शृङ्गारवैराग्यतरङ्गिणी के रचयिता सोमप्रभाचार्य श्वेताम्बर जैन थे। इनका देशकाल अज्ञात है। वि.सं. १७८५ में आगरा के पंडित नन्दलाल ने इस काव्य की टीका लिखी थी, अतः इस काव्य का रचनाकाल अठारहवीं शताब्दी या उसके पूर्व हो सकता है। श्री नन्दलाल द्वारा प्रदत्त परिचय के अनुसार सोमप्रभाचार्य शतार्थवृत्तिकार कहे जाते थे। अपनी सुखबोधिका टीका को नन्दलाल ने ‘श्लेषौघदुस्तरतरङ्गिणिका’ बताया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कवि सोमप्रभाचार्य श्लेष के प्रयोग में दक्ष हैं। उनका यह काव्य यद्यपि नाम से श्लेषकाव्य प्रतीत होता है, किन्तु इसमें आयंत निर्वेद का भाव ही प्रधान है। शृङ्गार रस के विभावादि का वर्णन कवि ने पूर्वपक्ष के रूप में ही किया है। शास्त्रकाव्य, सन्यानकाव्य, चित्रकाव्य तथा यमककाव्य यमक, श्लेष और अनुप्रास का स्फुट चमत्कार पूरे काव्य में कुशलता से प्रकट किया गया है, तथापि कथ्य की सुस्पष्टता अव्याहत बनी रही है। उदाहरण के लिये - TRP कामज्वरातुरमते तव सर्वदास्य वामभूवां यदि कदाचिदवाप्तुमिच्छा। म काम यलं विनाप्यखिलजन्यपरम्परासु तज्जातमैव भवतो ननु सर्वदास्यम् ।। (१०) हे काम के ज्वर से आतुर मति वाले, यदि तू हर प्रकार से सर्वदा सुंदरी का आस्य (मुख) ही पाना चाहता है, तो यह तेरे लिये अनायास जन्म-जन्मान्तर के लिये सब प्रकार से दास्य हो गया। जान ठात जायहाँ ‘सर्वदास्य’ में यमक का प्रयोग सटीक है। वस्तुतः निर्वेद और सांसारिक विषयों से जुगुप्सा के भाव का तीव्र बोध देने के लिये कवि ने यमक और श्लेष को बाधक के स्थान पर साधक बना लिया है, यही इस काव्य की विशेषता है। इसके साथ ही इस कृच्छसाध्य अलंकारयोजना के कारण काव्य में लालित्य और प्रासादिकता का अपकर्ष नहीं हुआ है। कवि ने अपने लक्ष्य को स्पष्टतया कथ्य में बनाये रखा है - भवारण्यं मुक्त्वा यदि जिगमिषुर्मुक्तिनगरी कार तदानीं मा कार्षीविषयविषवृक्षेषु वसतिम्। यात समाधार यतश्छायाप्येषां प्रथयति महामोहमचिरा दयं जन्तुर्यस्मात् पदमपि न गन्तुं भवति ।। (४५) की
अन्य चित्रकाव्य
नीतिवर्मा का ‘कीचकवध’ चित्रकाव्य के उदाहरणों में सर्वप्रथम उल्लेख्य है। कृष्णमाचारियर के अनुसार नीतिवर्मा का समय नवम शती के आसपास है।’ भोज ने अपने शृङ्गारप्रकाश, नमिसाधु ने रुद्रक के काव्यालङ्कार की टीका तथा प्रेमचन्द्र ने काव्यादर्श की टीका में इसका उल्लेख किया है। इस काव्य का आधार महाभारत का विराट् पर्व है तथा द्रौपदी का कीचक के द्वारा अपमान और भीम द्वारा उसके वध की कथा पाँच सर्गों में कवि ने प्रस्तुत की है। आद्यन्त श्लेष तथा यमक की योजना के कारण कथा का प्रवाह और नैरन्तर्य यहाँ खण्डित है, कवि ने अपनी सुविधा तथा चित्रकाव्य-योजना के अनुकूल घटनाक्रम तथा प्रसंग उठाये हैं। इस काव्य पर जनार्दन दास तथा सर्वानन्द नाग की प्राचीन टीकाएँ मिलती हैं।’ नलोदय नामक काव्य में चार सर्गों में यमक के आद्यन्त विन्यास के साथ नल-दमयन्ती की कथा प्रस्तुत की गयी है। अन्त्यानुप्रास तथा छन्दोवैविध्य और लयात्मकता के कारण यह १.न.- हिस्ट्री आफ क्लासिकल संस्कृत लिटरेचर : एम. कृष्णमाचारियर पृ. ३७० २. वहीं, पृ. ३७०-७१ ३. वही, पृ. ३७०। शामिलान वा कपाशापनात बापाकः सिकार २४६ काव्य-खण्ड काव्य बड़ा आकर्षक बन पड़ा है। इसके रचयिता कहीं-कहीं कालिदास कहे गये हैं, पर रामर्षि ने अपनी नलोदय-व्याख्या में इसका कर्ता रविदेव को बताया है, जबकि टीकाकार विष्णु ने रवि के पुत्र वासुदेव को इसका रचयिता माना है। कुछ विद्वान् त्रिपुरदहनकार वासुदेव को ही इस काव्य का कर्ता बताते हैं, जिनका समय नवम शती है। यमक का निर्वाह कवि ने बड़े कौशल से प्रत्येक पद्य के प्रायः चारों पादों में किया है। यथा - अद्य निजराज्यन्तेन प्राशासि नलेन शत्रुराज्यन्तेन । येनाराज्यन्तेन श्रिया दिशो यस्य विहतिराज्यन्तेन ।। (१११०) २ PHश्रीवत्साक ने बारहवीं शती में ‘यमकरत्नाकर’ नामक काव्य लिखा। यह काव्य आर्या छन्द में निबद्ध है। इसमें श्रीकृष्ण के प्रति भक्तिभाव व्यक्त किया गया है। इसी प्रकार धर्मघोष की यमकस्तुति में प्रत्येक पद्य के चार-चार अर्थ हैं। धर्मघोष संन्यासी थे तथा इनका निर्वाण संवत् १३५७ (१३०० ई.) में हुआ। नलोदय की ही भाँति राक्षसकाव्य भी परम्परा में प्रसिद्ध रहा है तथा इसके रचयिता वररुचि कहे गये हैं। राक्षसकाव्य में केवल बीस पद्य हैं तथा इसका विषय शृङ्गार है। इस पर प्रेमधर, शम्भु भास्कर, कविराज, कृष्णचन्द्र, उदयाकर मिश्र, बालकृष्ण पायगुण्डा आदि की टीकाएँ मिलती है। चित्रकाव्यरचना का एक अच्छा उदाहरण धर्मदास का ‘विदग्धमुखमण्डन’ है। इसमें चार परिच्छेदों में, चित्रकाव्यों के, प्रहेलिका के उदाहरण स्वरूप स्वोपज्ञ श्लोक धर्मदास ने संकलित किये हैं। मंगल श्लोक से प्रतीत होता है कि धर्मदास बौद्ध थे। इस कोशकाव्य से पंडित समाज या गोष्ठियों में कोई व्यक्ति समादृत हो सकेगा- ऐसा उनका विश्वास है । यद्यस्ति सभामध्ये स्थातुं वक्तुं मनस्तदा सुधियः।। ताम्बूलमिव गृहीत्वा विदग्धमुखमण्डनं विशत। (औद्देशिक प्रकरण-८) प्रहेलिकाओं की रचना में धर्मदास ने असाधारण नैपुण्य का परिचय दिया है। प्रहेलिका को उन्होंने जाति के नाम से समझाते हुए उसके अनेक प्रकार इस ग्रन्थ में चारों परिच्छेदों में उदाहृत किये हैं। व्यस्तसमस्तजाति का उदाहरण देखिये - _ का प्रियेण रहिता वराङ्गना धाम्नि केन तनयेन नन्दिता। कीदृशेन पुरुषेण पक्षिणां बन्धनं समभिलष्यते सदा।। अपने प्रिय से वियुक्त किस सुन्दरी को उसके पुत्र ने आनन्दित किया था तथा किस पुरुष के द्वारा पक्षिणों का बन्धन सदैव अभिलषित होता है - इन दो प्रश्नों का उत्तर यहाँ एक है - ‘शकुन्तलाभरतेन’ । शकुन्तला भरतेन इस प्रकार पदों को तोड़ कर पढ़ने से भरत १. द्र.-हिस्ट्री आफ क्लासिकल संस्कृत लिटरेचर, पृ. ३७१-३७२ २. वहीं पृष्ठ-३७२ ३. हिस्ट्री आफ क्लासिकल संस्कृत लिटरेचर : एम. कृष्णमाचारियर पृ. ३७१ शास्त्रकाव्य, सन्धानकाव्य, चित्रकाव्य तथा यमककाव्य २४७ के द्वारा शकुन्तला आनन्दित की गयी यह उत्तर तथा शकुन्तलाभ-रतेन- शुकन्त या पक्षियों के लाभ में निरत रहने वाले बहेलिये के द्वारा-ऐसा समस्त रूप से पाठ करने पर दूसरे प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। यमक-काव्यों में मानाङ्क कवि का वृन्दावनयमक काव्य भी उल्लेखनीय है। कवि ने इस काव्य में श्रीकृष्ण के प्रति भक्तिभावना निवेदित की है। इस काव्य में ५१ पद्य हैं। यमक के विन्यास में कवि का कौशल सराहनीय है, यद्यपि सारे काव्य में इसके कारण दुरूहता तथा क्लिष्टता व्याप्त है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है शब्दो नादेयानां कलुषतया नो शशाम नादेयानाम् । फेनो वा नीराणां आकृष्टोभयतटान्तवानीराणाम् ।। (२४) जो अदेय नहीं है ऐसे भिक्षुकों का तथा नादेय या नालों का शब्द वर्षा में थमा नहीं, उसी प्रकार नीर या जल का फेन भी नहीं रुका दोनों तटों पर वानीर या बाँस के वृक्षों को आकृष्ट करने वाले। मानाक ने गीतगोविन्द पर टीका लिखी थी, जिसमें उन्होंने अपने आप को राजा बताया है। रायमुकुट ने अमरकोश की अपनी टीका में मानाङ्क को उद्धृत किया है। अतएव मानाक का समय वि.सं. १४८८ (१४३१ ई.) के पूर्व माना जा सकता है। इन्होंने वृन्दावनकाव्य के अतिरिक्त मेघदूताभ्युदय नामक यमककाव्य भी लिखा था। सुप्रसिद्ध आचार्य तथा कवि वेड्कटाध्वरि के वंश में उत्पन्न वेङ्कटेश ने रामकथा को विषय बना कर रामायणयमकार्णव की रचना सोलहवीं शती में की थी। इसी प्रकार गोपालार्य ने अठारहवीं शती में रामचन्द्रोदय नामक यमककाव्य की रचना की। धर्मदास के उपरिचर्चित विदग्धमुखमण्डन की परम्परा में अठारहवीं शती के सुप्रसिद्ध - संस्कृत साहित्यकार पर्वतीय विश्वेश्वर पाण्डेय ने कवीन्द्रकर्णाभरण की रचना की। इस पर पाण्डेय जी की स्वोपज्ञ टीका भी है। कवीन्द्रकर्णाभरण में भी चार परिच्छेद हैं तथा प्रहेलिका और जाति के नाना प्रकार उदाहृत हैं। इनमें से हृद्यगूढजाति में व्यंग्य अर्थ निहित रहने से रचना का सौष्ठव-विशेष अनुभव होता है। पाण्डेय जी ने इस जातिभेद के चार उदाहरण दिये हैं, जिसमें से एक देखिये गुरुसदसि सरसिजनजमभिमृशति करेण दयिततमे। तक सिन्दूरबिन्दुदिन्दरमलिकतलं पाणिना वधूः पिदथे।। (४।२) प्रियतम के द्वारा गुरुजनों की सभा में ही हाथ से कमल की माला का स्पर्श करने पर वधू ने अपने ललाट पर लगी सिन्दूर की बिन्दी को हथेली से मूंद लिया। यहाँ कमल के स्पर्श से नायिका के वक्ष के आलिंगन आदि की कामना तथा सिन्दूर की बिन्दी को ढाँपने से सूर्यास्त के समय आने का संकेत व्यंग्य है। इस प्रकार संस्कृत वाङ्मय में यमककाव्य का अपना महत्त्व है।