०३ नवसाहसाङ्कचरित

मानवसाहसाङ्कचरित’ को संस्कृत का उपलब्ध प्रथम ऐतिहासिक महाकाव्य माना जा सकता है। इसके रचयिता का नाम पद्मगुप्त परिमल है। महाकवि कालिदास की शैली तथा रस-रीति के सफल अनुकर्ता होने के कारण इस कवि को ‘परिमल-कालिदास’ भी कहा जाता था। नवसाहसाङ्कचरित मालवा के राजा ‘नवसाहसांक’ उपाधिधारी सिन्धुराज के पराक्रमपूर्ण वृत्त को आधार बनाकर लिखी गई एक प्रशस्तिपूर्ण यथोगाथा है। इसमें १८ सर्ग हैं, जिनमें परमारवंशी राजाओं की वीरपरम्परा का वर्णन करते हुए ‘उपेन्द्र’ नामक राजा से लेकर नबसाहसाक तक के इतिवृत्त का ऐतिहासिक विवरण तथा नवसाहसाक सिन्धुराज द्वारा नागों के शत्रु वजांकुश को पराजित करके नागराज शंखपाल की पुत्री शशिप्रभा से विवाह करने की घटना का बहुत कुछ काल्पनिक और अलंकृत वर्णन किया गया है।

कविपरिचय

‘नवसाहसाङ्कचरित’ के प्रत्येक सर्ग की पुष्पिका में कवि ने अपने को ‘मृगांकसूनु’ कहा है जिससे इनके पिता का नाम मृगांक या मृगांकदत्त’ सिद्ध होता है। इसके अतिरिक्त इनके विषय में सारी बातें अनुमेय ही रह जाती हैं, क्योंकि न तो उन्होंने और न ही किसी अन्य ग्रन्थकार ने इनके जन्मस्थान, वंश और इतिवृत्त आदि के विषय में कहीं कुछ संकेत दिया है। भोजकृत सरस्वतीकण्ठाभरण, क्षेमेन्द्र की औचित्यविचारचर्चा, मम्मट के काव्यप्रकाश तथा वर्धमान के गणरत्नमहोदधि में इनकी उधृतियाँ तथा उल्लेख मिलते हैं, किन्तु ‘पद्मगुप्त सम्बन्धी वैयक्तिक जानकारी इनमें भी प्राप्त नहीं होती। कश्मीरी काव्यशास्त्रियों, मम्मट और क्षेमेन्द्र द्वारा उद्धृत किए जाने से पं. उपाध्याय जी ने इनके कश्मीराभिजन होने की सम्भावना प्रकट की है । इसका साधक हेतु यह भी है कि १. पं. उपाध्याय-संस्कृत साहित्य का इतिहास (दशम संस्करण), पृष्ट २५ । २. वही, पृष्ठ २५६ ३. चन्द्रशेखर पाण्डेय - संस्कृत साहित्य की रूपरेखा (चतुर्दश संस्करण), पृष्ठ ३४७ ४. पं. उपाध्याय-वहीं, पृष्ठ २५६ । २५२ Mia 15 काव्य-झण्ड पद्मगुप्त ने अपने आदर्शभूत कवियों में नामग्रहणपूर्वक कश्मीरी कवि ‘भर्तृमेण्ट’ को विशेष आक्र के साथ स्मरण किया है । इतना तो सुनिश्चित है कि कवि पद्मगुप्त धारानरेश वाक्पति उपाधिधारी मुंज के सभाकवि थे, क्योंकि वे अपने काव्य में ‘मुंज’ की प्रशंसा करते हुए उनके स्वर्गवासी हो जाने की चर्चा अत्यन्त दुःख के साथ करते हैं। मुंज की मृत्यु के बाद ये इतने विषण्ण हुए कि इन्होंने अपनी काव्यकला को ही सम्मुद्रित कर दिया, किन्तु मुंज के अनुज नवसाहसाङ्क द्वारा सत्कृत होने तथा अनुरोध किए जाने पर ये पुनः काव्यरचना में प्रवृत्त हुए और उन्हीं के आदेश से इन्होंने इस महाकाव्य की रचना की प्रथम सर्ग के नवम पद्य से यह भी प्रतीत होता है कि नवसाहसाडक की सभा में उस समय अन्य समर्थ कवि भी थे किन्त राजा ने इस महाकाव्य की रचना का दायित्व इन्हीं को दिया। इससे सिन्धुराज की राजसभा में इनके महत्त्व और मुख्यत्व का भी पता चलता है। तत्कालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की समीक्षा करने पर कवि के काव्य-निर्माण की तिथि और जन्म के समय का अनुमान किया जा सकता है। मुंज ने कर्नाटक चालदेश) के राजाओं को परास्त किया था। तैलप द्वितीय ने ईसवी सन् ६६३ से ६६७ के बीच मुंज का वध कर दिया, इसके बाद उसका अनुज सिन्धुराज सिंहासन पर बैठा। ई. सन् १०१० में गुजरात के सोलंकी राजा चामुण्डराय ने इसका भी वध कर दिया। इस हिसाब से बारह, चौदह वर्ष ही सिन्धुराज का शासनकाल रहा। मुंज की मृत्यु के बाद कुष्ट समय तक कवि ने रचना नहीं की होगी। सिन्धुराज ने सिंहासन पर बैठने के बाद, अपने उत्कर्षकाल में ही कवि को महाकाव्य-रचना के लिए प्रेरित किया होगा। इस प्रकार ‘नवसाहसाकचरित’ का रचनाकाल १००५ ई. के आसपास निश्चित होता है। ‘पद्मगुप्त ने जब राज्याश्रय प्राप्त किया होगा उस समय इनकी अवस्था कम से कम २५-३० वर्ष की तो अवश्य ही रही होगी ओर इस महाकाव्य के लिखने तक वे पूर्ण अनुभवी तथा प्रौढवय के प्रतिष्ठित और सम्भवतः सिन्युराज के सभाकवियों में सबसे वयस्क रहे होंगे। इस प्रकार यदि महाकाव्यरचना के इस आनुमानिक समय में से ४० वर्ष घटा दिये जाएं तो कवि का जन्मसमय सन् ६६५ ई. के लगभग निश्चित किया जा सकता है। १. तत्त्वस्पृशस्ते कवयः पुराणाः श्रीभर्तृमेष्ठप्रमुखा जयन्ति। (नवसाहसांकच, १॥ १२. दिवं वियासुर्मम चाचि मुदामदत्त या वाक्पतिराजदेवः । तस्थानुजन्मा कविबान्धवस्य भिनत्ति ता सम्प्रति सिन्धुराजः ।। (वही १८)। ३. नेते कवीन्दाः कति काव्यबन्ये तदेष राज्ञा किमहं नियुक्तः । वाम किं वालुकापर्वतके घरेयमारोप्यते सत्सु कुलाचलेषु।। (वही १E) - प्रायः सभी इतिहास लेखक, कोथ, प. उपाध्याय, वाचस्पति गैरोला, कपिलदेव द्विवेदी आदि इसी तिथि का समर्थन करते हैं। ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य २५३