१६ यमककाव्य

वासुदेव के यमककाव्य

कवि वासुदेव केरल के राजा रामवर्मा कुलशेखर के आश्रय में रहे थे, जिनका शासनकाल ८८५ ई. से ६१३ ई. तक है। अतएव वाससुदेव का समय ईसा के नवम और दशम शतकों का सन्धिकाल माना जा सकता है। वासुदेव केरल के प्रतिष्ठित नम्बूतिरि ब्राह्मण परिवार में हुए। इनका निवासस्थान त्रिचूर के निकट पेरुमनम् ग्राम था। माना वासुदेव अपनी यमक-रचनाओं के लिये प्रख्यात हैं। नलोदय काव्य इनकी ही कृति कही गयी है। इसके अतिरिक्त युधिष्ठिरविजय महाकाव्य, तीन सर्गों का त्रिपुरदहन काव्य तथा शौरिकथोदय काव्य भी इन्होंने रचे थे। युधिष्ठिरविजय में आठ सर्ग तथा ७१E पद्य हैं और महाभारत की कथा प्रस्तुत की गयी है। कथा की यह प्रस्तुति संक्षिप्त और रोचक है। द्वितीय सर्ग में सुभद्राहरण के प्रसंग १. विवरण के लिये इ.- संस्कृत काव्य के विकास में जैन कवियों का योगदान : डा. नेमिचन्द्र शास्त्री, पृ. ४०-४३। २.. वही, पृष्ठ- ४१ olitina Tiularine ३. वही, पृष्ठ-४५-४२ (lotIH शास्त्रकाव्य, सन्धानकाव्य, चित्रकाव्य तथा यमककाव्य में वनविहार, ऋतुओं, सन्ध्या तथा चन्द्रोदय का मनोहारी वर्णन किया गया है। वासुदेव की शैली की विशेषता यह है कि पूरे काव्य में निरन्तर यमक का सधा हुआ प्रयोग उन्होंने किया है, फिर भी भाषा में दुरूहता तथा अर्थबोध की क्लिष्टता नहीं आने दी है। यमक के कारण उनकी कथाप्रस्तुति में लय और संगीतात्मकता का आकर्षण जुड़ गया है। उदाहरण के लिये कृष्ण द्वारा दूत बन कर दुर्योधन के प्रति पाण्डवों को पाँच ग्राम देने का प्रस्ताव - अपि विरसं ग्रामाणां पञ्चकमथवा शमाय सङ्ग्रामाणाम्। तेभ्यः पौरव देहि प्रीतिं प्रीतेषु तेषु पौरव देहि।। शौरिकथोदय में छः सर्ग हैं। यह श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में वर्णित श्रीकृष्णचरित पर आधारित है। यमकसन्निवेश के साथ कथा की काव्यात्मक प्रस्तुति में वासुदेव सफल हुए हैं। कृष्ण की बाललीलाओं का चित्रण कवि ने तन्मय होकर किया है तथा अपने भक्तिभाव को भी अभिव्यक्ति दी है। सुपाठ्यता वासुदेव के काव्य की विशेषता है। उदाहरण के लिये - अपि मुहुरम्बालाल्यां विभ्राणः शैशवं घुरं बालाल्याम्। हस्वाङ्गो पीनांसाः सत्रपि हृदयं जहार गोपीनां सः।।