कुमारपालचरित अथवा व्याश्रय-काव्य के रचयिता गुर्जरदेश के प्रसिद्ध जैनसूरि हेमचन्द्राचार्य (सन् १०६६ ई. से ११७३) हैं। इन्होंने अणहिल पाटन के समसामयिक चालुक्यवंशी नरेश कुमारपाल के जीवनचरित को आधार बनाकर यह काव्य लिखा है। दो भाषाओं का आश्रय लेने के कारण ही इसे ‘याश्रयकाव्य’ की संज्ञा प्राप्त हुई है। संस्कृत वाले अंश में बीस सर्ग हैं और बाद के प्राकृत अंश में आठ सर्ग है। काव्य के दोनों भागों का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट पता चलता है कि कवि का लक्ष्य कुमारपाल के जीवनवृत्त के वर्णन के साथ-साथ संस्कृत और प्राकृत व्याकरण के उदाहरणों को प्रस्तुत करना भी है। इस प्रकार यह ऐतिहासिक काव्य के साथ-साथ एक शास्त्र-काव्य भी है तथा संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश-भाषाओं के व्याकरण जानने के लिए नितान्त उपयोगी
आचार्य हेमचन्द्र तथा उनकी रचनाएँ
आचार्य हेमचन्द्र अपने समय के सुप्रसिद्ध बहुविषयवेत्ता और प्रतिभाशाली जैनाचार्य थे। उनका जन्म गुजरात में अहमदाबाद से साठ मील दूर दक्षिण-पश्चिम में स्थित ‘धुन्धुका’ नगर में सन् १०८६ ई० के लगभग मोढ़-वैश्य-कुलोत्पन्न माता-पिता, ‘चाच’ तथा ‘पाहिणीदेवी’ के घर हुआ था। इनके पिता शैव और माता जैन थीं। केवल पांच वर्ष की अवस्था में ही ये जैनधर्म में दीक्षित हो गए और इक्कीस वर्ष की वय प्राप्त होते-होते इन्होंने सर्वोत्कृष्ट ‘सूरि’ या ‘आचार्य’ पदवी प्राप्त कर ली। हेमचन्द्र एक सच्चे जैन मुनि तथा अपने धर्म के उत्साही-प्रचारक थे। रचनाएँ- इनके द्वारा रचित पंक्तियों की संख्या साढ़े तीन करोड़ बतलाई जाती है। यदि हम इसे अतिशयोक्ति न मानें तो इनके लगभग सौ से भी अधिक ग्रन्थ सिद्ध १. बाम्बे संस्कृत सीरीज में प्रकाशित (ग्रन्थ संख्या REE तथा ७EYीयामा २७२ हो जाते हैं। प्रभावकचरित’ के अनुसार इनके मुख्य ग्रन्थों की संख्या बारह है। विषयानुसार महत्त्वपूर्ण रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं (१) पुराण - त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित (२) काव्य - कुमारपालचरित या द्याश्रयकाव्य (३) स्तोत्र - द्वात्रिंशिकाएँ, वीतरागस्तुति तथा महावीरस्तुति का (४) व्याकरण - सिद्धहेमशब्दानुशासन (१) छन्द - छन्दोऽनुशासन र (६) अलंकार - काव्यानुशासन (७) कोश - चार प्रसिद्ध कोश - कविता मला काही (क) अभिधानचिन्तामणि भारतीय कामगार की अर्थसंग्रह (ग) निघण्टु (घ) देशीनाममाला (८) दर्शन (न्याय) - प्रमाणमीमांसा (E) योग-योगशास्त्र
कुमारपालचरित, परिचय एवं समीक्षा
यह सत्य है कि आचार्य हेमचन्द्र की काव्यप्रवृत्ति केवल सहज साहित्यिक अभिप्रेरणा से नहीं, अपितु एक धर्म प्रचारक और आचार्य की सिद्धान्तोन्मुखी सोदेश्य-भावना से हुई है। इसलिए इनकी काव्य-रचनाएँ भी ‘अश्घोष’ की सरणी का अनुवर्तन करती हुई व्युपशान्तिमूलक-धर्म-भावना का अंग बनकर उद्भूत हुई है। फिर भी जैसा कि कुछ समीक्षकों का आक्षेप है, ये केवल शुष्क लेखक या प्रचारक जैन मुनि ही नहीं थे। उनका संस्कृत ड्याश्रयकाव्य बहुगुण-संचालित और रस-भाव-समन्वित है। सृष्टिवर्णन, ऋतुवर्णन आदि महाकाव्य की सभी मुख्य और अवान्तर विशेषताएँ इसमें वर्तमान हैं। शास्त्रकाव्यों की परम्परा में भी इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह काव्य, व्याकरण, इतिहास और काव्य-तीनों का संवाहक है। इसका ट्याश्रय नाम जहाँ इसकी आश्रयभूत दो भाषाओं की व्यंजना करता है वहीं इसके ऐतिहासिक और व्याकरणात्मक दो लक्ष्यों को भी अभिव्यक्त कर देता है। इस काव्य में हेमचन्द्र ने गुजरात के राजाओं का चरित अपने आश्रयदाता और प्रिय शिष्य कुमारपाल तक उपनिबद्ध किया है। १. निर्णयसागरप्रेस तथा विद्याभवन १६४० २. कीय-संस्कृत सा. का इतिहास (अनु. मंगलदेव शास्त्री) (पृष्ठ २१६) ३. भगवतशरण उपाध्याय-विश्वसाहित्य की रूपरेखा उघृति-मुसलगांवकर, आचार्य हेमचन्द्र, पृष्ठ ४७।। ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य २७३ संस्कृत कवि-परम्परा का अनुसरण करते हुए कवि, मंगलाचरण द्वारा काव्यारम्भ करता है। इसके बाद चालुक्यवंश की स्तुति, अणहिलपाटन का सरसवर्णन और वंश के आदिपुरुष मूलराज का वर्णन किया गया है। यह वर्णन पंचमसर्ग तक चलता है, इसमें मूलराज द्वारा ग्राहरिपु को पराजित करने तथा बन्दी बनाने का वृत्तान्त है। छठे सर्ग में मूलराज के पुत्र चामुण्डराय के जन्म तथा राज्याभिषेक आदि की कथा है। सप्तम सर्ग से लेकर दशम तक अनेक राजाओं का वर्णन है। एकादश सर्ग में जयसिंह की उत्पत्ति, द्वादश से पंचदश सर्गों तक उसके जीवन की विविध घटनाओं का और षोडशसर्ग में जयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल के राज्याभिषेक का वर्णन है। यहां अर्बुद पर्वत अभियान तथा प्रसंगतः षड्ऋतुओं का मनोहारी चित्रण किया गया है। सप्तदश सर्ग में स्त्रियों द्वारा पुष्पावचय, जलक्रीडा, सुरतक्रीडा, आदि विलासों का, अष्टादशसर्ग में कुमारपाल और अरणोराज के युद्ध तथा कुमारपाल की विजय का तथा उन्नीसवें में कुमारपाल को प्रसन्न करने के लिए अरणोराज द्वारा अपनी कन्या के दान का विशद अंकन किया गया है। बीसवें सर्ग में कुमारपाल द्वारा अहिंसाप्रचार के कार्यों का सुन्दर वर्णन है। कई वस्तुतः इस काव्य में जैनधर्म के प्रचारार्थ किए गए कुमारपाल के कार्यों का अंकन प्रधान है, साथ ही व्याकरण-सूत्रों के उदाहरण भी बड़ी कुशलता से पिरोए गए हैं। कवि की व्याकरण के उदाहरणों पर भी दृष्टि रहने के कारण कहीं-कहीं कृत्रिमता दिखलाई पड़ती है फिर भी, ऋतुवर्णन, सन्ध्या, उषा एवं युद्ध आदि के दृश्य सजीव द्याश्रय काव्य के कुछ श्लोकों में इतिहास व व्याकरण का सामञ्जस्य अतीव रोचक है। यथा तत्तद्धितं कर्तृभिरात्मभर्तुः समेत्य वृद्वैर्युवभिः क्षणाद्वा। दुष्टैरथावन्तिभटैः स वप्रोऽध्यारोह्य भीतैः रणतुर्यवाद्यात्।। (१४,३७) इन उक्त श्लोक में इतिहास के रूप में अवन्तिभटों की स्थिति का वर्णन है। वे वृद्ध-युवा सभी अपने दुर्ग के परकोटे की रक्षा में लग गये और चौलुक्य सेना के सामरिक नगाड़ों की आवाज से नहीं डरे। इस वर्णन में दीर्घकाल तक चलने वाले युद्ध की सूचना दी गयी है। परन्तु इसमें हैमव्याकरण के चतुर्थ अध्याय के प्रथम पाद के १-६ तथा ११ सूत्र के उदाहरण दिये गये हैं। इसी प्रकार - सुप्रेयसी करुणया बहु विष्णुमित्र ग्रामेऽप्यभूत ससुत एव जनो नृपेऽस्मिन् । सुभ्रातपुत्रसहिते क्षतनाडिकृत, तंत्री-गला-जबलिमाय न देवतापि।। इस श्लोक में कुमारपाल की अमारि-घोषणा के प्रभाव का वर्णन है। इसके साथ ही हैम-व्याकरण के पांच सूत्रों ७.३.१७५ से १८० के उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं।२७४ | काव्य-खण्ड IBith जम्मा आचार्य हेमचन्द्र का व्याकरणोदाहरणविषयक एक पद्य भी-आस्वादनीय है। नमस्स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च (अष्टा. २।३।१६) इस पाणिनीय सूत्र का निदर्शनभूत यह अनुष्टुप् नितान्त रमणीय बन गया है - तप को कम स्वधा पितृभ्य इन्द्राय वषट् स्वाहा हर्विभुजे। नमो देवेभ्य इत्यविग्वाचः सस्यश्रिया फलान्।। (३।३४) को इस प्रकार इस अति संक्षिप्त परिचय और समीक्षण से भी संस्कृत ऐतिहासिक महाकाव्यों की परम्परा में ‘कुमारपालचरित’ के विशिष्ट स्थान का अनुमान सरलता से किया जा सकता है। माना गाना पिक विम . शिक्षा का DEI किया कि यह