साहित्यरलाकर की भांति इस महाकाव्य में भी तजौरनरेश रघुनाथ का ऐतिहासिक वृत्त प्रस्तुत किया गया है। इसकी रचयित्री रामभद्राम्बा हैं। यह कवयित्री राजा रघुनाथ की ही साहित्यसभा को विभूषित करती थी - यह इनके महाकाव्य की पुष्पिका से विदित होता है। कृष्णमाचारियर ने रामभद्राम्बा को रघुनाथ नायक की रानी माना है। तथ्य जो भी हो, यह निर्विवाद है कि रामभद्राम्बा रघुनाथ नायक (१६००-१६३४ ई.) की समकालिक हैं। RE. रघुनाथाभ्युदय महाकाव्य में बारह सर्ग तथा ६०० श्लोक हैं। साहित्यरत्नाकर महाकाव्य के ही समान तजापुरी के वैभव और यहाँ के निवासियों के आचार-विचार का चित्रण कवयित्री ने आरम्भ में किया है। रघुनाथ नायक के धर्मव्यवहार और राज्यप्रबन्ध ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य का आँखों देखा विवरण इस महाकाव्य में रामभद्राम्बा ने प्रस्तुत किया है। इसकी विशेषता रघुनाथ की दिनचर्या के विशद वर्णन में है, जिससे लगता है कि कवयित्री ने राजप्रासाद के बहिर्भागों में ही नहीं, अन्तःपुर तथा राजकीय देवमंदिर आदि सभी स्थलों में राजा के साथ रहकर ही उसके आचार और दैनिक कृत्यों को समझा परखा होगा। रघुनाथ प्रतिदिन रामकथा का श्रवण करता था, जिसके प्रसंग में रामभद्राम्बा ने २७ श्लोकों में रामकथा का संक्षेप भी चतुर्थ सर्ग में प्रस्तुत किया है। रघुनाथ के शारीरिक गठन, अलंकरण और वेशभूषा का भी कवयित्री ने विशद चित्रण किया है। षष्ठ सर्ग में राजा का वंश-परिचय है। चोलक के अत्याचारों तथा फिरंगियों के भारत में प्रवेश का भी विवरण यहाँ दिया गया है। नवम सर्ग में रघुनाथ नायक द्वारा फिरंगियों को युद्ध में परास्त करने और शरणागत नेपालनरेश को उसके नागपट्टनम् नामक द्वीप में पुनः प्रतिष्ठित करने का वृत्तान्त है। पाण्ड्य राजा तथा टुण्डीर राजा के साथ रघुनाथ के भयंकर युद्ध का भी इस महाकाव्य में चित्रण है, जो दसवें सर्ग तक चलता है। ग्यारहवें सर्ग में दिविजयी रघुनाथ का राजधानी में स्वागत और बारहवें सर्ग में उसके द्वारा नाट्यप्रयोग के अवलोकन का वृत्तान्त है। प्रशस्तिपरकता और ऐतिहासिकता के सामंजस्य के साथ-साथ यह महाकाव्य कवयित्री की साहित्यिक प्रतिभा, रमणीय शैली और अलंकृत भाषा के प्रयोग की वैदग्धी का भी परिचायक है।