१४ हम्मीर-महाकाव्य

संस्कृत के ऐतिहासिक-महाकाव्यों में हम्मीर-महाकाव्य का अपना एक विशेष स्थान है। ऐतिहासिक प्रामाणिकता के साथ साहित्यिक प्रौढ़ि और काव्यसुषमा की दृष्टि से भी यह एक श्रेष्ठ कृति है। इसके रचयिता नयचन्द्रसूरि नामक जैन कवि हैं। नयचन्द्रसूरि ने रणस्तम्भपुर (रणथम्भौर) के प्रख्यात वीर और शरणागत-वत्सल चौहानवंशी-नरेश हम्मीर-देव तथा मुस्लिम आक्रान्ता उलाउद्दीन खिलजी के ऐतिहासिक युद्ध की घटना को लेकर इस काव्य की रचना की है। स्वयं रचयिता ने तो इसे ‘महाकाव्य’ की संज्ञा से अभिहित किया ही है, लक्षणग्रन्थों की कसौटी पर कसने पर भी यह एक उत्तम कोटि कीय-सं.सा.इ. (अनु. मंगल.) पृष्ठ २१८ २. देखिए काव्य की सन्त-पुष्पिका - “इतिश्री जयसिंहसूरिशिष्यमहाकवि श्रीनयचन्द्रसूरिविरचित श्रीहम्मीरमहाकाव्ये वीराड्के …… सर्गः। तथा हम्मीरकाव्य, सर्ग १४, श्लोक ४१ २८० काव्य-खण्ड का सफल महाकाव्य सिद्ध होता है। अगरचन्द नाहटा, डा. दशरथ शर्मा तथा पं. बलदेव उपाध्याय के अनुसार इसका रचनाकाल १४०० से १४१० ई० के आसपास है। कि यह चौदह सर्गों में विभक्त है तथा कुल पद्यों की संख्या १५६४ है। इसके चतुर्दश सर्ग में कवि ने अपना भी संक्षिप्त परिचय दिया है। नयचन्द्र को ‘हम्मीर-काव्य’ रचने की प्रेरणा दो सूत्रों से प्राप्त हुई। प्रथम, यह कि स्वयं हम्मीर की दिवंगत आत्मा ने स्वप्न में दर्शन देकर कवि को इस काव्य की रचना का आदेश दिया। दूसरा कारण था ग्वालियर के तत्कालीन शासक (दुर्गपति) वीरमदेव का एक व्यंग्य वचन। दुर्गपति ने भरी सभा में कवि को लक्षित करते हुए यह कहा था कि आज के कवियों में प्राचीन कवियों के सदृश काव्य-निर्माण की शक्ति नहीं रह गई। नयेन्दु कवि ने चुनौती को स्वीकार किया और इस काव्य की रचना करके दुर्गपति के कथन को असत्य सिद्ध कर दिया (१४ ।२६,४३)।

ऐतिहासिकता

ऐतिहासिक तथ्यों के निरूपण की दृष्टि से हम्मीर महाकाव्य विशेष महत्त्व का है। इसमें चाहमान वंश की उत्पत्ति तथा उसके पूर्वपुरुषों का जो विवरण दिया गया है, उससे प्राचीन इतिहास के कतिपय अज्ञात पृष्ठ खुलते हैं। चाहमान वंश के आदि पुरुष का नाम चाहमान ही था, उसके वंशजों में वासुदेव, नरदेव, चन्द्रराज तथा अजयपाल राजा हुए। अजयपाल ने अजयमेरु (अजमेर) दुर्ग की स्थापना की थी। अजयपाल के पश्चात् जयराज, सामन्तसिंह, गूयक, नन्दन तथा वप्रराज ने शासन किया। वप्रराज ने शाकम्भरी देवी की आराधना की और शाकम्भरी (सांभर) को चाहमानों की राजधानी बनाया। वप्रराज के पश्चात् हरिराज राजा हुआ, जिसने शकराज को परास्त किया था। इसके बाद सिंहराज, भीमदेव तथा विग्रहराज चाहमान वंश के राजा हुए। विग्रहराज ने गुजरात के मूलराज को मारा था। इसी वंश में चामुण्डराय हुआ, जिसने हेजिमदीन शकाधिराज को परास्त किया था। दुर्लभराज ने शहाबदीन को तथा दुःशलदेव ने गुजरात के कर्णदेव को परास्त किया था। श्रीविश्वल ने मालवानरेश को हराया था। उसके पश्चात् इस वंश में पृथ्वीराज, आल्हणदेव, आनल्लदेव, जगदेव, विश्वलदेव, अजयपाल, गगदेव तथा सोमेश्वर राजा हुए। सोमेश्वर और उसकी रानी कर्पूरदेवी से पृथ्वीराज का जन्म हुआ। इस महाकाव्य में सहाबदीन (शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी) के साथ पृथ्वीराज के आठ युद्धों का वर्णन है, जिनमें सात में पृथ्वीराज ने गोरी को हराया तथा आठवें युद्ध में वह छल से पकड़ा गया। पृथ्वीराज के पश्चात् उसका उत्तराधिकारी हरिराज हुआ, जो विलासी तथा राजकार्य से उदासीन था। गोरी ने इस पर भी आक्रमण किया। हरिराज पराजित हुआ और अपनी रानियों के साथ जलकर मर गया। अजयमेरु गोरी के अधिकार में चला गया तथा चौहान राजाओं के परिजन रणथम्भौर (रणस्तम्भपुर) चले गये। पृथ्वीराज द्वारा निष्कासित उसका प्रतापी पौत्र गोविन्दराज यहां शासन कर रहा था। कवि नयचन्द्र ने १. तेरहवीं चौदहवीं शताब्दी के जैन संस्कृत महाकाव्य, पृष्ठ १६६ २. संस्कृत सा. का इतिहास, पृष्ट २७३ ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य २८१ गोविन्दराज के चरित्र तथा उसके उत्तराधिकारी राजाओं का भी वर्णन किया है। इन्हीं में वीरनारायण ने जलालुद्दीन खिजली से युद्ध किया था। इस वंश के जैत्रसिंह ने संवत् १३३६ में अपने पुत्र हम्मीर को राज्याभिषिक्त किया था। हम्मीर के अलाउद्दीन तथा उसके सेनापति उल्लूखान से हुए युद्धों का वर्णन इस महाकाव्य का प्रमुख विषय है, अंतिम युद्ध में हम्मीर को छल से पराजित किया गया था। संशयावारिसाना कवि ने हम्मीर और अलाउद्दीन खिजली के मध्य होने वाले युद्ध की ऐतिहासिक घटना को लेकर इस काव्य की रचना की है। प्रथम सर्ग में चाहमान वंश की उत्पत्ति तथा वासुदेव से लेकर सिंहराज तक चाहमान राजाओं का वर्णन है। द्वितीय सर्ग में भीमराज से लेकर पृथ्वीराजपर्यन्त १८ राजाओं का उल्लेख किया गया है। सोमेश्वर की राजमहिषी कर्पूरदेवी के गर्भ से पृथ्वीराज का जन्म हुआ था। तृतीय सर्ग में शहाबुद्दीन गोरी के आक्रमणों से त्रस्त होकर पश्चिम भारत के राजाओं ने पृथ्वीराज से सहायता मांगी। पृथ्वीराज ने शहाबुद्दीन पर चढ़ाई की और उसे बन्दी बनाया। इस प्रकार, गोरी सात बार कैद किया गया और पृथ्वीराज ने उसे दण्ड देकर प्रत्येक बार क्षमा कर दिया। आठवीं बार पृथ्वीराज स्वयं पराजित होकर बंदी हो जाता है और अनशन करने से उसकी मृत्यु हो जाती है। सेनापति उदयराज उपने स्वामी के उद्धार का प्रयत्न करता है, परन्तु इस सङ्ग्राम में उसकी मृत्यु हो जाती है। चतुर्थ सर्ग में पृथ्वीराज के पौत्र गोविन्दराज द्वारा रणस्तम्भपुर में नवीन राज्य स्थापित करने, उसके पुत्र प्रहलादन के मारे जाने, प्रहलादन के कनिष्ठ भाता वाग्भट द्वारा रणस्तम्भपुर को अधिकार में करने, उसके पुत्र जेत्रसिंह के गद्दी पर बैठने एवं उसकी पत्नी हीरादेवी के गर्भ से हम्मीर के उत्पन्न होने का वर्णन है। पञ्चम सर्ग में वसन्त ऋतु के आगमन पर युवक हम्मीर का उद्यान में जाने और वहां पौराङ्गनाओं की वन-क्रीडा का वर्णन है। षष्ठ सर्ग में जैत्रसागर में जल-क्रीडा का वर्णन है। सप्तम सर्ग में सन्ध्या, चन्द्रोदय और सुरत-केलि का वर्णन किया गया है। अष्टम सर्ग में स्वप्न में विष्णु का आदेश पाकर जैत्रसिंह, हम्मीर को राजा बनाता है। इसी सर्ग में हम्मीर के पिता की मृत्यु का वर्णन है। नवम सर्ग में हम्मीर की दिग्विजय का वर्णन है। हम्मीर के द्वारा कर न देने पर दिल्लीपति अल्लाबदीन अपने भाई उल्लूखान को हम्मीर पर आक्रमण करने के लिए भेजता है। धर्मसिंह की अदूरदर्शिता से चाहमान-सेना पराजित हो जाती है और भीमसिंह मारा जाता है। हम्मीर क्रुद्ध होकर धर्मसिंह की दोनों आंख निकालने तथा देश-निष्कासन का दण्ड देता है। हम्मीर भोज को दण्डनायक नियुक्त करता है। धर्मसिंह अपनी कूटनीति द्वारा पुनः अपना पुराना पद प्राप्त कर लेता है। प्रतिशोध की भावना से वह भोजदेव के विरुद्ध हम्मीर को उकसाता है और अपनी कूटनीति से भोजदेव का सर्वस्व छीन लेता है। अपमानित भोज दिल्ली पहुंचकर अलाउद्दीन की सेवा स्वीकार कर लेता है। हम्मीर भोज के पद पर रतिपाल को नियुक्त करता है। दशम सर्ग में भोज के परामर्श 9. नि.सा.प्रे. बम्बई, १८७E २८२ FIR काव्य-खण्ड से उलाउद्दीन उल्लूखान को हम्मीर पर आक्रमण करने भेजता है, जिसमें उल्लूखान पराजित होकर भाग जाता है। भोज की दुर्दशा सुनकर, क्रुद्ध अलाउद्दीन हम्मीर का मान-मर्दन करने की प्रतिज्ञा करता है। एकादश सर्ग में वह निसुरत्तरखान और उल्लूखान को विशाल सेना के साथ भेजता है। युद्ध में निसुरत्तखान मारा जाता है। द्वादश सर्ग में अलाउद्दीन स्वयं सेना लेकर रणस्तम्भपुर आता है। युद्ध में उसकी बहुत सी सेना मारी जाती है। त्रयोदश सर्ग में अलाउद्दीन उत्कोच देकर रतिपाल को अपनी ओर मिला लेता है। रतिपाल अपनी कूटनीति द्वारा रणमल्ल तथा कोष्ठागरिक जाहड़ को भी अपनी ओर खींच लेता है। अपने व्यक्तियों को शत्रु-पक्ष की ओर मिलते देखकर हम्मीर निराश हो जाता है। अन्तःपुर की स्त्रियां जौहर-व्रत करती हैं और हम्मीर युद्ध के लिए प्रस्थान करता है। युद्ध में अपनी पराजय को देखकर वह स्वयं अपना वध कर लेता है। इस सर्ग में महिमासाहि तथा जाज की स्वामिभक्ति की अभिव्यक्ति हुई है। वे हम्मीर के लिए स्वयं अपने सारे परिवार को मार डालते हैं। चतुर्दश सर्ग में हम्मीर के गुणों की स्तुति, रणमल्ल, भोज, जाहड़ तथा रतिपाल की निन्दा तथा महिमासाहि और जाज की प्रशंसा की गयी है। अन्त में ग्रन्थकर्ता की प्रशस्ति के साथ काव्य की समाप्ति होती है।

समीक्षा

रस-योजना की दृष्टि से हम्मीर महाकाव्य अपने युग का श्रेष्ठ महाकाव्य है। इसमें श्रृङ्गार और वीररस का प्रमुख स्थान है। कवि स्वयं कहता है- तद्भूचापलकेलिदोलितमनाः श्रृङ्गारवीराद्भुतम्। कि नित नई-चक्रे काव्यमिदं हमीरनृपतेर्नव्यं नयेन्दुः कविः।। निक वस्तुतः, हम्मीर महाकाव्य वीररस प्रधान काव्य है। इसके तृतीय सर्ग और नवम से त्रयोदश सर्गपर्यन्त प्रत्येक सर्ग में कहीं न कहीं वीररस का परिपाक अवश्य प्राप्त होता है। वसन्त एवं सुरत-वर्णन-प्रसङ्गों में श्रृङ्गाररस की अद्वितीय व्यञ्जना है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, महाकाव्यत्व की दृष्टि से इसको उत्कृष्ट रचना मानने में कोई विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती। महाकाव्य के शास्त्रीय लक्षणों के अनुसार यह सर्गबद्ध है और इसमें आठ से अधिक अर्थात् चौदह सर्ग हैं। इसका कथानक ऐतिहासिक है। धीरोदात्त गुण-सम्पन्न प्रख्यात वंशोद्भव क्षत्रियवीर इसका नायक है। अंगी रस ‘वीर’ है तथा शृंगारादि अन्य प्रासंगिक-रसों का यथाऽवसर उचित सन्नवेश किया गया है। चर्तुवर्ग में से शरणागत-धर्म तथा राष्ट्र-धर्म की सिद्धि-रूप प्रथम पुरुषार्थ इसका लक्ष्य है। यद्यपि इसमें अन्त में हम्मीरदेव की विजय नहीं होती, अपितु विवश होकर उन्हें आत्मोसर्ग करना पड़ता है, किन्तु इसी कारण इसको दुःखान्त रचना नहीं माना जा सकता। हम्मीरदेव का अटल निश्चय-देशजाति और धर्म के लिए उनकी ‘हट’ प्राणोत्सर्ग का मूल्य लेकर ही सही, पूर्ण होती है, अतएव महाकाव्य में फलागम व्याहत नहीं होता। इसका प्रमाण सहृदय पाठक १. हम्मीरमहाकाव्य, १४.४३ ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य २८३ ही हैं, क्योंकि इसे पढ़कर किसी में भी करुणा, अनुत्साह, दीनता जैसी निराशावादी वृत्तियों का उदय नहीं होता, अपितु राष्ट्र-देवता की बलिवेदी में मर मिटने की बलिदानी और उदात्त भावना ही जागरित होती है। महाकाव्य की परिपाटी के अनुसार प्रत्येक सर्ग में प्रायः एक ही वृत्त तथा सर्गान्त में वृत्त परिवर्तन के नियम का पालन हुआ है। नगर, वन, सागर, सूर्योदय, चन्द्रोदय, ऋतुचक्र, केलि, पुत्रोत्पत्ति, सैन्य-प्रस्थान आदि महाकाव्योचित समस्त विषयों का अवसरानुकूल चारु-चित्रण कवि ने किया है। प्रत्येक सर्ग का नामकरण तद्वर्णित वृतान्त के आधार पर किया गया है। भाषा-शैली एवं वैचारिक गम्भीरता के साथ-साथ कलात्मकता और उदात्तता उसे निश्चित रूप से महाकाव्योचित गरिमा प्रदान करती है। सूरिजी ने इसे ‘वीरांक’ कहकर सम्बोधित किया है। कवि का चरित्र-चित्रण-कौशल और रस-परिपाक नितरां श्लाघनीय है। शरणागत महिमासाहि की रक्षा के लिए हम्मीर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है, सचमुच ऐसा दान तो दानियों में विख्यात, कर्ण, शिवि, बलि और जीमूतवाहन भी न कर सके, कवि की कैसी मार्मिक और यथार्थ उक्ति है - उ राधेयः कवचं ददौ शिविरहो मांसं बलिमेदिनी जीमूतोऽर्धवपुस्तथापि न समा हम्मीरदेवेन ते। येनोच्चैः शरणागतस्य महिमासाहेनिमित्ते क्षणा- फक मा दात्मापुत्रकलत्रभृत्यनिवहो नीतः कथाशेषताम् ।। जरा कि (सर्ग ६, पद्य ११२) हम्मीरमहाकाव्य के प्रकृतिचित्रण अत्यन्त स्पृहणीय हैं। प्रकृति का मानवीकरण करके उसे मानव के सुख-दुःखों की सहचारिणी के रूप में उल्लास-अवसादमयी चित्रित करने में कवि अग्रणी है।” इसमें अनुष्टुप, उपजाति, द्रुतविलम्बित, प्रमिताक्षरा, ललिता, स्वागता, उपेन्द्रवजा, इन्द्रवंशा, शार्दूलविक्रीडित, वसन्ततिलका, स्रग्धरा, शिखरिणी, मालिनी, तोटक, मन्दाक्रान्ता, भुजंगप्रयात, कलहंस, शालिनी, आर्या, मंजुभाषिणी, प्रहर्षिणी से मिलता-जुलता एक छन्द, एक अर्धसमवृत्त तथा तीन प्रकार के विषम वृत्त-कुल २६छन्दों का प्रयोग हुआ है ‘। सबसे बड़ी बात है कवि का अपने कवित्व के प्रति अनुत्सेक। महाकवि कालिदास के सदृश नयचन्द्रसूरि भी अपनी बुद्धि को अणुरूपा कहकर अपनी विनम्रता प्रकट करते हैं - क्वैतस्य राज्ञः सुमहच्चरित्रं क्वैषा पुनर्मे धिषणाऽणुरूपा। जी का कानालामा । ततोऽतिमोहाद् भुजमेकयैव मुग्धस्तितीर्षामि महासमुद्रम् ।। (१।११) १. ते.ची.श.के जैन सं. म.का., पृष्ट १६२Profe | काव्य-खण्ड