०४ नवसाहसाङ्कचरित-परिचय एवं समीक्षा

जैसा कि पहले कहा जा चुका है इस काव्य का वर्ण्यविषय परमारवंश की राज्यश्री का सिन्धुराज द्वारा स्थिरीकरण तथा सिन्धुराज के पराक्रम, विवाह ओर आमोद-प्रमोद का सरस चित्रण है। यद्यपि कतिपय समालोचक इसमें गम्भीर ऐतिहासिकता का अभाव मानते हैं ’ फिर भी इसमें परमारों का जो इतिहास दिया गया है वह बहुत कुछ प्रामाणिक तथा विश्वसनीय है, क्योंकि इसकी पुष्टि शिलालेखों तथा अन्य बहिरंग प्रमाणों से भी होती है। नवसाहसांकचरित में सिन्धुराज ने जिन राजाओं और देशों पर विजय प्राप्त की है उसकी ऐतिहासिकता अब स्वीकृत हो चुकी है। इसके द्वादश-सर्ग में सिन्धुराज से पूर्ववर्ती समस्त परमारवंशी राजाओं का कालक्रम से वर्णन है जो परमार-राजवंश का इतिहास जानने के लिए महत्त्वपूर्ण है। महाकाव्य की दृष्टि से यह एक उत्कृष्ट रचना है। इसका अंगी रस तो रसराज श्रृंगार है किन्तु इसमें प्रकरणवश वीर, अद्भुत, आदि सभी रसों का समुचित सन्निवेश है। कवि ने आरम्भ में क्रमशः शिव, चन्द, गणेश तथा वाणी की स्तुति करके मंगलाशंसन किया है। इसके अनन्तर वे उस साहित्य-रस की वन्दना करते हैं जिसके एक सीकर की ऐसी अद्भुत महिमा है जिसके प्रभाव से सज्जन का मुख और भी अधिक सुवर्णता और दुर्जन का मुख दुर्वर्णता को प्राप्त हो जाता है । कवि परिमलगुप्त, कालिदासादि महाकवियों के द्वारा आविष्कृत उस वैदर्भमार्ग के कवि हैं जिन्हें स्वयं उन्होंने ही तलवार की धार पर दौड़ने के समान कठिन कहा है।’ महाकवि कालिदास के प्रति उनकी असीम श्रद्धा है, वे प्रसाद, हृद्य तथा अलंकारमनोहर उनकी वाणी को उपमान बनाकर प्रस्तुत करते है तो “प्रसादहृद्यालङ्कारैस्तेन, मूर्तिरभूष्यत। IF TSP अत्युज्ज्वलैः कवीन्द्रेण कालिदासेन वागिव ।।” TE THE सागर DIRE (नवसाहसाङ्कच२।६३) fat-Ed. V.S. Islampurkar B.B.S. 53, 1895; G. Buhler and Zachari acc, Uberdas Navsahasanka Charita (1BBB) तथा कीथ कृत सं. सा. का इति. (अनु. मंगलदेव शास्त्री, पृष्ठ १८६) २. विशेष द. vv. Mirashi - Historical Date in Navasahasanka Charita LA. Feb. 1933 PP. 101-107. ३. नमोऽस्तु साहित्यरसाय तस्मै निषिक्तमन्तः पृषता ऽपि यस्य। सुवर्णतां वक्त्रमुपैति साघोर्दुबर्णतां याति च दुर्जनस्यं ।। (नवसाइसाक ११४) ४. निस्त्रिंशधारासदृशेन येषां वैदर्भमार्गेण गिरः प्रवृत्ताः। (वही १५)२५४ जाकत काव्य-खका कातिको महाकवि द्वारा वर्णित पात्रों को अपने औपम्यविधान के अन्तर्गत स्थापित करके वे उनके प्रति अपना सम्पूर्ण आदर व्यक्त करते हैं-‘शशिप्रभा’ की सखियाँ उसे आशीर्वाद देती हुई कहती हैं - स्थिरा भव नृपेण त्वमिह संयोगमाप्स्यसि। यथा कण्वाश्रमे पूर्व दुष्यन्तेन शकुन्तला (७।६६) रही कालिदास के ही समान पद्मगुप्त भी अतिशय विनम्र हैं। इतनी उत्कृष्ट काव्यकृति की रचना के बाद भी वे अवलिप्त नहीं हैं। महाकवि की शैली और उक्ति-वैचित्र्य से भी वे प्रभावित हैं। किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वे कालिदास के अनुकर्ता-मात्र हैं। परिमल-कालिदास की अपनी मौलिकता अक्षुण्ण है। उनके अप्रस्तुत विधान, उनकी उपमा और उत्प्रेक्षा एक नवीन अनुभव और चमत्कार लिए हुए दिखलाई पड़ते हैं। बिरहपीड़िता नायिका का यह वर्णन कितना स्वाभाविक तथा मार्मिक है- मा जतिन का “एषा शिखेव दीपस्य मुग्धा दग्धदशाश्रया। प्रतिनिधि स्मरानिलपरामर्शादितश्चेतश्च । वेपते।।” (१६ ३७) डागात दस कामदशाओं के आश्रय में यह शिखा की भांति स्मर (कामदेव) रूपी वायु के छू जाने से इधर से उधर कांप रही है। - यहां दशा (दिये की बाती तथा कामावस्था) में श्लेष कथ्य से चमत्कार आ गया है। प्रो.विश्वम्भर सहाय पाठक ने नवसाहसाचरित की ऐतिहासिकता का परीक्षण करते हुए निष्कर्ष दिया है कि इसमें नायक की पाताललोक-यात्रा तथा नागकन्या का वरण आदि जो वृत्तांत आपाततः कपोलकल्पित प्रतीत होते हैं, वे वस्तुतः प्रतीकात्मक ढंग से वास्तविक घटनाओं का ही संकेत देते हैं। कवि पद्मगुप्त प्रो. पाटक के मत से जैन कथासाहित्य से प्रभावित हैं और उसके अभिप्रायों का उन्होंने यहां प्रतीकात्मक शैली में उपयोग किया है।’