सन्ध्याकरनन्दी ने बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ‘रामपालचरित’ नामक महाकाव्य की रचना की। इसमें चार परिच्छेदों में दाशरथि राम तथा राजा रामपाल की कथा एक साथ प्रस्तुत की गई है। सन्ध्याकरनन्दी महाराज रामपाल के पुत्र मदनपाल के शासनकाल में रहे, इनके पिता प्रजापति नन्दी महाराज रामपाल के मन्त्री थे। राजा रामपाल का इतिवृत्त इन्हें अपने पिता के प्रामाणिक ग्रन्थ के रूप में प्राप्त हुआ। इस प्रकार इस काव्य का ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्त्व है। रामपाल का शासनकाल १०१७ई०से ११२० ई०है। पूरे काव्य में २२० आर्याएं हैं। चतुर्थ परिच्छेद के दसवें पद्य तक कवि ने भगवान् राम तथा राजा रामपाल की कथा एक साथ कही है, उसके अनन्तर रामपाल के पुत्र कुमारपाल, पौत्र गोपाल तथा पुत्र मदनपाल क्रमशः राजा हुए, जिनका वृत्तान्त कवि ने श्लेष के द्वारा भरत, शत्रुघ्न और कुश के वृत्त का निरूपण करते हुए प्रस्तुत कर दिया ऐतिहासिक दृष्टि से इस काव्य में बंगाल के पालवंशीय राजाओं के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। उत्तरी बंगाल में राजा महीपाल को राज्यच्युत करके राजा रामपाल का अपने पैतृक राज्य को पुनःप्राप्ति- यह घटना उसमें प्रामाणिक रूप में वर्णित सन्ध्याकरनन्दी ने पालवंशीय राजाओं के पूर्वपुरुषों का भी वर्णन किया है। काव्य का आरम्भ धर्मपाल की चरितगाथा से होता है, जो इस राजवंश का संस्थापक था। धर्मपाल के पश्चात् तीसरा राजा विहपाल हुआ, जिसने दाहल के राजा करण को जीता था तथा उसकी कन्या यौवनश्री से विवाह किया था। इस विवाह से उसे तीन पुत्रों की प्राप्ति हुई महीपाल, सरपाल, तथा रामपाल । महीपाल ने राजा बनते ही अपने दोनों छोटे भाइयों को बन्दी बना लिया। तब उसके राज्य में सामन्तों और प्रजा ने विद्रोह कर दिया, जिसकी परिणति महीपाल के अंत में हुई। २७१ ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य रामपाल ने अपनी पितृभूमि को शत्रुराजा से जीतकर पुनः प्राप्त किया, फिर रामावती नगरी बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया। प्रजा के विद्रोह, रामपाल का महीपाल के कारागार में कष्ट, युद्ध आदि घटनाओं का सजीव चित्र उपस्थित किया है। वरेन्द्री और रामावती नगरियों का भी आंखों देखा सा वर्णन कवि ने किया है और उसके साथ श्लेष का निर्वाह कर कठिन कविकर्म को साधा है। उदाहरणार्थ - बहुधान्यराजसंहतिसम्मानितकाम्यरूपतया लक्ष्म्या। सर्वशास्तारितया प्रस्फुरदिक्ष्चाकुशेखराभरणम्।। ३।१७ प्रचुर धान्यसम्पन्न होने, राजाओं के द्वारा सम्मानित होने तथा लक्ष्मी और उन्नत वंशों (बांसों) के कारण तथा इक्षु (ईख) आदि के कारण वह नगरी विभूषित है। न ।