१३ वस्तुपालविषयक अन्य महाकाव्य

वसन्तविलास के कथानायक वस्तुपाल से तत्कालीन अनेक कविगण प्रभावित रहे हैं। इस गुणग्राही, दानशील तथा उदात्तचरित्र मन्त्री के चरित्र को विश्रुत करने के लिए अन्य कवियों ने भी प्रशस्ति-परक काव्यों की रचना की। इनमें से अणहिलपाटल के चालुक्य राजवंश के कुल-पुरोहित सोमेश्वरदत्त या सोमेश्वरदेव अग्रणी कहे जा सकते हैं। सोमेश्वर, वस्तुपाल के मित्र और आश्रित कवि थे। ये प्रसिद्ध वैदिक तथा कर्मकाण्डी ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य २७६ ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे। वस्तुपालविषयक इनके काव्यग्रन्थ का नाम ‘कीर्तिकौमुदी’ है। उनका समय सन् ११७६ से १२६२ ई० के बीच माना गया है। आबू और गिरनार पर्वतों में वस्तुपाल द्वारा निर्मित जैनमन्दिरों में स्थित शिलालेखों की रचना भी इन्होंने की जिसमें उसकी प्रशस्तियाँ अंकित हैं। इनका लिखा हुआ एक अन्य ऐतिहासिक काव्य ‘सुरथोत्सव’ भी प्रसिद्ध है, जिसमें बाणभट्ट के समान इन्होंने अपना वृत्त भी लिखा है। इसमें पन्द्रह सर्ग हैं। आपाततः यह पौराणिक आख्यान पर आधृत है किन्तु कीथ उसको एक राजनीतिक-रूपक के रूप में सम्भावित करते हैं। इसमें पुनः वस्तुपाल का निर्देश किया गया है। ‘सुकृतसंकीर्तन’ इस विषय की दूसरी रचना है। इसके रचयिता अरिसिंह (१२२५ ई०), अमरचन्द्र के समकालीन तथा वीसलदेव के सभापण्डित थे। इसमें ग्यारह सर्ग हैं जिनमें वस्तुपाल द्वारा बनवाये मंदिरों का तथा उसके धार्मिक कृत्यों का वर्णन किया गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से इसकी उपयोगिता सोमेश्वरदेव के लेखों की परख में सहायक होने के कारण मानी गई है" । उदयप्रभसूरि नामक एक अन्य जैन कवि ने भी ‘धर्माभ्युदय’ नामक काव्य का प्रणयन करके इस प्रशस्ति-क्रम को आगे बढ़ाया। उदयप्रभसूरि, वस्तुपाल के धर्मगुरु आचार्य विजयसेनसूरि के पट्टधर थे। ये भी वस्तुपाल के समकालिक ही थे, क्योंकि इस ग्रन्थ का हस्तलेख १२२३ ई० में स्वयं महामात्य वस्तुपाल ने ही लिखा या लिखवाया। यह काव्य पौराणिक-शैली में लिखा गया है, जिसमें वस्तुपाल की तीर्थयात्राओं का रोचक वर्णन है। वस्तुपाल को जैनियों ने संघपति की विश्रुति दी थी इस कारण इस काव्य का दूसरा नाम संघपतिचरित भी है। इसमें १५ सर्ग हैं। प्रत्येक सर्ग के अन्तिम पद्य में ‘लक्ष्मी’ पद का सन्निवेश किया गया है। इस काव्य में घटनाओं के वर्णन का ही प्राथान्य है।