर्जगविवेकी।। (१६) व्यक्तित्व के परिज्ञान के साथ ही तत्कालीन राजनीतिक स्थिति का भी पता चल जाता है। उस युग के राजाओं के नाम यहाँ उल्लिखित हैं। जगडूशाह के समय गुजरात में बीसलदेव, मालवा में मदन वर्मा और काशी में प्रतापसिंह का राज्य था। उस युग २६ SAFI में समुद्री जल-मार्ग से भी व्यापार होता था तथा गुजरात से जहाजों द्वारा देश-विदेश कांगीर में सामान ले जाया जाता था। आचार्य बलदेव उपाध्याय के अनुसार सर्वानन्दकवि, 15 जगडूशाह के समसामयिक प्रतीत होते हैं, क्योंकि अपने काव्य में उन्होंने अनेक तथ्यों का प्रत्यक्ष जैसा वर्णन किया है। काव्य की भाषा प्रसादगुण-युक्त तथा शैली मानक प्रौढ़ है, अलंकारों का भी यथाऽवसर प्रयोग दिखलाई पड़ता है। विषयवस्तु की कता जानवीनता की दृष्टि से इस काव्य का विशेष महत्त्व है।

भूपालचरित

यह महाकाव्य भी जैन परम्परा की ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रचना है। इसके रचयिता जयसिंह सूरि हैं और रचनाकाल वि०सं० १४२२ (१३६५ जनिक उई०) है।’ इसमें राजा कुमारपाल तथा उसके गुरु आचार्य हेमचन्द्र दोनों की क्रमशः क िवंशपरम्पराओं तथा शिष्यपरम्परा का वर्णन ऐतिहासिक दृष्टि से उपादेय है। मूलराज * गीर से लेकर अजयराज तक गुजरात के राजाओं का भी वर्णन इसमें दिया गया है तथा कि 15 कुमारपाल के मन्त्रियों के नाम और चरित भी वर्णित है। कुमारपाल के जाबालपुर, की वालअजमेर और मालवों तथा कुरुओं से हुई लड़ाइयों का वर्णन, सोमेश्वर और विज शत्रुञ्जय तीर्थों का जीर्णोद्धार आदि का वृत्तान्त भी प्रामाणिक है।

(३) मधुराविजय या वीरकम्परायचरित

इसकी रचयित्री गंगादेवी हैं। ये विजयनगर TE के महाराज कम्पण या कम्पराय की रानी थी। इस काव्य में इन्होंने अपने पति को TT लि ही नायक बनाकर उनके पराक्रमपूर्ण कार्यों का ओजस्वी चित्रण किया है। इस दृष्टि साधना से इस काव्य की ऐतिहासिक प्रामाणिकता और भी बढ़ जाती है। वीर कम्पराय की मृत्यु सन् १३७७ ई० में हुई थी, अतः इस काव्य की रचना इससे पाँच-दस वर्ष कि पूर्व ही हुई होगी। यह काव्य कुछ अधूरा सा प्रतीत होता है, इसका प्रकाशन पण्डित हरिहर शास्त्री तथा श्रीनिवास शास्त्री के सम्पादकत्व में सन १८१६ में त्रिवेन्द्रम से नि हुआ है। इसमें विजयनगर साम्राज्य के आदिकाल से कथावस्तु का आरम्भ किया गया है। महाराज बुक्क के द्वारा दुर्दान्त यवनों की पराजय तथा गुरु क्रियाशक्ति और माधवाचार्य की सहायता से साम्राज्य की स्थापना, विजयनगर और उसके मन्दिरों का विस्तृत वर्णन, बुक्क के पुत्र कम्पण या वीर कम्पराय की विजय-यात्राओं का स्वाभाविक चित्रण-समुदित रूप में, यही इस महाकाव्य की विषयवस्तु है। सम्पति इसके आठ सर्ग ही प्राप्त होते हैं। देवी के द्वारा काव्य-नायक को म्लेच्छों के विनाश का स्वप्नादेश दिलाकर राजमहिषी गंगादेवी ने अपने पति के विजय-अभियानों को दैवी-प्रेरणा से सम्पन्न होने का संकेत किया है। मधुरा के म्लेच्छ जातीय सुलतान का वध करके कम्पराय उस देश के मन्दिरों का नवीनीकरण करता है, और वहाँ पुनः भारतीय सनातन संस्कृति और समृद्धि का विस्तार करता है। १. संस्कृत काव्य के विकास में जैन कवियों का योगदान : नेमिचन्द्र शास्त्री, पृ० काक की TE ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य २७ जा गंगा देवी की ऐतिहासिक यथार्थपरता और हृदय की स्वाभाविक सरसता दोनों का मणिकांचन संयोग इस काव्य में दिखलाई पड़ता है। उन्होंने अपने वीर पति की विजय-यात्राओं का जो चित्रण किया है वह पक्षपात या अतिशयोक्ति से अनतिरंजित होने पर भी सजीव तथा प्रभावोत्पादक है। काव्य में भाषा और भाव की कोमलता उनकी नारी-जनोचित सहृदयता का सुरम्य चित्रांकन है। काव्यरीति वैदर्भी है। अलंकारों का सन्निवेश कविता-कामिनी को कहीं भी भाराक्रान्त नहीं करता। भावों में नवीनता तथा कथ्य में अपूर्वता का चारु सनिवेश दिखलाई पड़ता है। प्रकृति को गंगादेवी ने अपनी सहचरी के रूप में देखा हैं। प्रभात के अर्ध-स्फुट अरविन्दों के ऊपर मँडराता अमर उन्हें किसी प्रहरी के सदृश प्रतीत होता है । घटमानदलाररीपुटं नलिनं मन्दिरमिन्दिरास्पदम्। परिपालयति स्म निक्वणन् परितो यामिकवन्मधुनतः । । इस काव्य में कथ्य की सहजता और प्रासादिकता इसे और भी लोभनीय बना देती नहीं है, कवयित्री गंगादेवी इसमें कहीं भी अनावश्यक पाण्डित्य-प्रदर्शन करती दिखलाई नहीं पड़ती। भारी

(४) महाचोलराजीय (कविकर्णरसायन)

इसका दूसरा नाम ‘कविकर्णरसायन’ भी है। इसके रचयिता उद्दण्डदेव के शिष्य षडक्षरीदेव हैं जो पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुए थे। षडक्षरीदेव मैसर राज्य के धनगरु नामक स्थान के निवासी थे। इस संस्कत ग्रन्थ पजिम । के अतिरिक्त इनकी कन्नड़भाषा में लिखी अन्य रचनाएँ भी प्रसिद्ध हैं। ‘महाचोलराजीय’ में दस सर्ग माने गए हैं जिनमें कवि ने चोलराजाओं का ऐतिहासिक वर्णन सरस शैली या में उपनिबद्ध किया है। सम्प्रति इस काव्य के केवल दो सर्ग प्राप्त होते हैं, जो मैसूर के ग्रन्थागार में सुरक्षित हैं। इसकती

(५) सलुवाभ्युदय

इस महाकाव्य का रचनाकाल पन्द्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध है, रचनाकार हैं राजनाथ द्वितीय। ये विजयनगर के राजा ‘सलुव’ के आश्रित कवि थे। इनके पिता अरुण गिरिनाथ भी एक उच्चकोटि के कवि थे। कवि होने के साथ-साथ राजनाथ व्याकरण और दर्शन के प्रसिद्ध विद्वान् भी थे। सलुवाभ्युदय में तेरह सर्ग हैं, जिनमें उक्त राजा का पराक्रम वर्णित है, साथ ही कवि ने अपने आश्रयदाता के पूर्वजों की चरितावली भी इसमें उपनिबद्ध की है। सलुव के द्वारा कलिंग और दशार्ण देश पर आक्रमण करके बहमनी सुल्तान पर विजय प्राप्त करना, फिर उत्तर दिशा की ओर अभियान और वाराणसी तक अपना अधिकार स्थापित करना, तिरुपति में भगवान् विष्णु की आराधना करना तथा १. डा. रामजी उपाध्याय - सं. सा. का आलो. इतिहास, पृष्ट ४४७ २६E विकाव्य-खण्ड दानी वाला विजयनगर को राजधानी बनाकर अपना विशाल साम्राज्य स्थापित करना आदि ऐतिहासिक घटनाएँ उसके मुख्य वर्ण्य-विषय हैं। इस महाकाव्य का प्रकाशन मुद्रास से हो चका है ‘TIERE स्मिक निजामती

(६) विशाखविजय

राजचरितप्रधान महाकाव्यों में केरलवर्म वलिय कोइतम्बूरान का विशाखविजय नामक महाकाव्य भी एक स्पृहणीय कृति है। इसका रचनाकाल सन्१६४५ से १८१५ के बीच माना गया है। काव्य में २० सर्ग हैं, कवि ने अपने समकालिक नरेश विशाल-तिरुनाल के जीवनवृत को ललित शैली में प्रस्तुत किया है। रचना-पद्धति में महाकवि कालिदास तथा माघ का प्रभाव परिलक्षित होता है। यमक का एक उदाहरण द्रष्टव्य है- | म जारि कारक जनमदारमदारयदाशुगैरिहरसालरसालसकोकिले। एक परमुदारमुदारमणीजुषोरसमये समये समनोभवः ।। २ । ।

(७) शिवभारत

महाराष्ट्र-वीर शिवाजी के चरित्र को आधार बनाकर यों तो अनेक काव्य, महाकाव्य अब तक अनेक कवियों द्वारा लिखे गए, किन्तु उन सब में शिवाजी के समकालीन कवीन्द्रपरमानन्द द्वारा लिखित शिवभारत, प्रामाणिकता की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से यह महाकाव्य भी असम्पूर्ण ही उपलब्ध हुआ है। इसमें ३२ अध्याय हैं जिनमें ३१ पूर्ण और बत्तीसवां त्रुटित है। इन ३२ अध्यायों में शिवाजी के पूर्वपुरुष मालोजी के वर्णन से उपक्रान्त कर शिवाजी के द्वारा सूर्यराज के शृंगारपुर को अधिकृत कर वहाँ त्र्यम्बक भास्कर राव को अधिकारी नियुक्त करने तक का वर्णन मिलता है। इसकी रचना शक संवत् १५८३ (सन् १६६१ ई.) के बाद तथा महाराज शिवाजी के राज्यारोहण से पूर्व हुई प्रतीत होती है। काव्य की रचना-शैली और नामकरण बहुत कुछ महाभारत से प्रभावित है। कवि ने स्वयं इसे महाभारत के सदृश कहकर इसको स्पष्ट रूप से ऐतिहासिक सन्दर्भ ही सिद्ध किया है। इसका उपक्रम, वर्णनशैली और पुष्पिकार महाभारत का ही अनुसरण करते हैं। परमानन्द अपने को शिवाजी के आत्मीय तथा अपनी कुलदेवी एकवीरा के प्रसाद से सिद्ध -सरस्वतीक के रूप में चित्रित करते हैं। ग्रन्थ के १. डा० रामजी उपाध्याय-वही, पृष्ठ ४४७ (पादटिप्पणी) समयमा २. डा. हीरालाल शुक्ल - आधुनिक संस्कृत साहित्य (रचना प्रकाशन, इलाहाबाद सन् १८७०) पृ. २१ दि. शिवभारत (संस्कृत मूल और मराठी भाषान्तर) (सम्पादक सदाशिव महादेव दिवाकर) भारत इतिहास संशोधक मण्डल, पुणे, सन् १६२७ में मराठी भूमिका ‘उपोद्घात’ (पृष्ठ २०) । ४. क-चरितं शिवराजस्य भरतस्येव भारतम्। अ । क्लो.२२ र ब- अहो कथमहं कुर्या भारतप्रतिम महत्। अमानुषचरित्रस्य शिवस्यैतत् समीहितम् ।। अ.१२६ ५. इत्यनुपुराणे कवीन्द्रपरमानन्दप्रकाशितायां शतसाहस्यां संहिताया कुमारप्रभवो नाम प्रथमोऽध्यायः ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य २६६ अन्तःसाक्ष्य के अनुसार स्वयं शिवाजी ने इन्हें इस ग्रन्थ की रचना करने का आदेश दिया था । शिवभारत, प्रायः प्रसाद तथा ओजोगुण-भूयिष्ठ एक हृद्य ऐतिहासिक कृति है, जिसमें हमें शिवाजी के प्रामाणिक इतिवृत्त, चरित्र और तत्कालीन राजनीतिक-स्थितियों की जानकारी के साथ-साथ उच्चकोटि की काव्यात्मकता का भी आस्वाद प्राप्त होता है। भाषा स्फीत और शब्द-शय्या आवर्जक है। अलंकारों का समुचित सनिवेश कथ्य को अवसरानुकूल विभूषित करता है, कहीं-कहीं यमक और यमकाभास आदि शब्दच्छटाओं की संरचना सुन्दर बन पड़ी है। यहाँ कतिपय उदाहरण आस्वादनीय हैं - मात- स्वयं नियन्ता विश्वस्य विश्वस्य बत वैरिषु। । सुखं सुप्तो निजगृहे ततो निजगृहेऽरिभिः।। (१६७) समया हन्त हुन्तव्यः समया समुपागताः। (१८।२२) भवताऽपकृता पूर्व भवतापकृता स्वयम् (१६३८)

शम्भुराजचरितम्-इस ऐतिहासिक काव्य के रचयिता हरि कवि हैं। इनका परिचय ‘सुभाषितसङ्ग्रह और सुभाषितों के कवि’ शीर्षक अध्याय में इसी ग्रन्थ में दिया गया है। ‘शम्भुराजचरितम्’ में हरि कवि ने शिवाजी के पुत्र शम्भाजी का चरित्र निरूपित किया है। ऐतिहासिक दृष्टि से इस काव्य में महत्त्व की सामग्री है।