०६ विक्रमाङ्कदेवचरित-परिचय एवं समीक्षा

ऐतिहासिक विद्वानों के अनुसार बिल्हण ने इस महाकाव्य की रचना लगभग १०६५ ई. से पहले ही कर ली थी, क्योंकि इसमें काव्यनायक विक्रमादित्य के उस वर्ष के प्रसिद्ध ऐतिहासिकवृत्त-दक्षिण ओर के अभियान (नर्मदापरतटाभियान) का कोई उल्लेख नहीं मिलता’ साथ ही कश्मीर का हर्षदेव जो उसी वर्ष राजा बना था, उसको बिल्हण राजा के रूप में नहीं अपितु राजकुमार के रूप में ही चित्रित करते हैं जिससे उसके राज्याभिषेक के पूर्व ही इस ग्रन्थ की समाप्ति सूचित होती है। अष्टादश-सर्गात्मक यह काव्य अपने उद्देश्य और प्रभाव की दृष्टि से पूर्ण एवं समर्थ है। यद्यपि एम. कृष्णमाचारियर सदृश कुछ विद्वान्, इसमें विक्रमादित्य के उपर्युक्त नर्मदापरतटाभियानसंज्ञक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य की चर्चा न होने के कारण इसको कवि और चरितनायक के बीच बाद में घटित हो जाने वाले दौर्मनस्य के कारण बीच में छोड़ा हुआ अथ च अपूर्ण मानते हैं । म किन्तु सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर उनका यह मत हैत्वाभासग्रस्त ही प्रतीत होता है, क्योंकि काव्य के इस उपसंहारात्मक पद्य से तथाकथित विरोध-कल्पना का स्वयमेव निषेध हो जाता है - ५. कीथ - संस्कृत साहित्य का इतिहास (अनुवाद मंगलदेव शास्त्री, पृष्ठ १E२) पं. बलदेव । उपायाय-संस्कृत साहित्य का इतिहास, द्वितीय संस्करण (१६७५, पृष्ठ ८७४) तथा प्रियतमचन्द्र शास्त्री- विक्रमांकदेवचरितस्य सा. सर्वेक्षणम्, पृष्ठ २७। विक्रमांकदेवचरित-८६४ ३. यस्य प्रेयान्प्रथमतनयः कं न चक्र सहर्ष । लिगामामा शिरा कालिम श्रीहादप्यधिककवितोत्कर्षवान्हर्षदेवः ||52 किमी ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य दिङ्मातङ्गरपि सपुलकैः शुश्रुवे यस्य कीर्ति निद्रामुद्राप्रणयिषु मदास्वादतः षट्पदेषु। विनीतानीमा । हासिल तेन प्रीत्या विरचितमिदं काव्यमव्याजकान्तं कर्णाटन्दोर्जगति विदुषां कण्ठभूषात्वमेतु।। विक्रमांकदेवचरितम् १८१०२ इसका अन्तिम पद्य भी इस काव्य की सम्पूर्णता का ही द्योतन करता है। “स व्युत्पत्ति सुकविवचनेष्वादिकर्ता श्रुतीनां देवः प्रेयानचलदुहितुर्निश्चलां वः करोतु" (वही १८/१०८) कहकर कवि ने “मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि च शास्त्राणि” इस नीति के अनुसार मंगलान्त-समापन किया है। सर्ग की अन्तिम पद्यसंख्या १०८ भी माला की मणिसंख्या के सदृश साभिप्राय निश्चित की हुई सी प्रतीत होती है। नमः विक्रमाकदेवचरित मूलतः चालुक्यवंशी नरेश विक्रमादित्य (षष्ठ) को नायक बनाकर लिखा गया सरस महाकाव्य है, अतएव इसमें तत्कालीन इतिहास के साथ-साथ कवि कल्पना का वैभव, अतिशयोक्ति, चरित्र-चित्रण (भले ही किसी को इतिहास विरुद्ध प्रतीत होते हों) आवश्यक तथा शोभादायक तत्त्व ही कहे जायेंगे। प्रथम १७ सर्गों में चालुक्यवंश की उत्पत्ति और उस वंश में उत्पन्न कुछ प्राचीन राजाओं का वर्णन कर ऐतिहासिक राजा और काव्यनायक के पिता आहवमल्ल (सन् १०४०-१०६६) का विशेष रूप से वर्णन है। शिव की कृपा से प्राप्त हुए तीनों पुत्रों - सोमेश्वर, विक्रमादित्य और जयसिंह का वर्णन करते हुए कवि ने युवराजपद हेतु विक्रमादित्य को ही योग्यता तथा पितृप्रियता का संकेत किया है। आहवमल्ल की मृत्यु के बाद कालान्तर में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं कि न चाहते हुए भी मध्यमपुत्र विक्रमादित्य को ही राज्यसिंहासन सम्हालना पड़ता है। इस ऐतिहासिक संघर्ष के निरूपण में कवि ने चरितनायक विक्रमाङ्क के शील, सौजन्य और धीरोदात्तता की युक्तिपूर्वक रक्षा की है, इस काव्यात्मक तथा बहुत कुछ काल्पनिक वर्णन में भी उस काल के कतिपय महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य प्रामाणिक रूप में प्राप्त हो जाते हैं, यथा (१) कल्याणीचालुक्यों के सत्तासंस्थापक तैलप (६७३ से ६६७ ई.) द्वारा राष्ट्रकूटों की सत्ता का समूल निर्मूलन, मालवनरेश पर आक्रमण आदि। (२) त्रैलोक्यमल्ल या आहवमल्ल (१०४२ से १०६८ ई.) द्वारा कल्याणनगर का निर्माण। मोज, कर्ण तथा चोलों पर आहवमल्ल की विजय १. इन सब के समर्थन के लिए द्रष्टव्य - (क) अली हिस्ट्री आफ दक्कन, पृष्ठ ८२ (ख) एशेण्ट इण्डिया (हिन्दी अनुवाद), पृष्ठ ३६० (ग) एपीग्राफिया इण्डिका, १२२६८ आदि ऐतिहासिक ग्रन्थ । २५८ काव्य-खण्ड निश्चय ही बिल्हण ने अपने आश्रयदाता की एक परम नीतिज्ञ और सत्यपरायण राजा के रूप में छवि निर्मित करने के लिए कतिपय वास्तविक घटनाओं को कल्पना का रंग देकर प्रस्तुत किया है तथा कुछ तथ्यों को अनदेखा किया है। चोलवंशीय राजाओं के शिलालेखीय प्रमाणों से यह विदित होता है कि सोमेश्वर द्वितीय तथा उसका अनुज विक्रमादित्य षष्ट सन् १०३० ई. के पूर्व अवश्य जन्म ले चुके थे, क्योंकि १०४५ ई. में चोलों और चालुक्यों के युद्ध में विक्रमादित्य षष्ट सम्मिलित हुआ था। विक्रमाकदेवचरित के कथानायक के पिता सोमेश्वर प्रथम का राज्याभिषेक १०४२ ई. में हुआ था। बिल्हण सम्राट् सोमेश्वर प्रथम को अपनी पटरानी के साथ पुत्रप्राप्ति के लिए व्रत आदि का अनुष्ठान करता हुआ चित्रित करते हैं, और फिर दिव्यवाणी के द्वारा उन्हें तीन पुत्रों की प्राप्ति और उनमें मध्यमपुत्र का गौरव गान कराते हैं। यह काल्पनिक वृत्त ऐतिहासिक कालक्रम के साथ संगत नहीं बैठता है। इसके साथ ही बिल्हण का कथन है कि पिता सोमेश्वर प्रथम अपने मध्यम पुत्र विक्रमादित्य षष्ठ को ही युवराजपद देना चाहते थे, उसने यह पद विनम्रता और परंपरानिर्वाह के कारण अस्वीकार किया। बिल्हण का यह कथन विक्रमादित्य षष्ट के ही एक शिलालेख से मिथ्या साबित हो जाता है, जिसमें स्वयं राजा सोमेश्वर प्रथम द्वारा स्वेच्छा से अपने ज्येष्ठ पुत्र को ही यौवराज्य देने की बात कही गयी है। बिल्हण ने कथानायक के ज्येष्ठ भाता सोमेश्वर द्वितीय की छवि एक दुराचारी और आततायी राजा के रूप में निर्मित करने का प्रयास किया है, जिसने अपने छोटे भाई के साथ छल किया। शिलालेखों के प्रमाण कुछ दूसरी ही कहानी कहते हैं, और वास्तव में विक्रमादित्य षष्ट ने ही राजेन्द्र चोल से सांठगांठ करके अपने बड़े भाई के विरुद्ध षडयंत्र रचा था, जिसके कारण विवश होकर सोमेश्वर द्वितीय को उससे संग्राम करना पड़ा। इस संग्राम में विक्रमादित्य षष्ठ उसे हरा कर राजा बना। राजा बनने के कुछ समय पश्चात् अपने अनुज तथा युवराज जयसिंह को भी उसने अपदस्थ कर दिया, क्योंकि अपने पुत्र को युवराजपद देना था। इन सारी घटनाओं में कथानायक का अपने बड़े तथा छोटे भाइयों से हुए संग्राम तो ऐतिहासिक सत्य हैं, पर बिल्हण ने उन्हें इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि अपराधी ज्येष्ठ और कनिष्ठ माता ही साबित हों, कथानायक का अपराध छिप सके। इन सारे तथ्यों का विश्लेषण करते हुए प्रो. पाठक ने बिल्हण का कथानायक का पक्ष-प्रवक्ता कहा है। महाकाव्य की दृष्टि से समीक्षण :- लक्षण-ग्रन्थों में निरूपित महाकाव्यत्वाधायक सभी तत्त्व इस काव्य में सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं। कवि ने अपने काव्यनायक को धीरोदात्त-गुणसम्पन्न, अविकत्थन, महाबलशाली तथा अत्यधिक गम्भीर और दृढव्रती १. एशेट हिस्टोरियंस आफ इडिया, पृ.५८-७४ २. अविकत्यनः क्षमावानतिगम्भीरों महासत्त्वः। स्थेवन्निगूढमानो धीरोदात्तो दृढवतः कथितः ।। २५E ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य के रूप में चित्रित किया है । इस महाकाव्य का अंगीरस वीर है, जिसे कवि ने आरम्भिक आशीर्वादात्मक मंगलपद्य में कंसशत्रु भगवान कृष्ण के कृपाण का संकेत करते हुए व्यंजित किया है। महकाव्य के प्रथम सर्ग में ही खलों की निन्दान और सज्जनों की प्रशंसा की गयी है। प्रत्येक सर्ग में पृथक् छन्द हैं तथा सर्गान्त में छन्दःपरिवर्तन किया गया है। इसके एकादश सर्ग में सन्ध्या और सूर्य का, एकादश, चतुर्दश तथा पंचदश सों में चन्द्र का, षोडश सर्ग में प्रदोष तथा रात्रि का, सप्तदश सर्ग में वन, पर्वत एवं मृगया का सम्यक् वर्णन है। इस प्रकार महाकाव्य के लिए सभी आवश्यक विषयों का चारुता से सन्निवेश किया गया है। ऋतुओं का भी बड़ा मनोहारी चित्रण कवि ने प्रसंगानुसार उपन्यस्त किया है । महाकवि बिल्हण का प्रकृति-वर्णन भी अत्यन्त स्वाभाविक तथा मनोहर है, प्रातःकाल का यह चित्र कितना स्पृहणीय है खण्डः क्षपास कियतीष्वपि यः कृशागि, SERTREE भङगीमनङगपरशोः सदशीं बिभर्ति। न सोऽयं निमज्जति जगन्नयनाभिरामः लाई त म एक श्यामावधूवदनवन्दनबिन्दुरिन्दुः।।११।।७८।। समान तु किरी पाक वीररस तो मानो कवि का सिद्धरस है, विक्रमादित्य की रणयात्रा में चल रहे अश्वों के सम्बन्ध में कही गई कवि की यह उक्ति केवल उत्प्रेक्षा नहीं है, अपितु अपनी पदशय्या और नाद-सौन्दर्य से वह युद्धभूमि का सहज सफल चित्रांकन भी है खुरघट्टितवैरिकुट्टिमस्फुटितैर्वहिनकणैः कदर्थिताः। न निघर्षमकार्षुरछिभिश्चटुलैये क्वचिदेव वर्मनि।। १५३५ ।। का विक्रमाङ्कदेव के शृंगार-रस-पूर्ण प्रसंग भी कम आवर्जक नहीं हैं। एक उदाहरण दृष्टव्य है १. (क) अविकत्यनत्व के लिए देखिए - विक्रमाक चरित का ५५० पद्य। क हा जाता (ख) क्षमाशीलता के लिए - ६३ पद्य तथा १४।५५ । (ग) गाम्भीर्य के लिए द्रष्टव्य ६१३ तथा १४ १४ ॥ (घ) दृढव्रत के लिए सर्ग, श्लोक ३६ से ५५ तक २. मुजप्रभादण्ड इबोर्ध्वगामी स पातु वः कसरिपोः कृपाणः । (विक्रमांकदेवचरित, १६) ३. विक्रमाकदेवचरित, १२० ४. विक्रमाकदेवचरित, ११७।। ५. वसन्त का वर्णन सप्तम तथा दशम सर्गों में, ग्रीष्म का दादश सर्ग में, वर्षा का त्रयोदश सर्ग में, शरद् का चतुर्दश में और हेमन्त का षोडश सर्ग में द्रष्टव्य है। २६० तस्यापि पपुः प्रपापालिकया समर्पित चिरेण पान्थाः कथमप्यनादरात्। तक माहिती तदीय बिम्बाधरपानलम्पटाः सपाटलामोदमपि प्रपाजलम् । १३ ॥१०॥ इस काव्य में सबसे महत्त्वपूर्ण बात है, कवि की जन्मभूमि के प्रति अनन्यप्रीति तथा सारस्वत-स्वाभिमान की निर्व्याज अभिव्यक्ति। सुदूर दक्षिणदेश में रहते हुए भी वह अपनी मातृभूमि कश्मीर के विषय में अतिशय आदर और आत्मीयता-भरी प्रशस्ति अंकित करता है। कवि का यह कथन कि ‘केसर और कविता काश्मीर को छोड़कर अन्यत्र नहीं उपजती" दूसरों की दृष्टि में अतिशयोक्ति हो सकती है, किन्तु कवि ने अपने शैशव तथा कैशोर्यवय में जो स्वर्गसुख कश्मीर में भोगा था, उसकी कोई तुलना वह और किसी से कैसे कर सकता है।