विश्व में संस्कृत वाङ्मय को प्राचीनतम तथा अनेक दृष्टियों से सम्पन्न स्वीकार करते हुए भी प्रायः पाश्चात्त्य-समीक्षकों का यह स्पष्ट आरोप रहा है कि उसमें ऐतिहासिक-ग्रन्थों का अभाव है। डा. कीथ के अनुसार-संस्कृत साहित्य के सबसे बड़े काल में एक भी ऐसा लेखक नहीं है, जिसको हम वास्तव में एक विवेचक ऐतिहासिक कह सकते हों। और इसके लिए उन्होंने भारतीय मनोभूमि तथा सांस्कृतिक-आध्यात्मिक अवधारणाओं तथा यहां
की राजनैतिक-स्थितियों को दोषी ठहराया है। किसान आपाततः यह कथन सत्य सा प्रतीत होता है कि पाश्चात्त्य मानदण्डों के अनुसार,
सवंत, तिथि आदि के क्रमिक व्यौरे के साथ किसी विशेष जाति, कुल या राजवंशादि का इतिहास कश्मीरी कवि कल्हण की राजतरंगिणी के पहले तक सचमुच उपलब्ध नहीं होता। किन्तु सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर इस मत की आधारहीनता और भ्रमात्मकता ही सिद्ध होती है। क्योंकि स्वयं ‘राजतरङ्गिणीकार’ ने अपनी रचना के पूर्व अनेक ऐतिहासिक-कृतियों का नामोल्लेख किया है, जिसमें, क्षेमेन्द्र की नपावली, हेलाराज की पार्थिवावली तथा पद्ममिहिर और श्री छविल्लाकर की रचनाएँ मुख्य हैं। राजतरङ्गिणी को लिखने के पहले उन्होंने अपने पूर्व विद्वानों द्वारा रचित ग्यारह ग्रन्थों तथा नीलमतपुराण को सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में देखे जाने का उल्लेख किया है। इस प्रकार यह अनुमान करना अनुचित नहीं है कि प्राचीन भारत में इस प्रकार के इतिहास-लेखन का भी अस्तित्व किसी न किसी रूप में अवश्य रहा है।
भारतीय संस्कृति के विषय में केवल निवृत्ति-परायणता का आरोप भी सत्य नहीं है। तत्त्वतः संसार को अस्तित्वहीन, नश्वर या प्रवाहमात्र मानते हुए भी ऐहिक जीवन और
१. कीच-संस्कृतसाहित्य का इतिहास (अनुवादक - मंगलदेव शास्त्री) मोतीलाल, बनारसीदास,
वाराणसी, दितीय संस्करण १६६७, पृष्ट १८OM २. वही -पृष्ट १८१ से १८८ तक ३. कल्हण-राजतरंगिणी प्रथमतरङ्ना १३, १७, १८, १E आदि एवं पद्य (सं. रघुनाथ सिंह) हिन्दी
प्रचारक संस्थान, वाराणसी, प्रथम आवृत्ति १E७० ४. दृग्गोचरं पूर्वसरिग्रन्या राजकथायाः।
मम त्वेकादश गता मतं नीलमुनेरपि ।। (राजतरगिणी 48)
ऐतिहासिक महाकाव्य तथा चरितकाव्य
२४E सामाजिक धारणा से भारतीय साहित्य किसी भी कालखण्ड में पराङ्मुख रहा हो ऐसा समझ में नहीं आता। जहाँ ‘अर्थ’ और ‘काम’ को भी ‘पुरुषार्थ’ के रूप में प्रतिष्ठा दी गई हो, | “न मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किञ्चित्” कहकर मनुष्य की श्रेष्ठता का पदे-पदे गान किया गया हो, वहाँ इतिहासबुद्धि और इतिहास-लेखन का सर्वथा अभाव रहा हो यह असम्भव है। हमारे प्राचीन साहित्य में न केवल ‘इतिहास’ शब्द का उल्लेख हुआ है अपितु उसको सभ्यता और संस्कृति के महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में अनेकत्र स्वीकर किया गया है।’ गया। महाभारत, हमारा जातीय इतिहास है। पुराणों में अनेक प्राचीन राजवंशों तथा ऋषिवंशों का क्रमशः इतिहास प्राप्त होता है। निरुक्तकार यास्क ने ‘इति ऐतिहासिकाः’ कहकर वेद के व्याख्यान के सन्दर्भ में ऐतिहासिकों के स्वतन्त्र दृष्टिकोण का उल्लेख किया
वस्तुतः पाश्चात्त्यों द्वारा भारतीयों को इतिहास-विरहित कहना भारतीय इतिहास-दृष्टि को न समझ पाने की त्रुटि का परिणाम है। सृष्टि अनादि और अनन्त है। ‘चक्रनेमिक्रमेण’ यहां उत्थान-पतन की अनिवार्यता स्वीकत है, ऐसी स्थिति में शाश्वत-सत्यों के सम्प्रेरक जातीय इतिहास के लेखन में संवत्, तिथि आदि का अंकन न तो सम्भव है और न ही उसकी कोई बहुत आवश्यकता ही है। भारतीय इतिहास-दृष्टि सन्देशप्रधान है, वह मानवीय मूल्यों की सतत प्रवर्तमान कथा है और इसीलिए इतिहास यहां एक विद्या’ है महज दस्तावेज नहीं। इस दृष्टि से देखने पर कथित आरोप की एकदेशीयता स्वयं समझ में आ जाती है।
वस्तुतः संस्कृत में ऐतिहासिक काव्य लिखने वाले कवियों ने घटनाओं और वस्तुस्थितियों का यथावत् विवरण प्रस्तुत करना अपना दायित्व नहीं माना। उन्होंने घटनाओं और वस्तुस्थितियों की पुनः सृष्टि की है। इतिहासविद् प्रो. विश्वम्भरसहाय पाठक ने संस्कृत कवियों की इस प्रवृत्ति को ‘इतिहास का दैवीकरण’ कहा है। इतिहास के दैवीकरण या मिथकीकरण के पीछे दो मूल कारण रहे हैं, एक तो राजा में ईश्वर का अंश होने की अवधारणा तथा अतीत के गौरव का वर्तमान में पुनर्जागरण देखने की इच्छा। इस दृष्टि से इतिहास को यथाघटित रूप में चित्रित न करके कवियों ने कतिपय विशिष्ट प्रतीकात्मक अभिप्रायों का प्रयोग करते हुए अपनी दृष्टि से इतिहास की व्याख्या करते हुए उसे प्रस्तुत किया है। ये अभिप्राय हैं - चक्रवर्ती पद की प्राप्ति, स्वयंवर और राज्यश्री द्वारा नायक का वरण। पर इन प्रतीकात्मक अभिप्रायों का आधार वास्तविक घटनाएं रही हैं।
4. (क) छान्दोग्य उपनिषद् - ७१२
“ऋग्वेदं भगवोऽध्यमि…यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चम वेदानां वेदम्…..” (ख) निरुती २३, ततिहासमाचसते। देवापिश्चाटिषणः शन्तनुश्च कौरव्यी भातरौ बभवतुः……" (ग) अर्थशास्त्र २४
अथर्ववेदेतिहासवेदी च वेदाः ।……पुराणामितिवृत्तमाख्यायिकोदाहरण धर्मशास्त्रमर्यशास्त्रं चेतीतिहासः।
ऐतिहासिक महाकाव्य
पाश्चात्त्य परिभाषाओं की संकीर्णता से यदि थोड़ा ऊपर उठकर विचार किया जाय तो संस्कृत भाषा का आदिकाव्य, महर्षि वाल्मीकिकृत ‘रामायण’ भी वस्तुतः ऐतिहासिक महाकाव्य ही है। क्योंकि महाकाव्य के इतिवृत्त और नायक का स्वरूप कितना ही आदर्शोन्मुख और कल्पनाप्रवण क्यों न हो वह सर्वथा यथार्थ की भूमि से असंस्पृष्ट नहीं हो सकता। पौराणिक चरित्र हमारे पुरातन इतिहास के जीते-जागते प्रतिमान ही है। जिनके सन्, संवतुं भले हमने स्मरण न रखें हों किन्तु उनकी मानवता के उदात्तानुदात्त-पक्षों, जय-पराजयों और जीवन-संघर्षों को हमारी कविप्रतिभा ने चिरन्तन और जीवन्त बनाकर प्रत्येक काल और प्रदेश में विविध भंगिमाओं के साथ अनेक बार संजोया है। इसी कारण भारतीय सुदूर-इतिहास के कुछ चरित्र ऐसे आवर्जक और सर्वांगपूर्ण बन गए कि हमारे संस्कृत-कवियों ने बहुत काल तक अपने महाकाव्यों में केवल उन्हीं के विविध चित्र अंकित किए, कदाचित् तत्कालीन सहृदय समाज की भी यही अपेक्षा थी। - बहुत दिनों के बाद इस धारा में परिवर्तन हुए। गुप्तकाल के ऐतिहासिक शिलालेखों’ में शायद पहली बार समकालीन नरेशों की प्रशस्तियों के साथ कतिपय ऐतिहासिक तथ्य काव्यरूप में संकलित किए गए। बौद्ध और जैन लेखकों में भी कुछ-कुछ समकालिकता की ओर प्रवृत्ति बढ़ी और कालान्तर में संस्कृत-महाकवियों ने अपने समकालीन तथा आश्रयदाता नरेशों के ऐतिहासिकवृत्त को कल्पना से अनुरंजित करके महाकाव्य-लेखन आरम्भ कर दिया। जी इनमें से महाकवि कल्हण को छोड़कर प्रायः सभी अपने चरितनायकों से उपकृत, सत्कृत अथवा उन्हीं के आश्रित कवि थे इसलिए सभी ने उन तत्कालीन नरेशों के उदात्त पक्ष का ही अलंकृत वर्णन करना अपना उद्देश्य समझा। क्योंकि उनके काव्य के सम्बोध्य और सहृदय भी कदाचित् वे ही नरेश या उनके प्रशंसक मात्र थे। राजतरंगिणीकार कल्हण ही एक ऐसे कवि थे जो किसी राजा के आश्रय में नहीं रहे। इसलिए राजाओं का इतिवृत्त लिखते हुए भी वे उनकी अतिरंजित पराक्रमशीलता और काल्पनिक दिव्यता के ख्यापन से दूर रहकर विशुद्ध और तटस्थ ऐतिहासिक रचना कर सके। मलाई
१. देखिए - गिरिनार शिलालेख (१५० ई.) नासिक शिलालेख (१४६ ई.), हरिषेण की प्रयागप्रशस्ति
(३५० ई. से पूर्वी, स्कन्दगुप्त का गिरिनार शिलालेख (४५७ ई.) वसभट्टि की मन्दसौर प्रशस्ति
(४७३ ई.) आदि। २. श्री टी. गणपति शास्त्री ने सन १E२५ ई. में आर्यमंजुश्रीकल्प नामक एक बौद्ध ऐतिहासिक ग्रन्थ
का पता लगाया था। इसके लेखक का नाम नहीं मिलता। यह महायान बौद्ध-सम्प्रदाय का ग्रन्थ है, इसमें लगभग ७०० ईसवी पूर्व से लेकर ७७० ई. तक के सम्राटों का इतिहास दिया गया है। (कपिलदेव द्विवेदी - संस्कृत-साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास, पृष्ठ ५६४)।
ऐतिहासिक महानताब तथा चरितकाव्य
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