१५ अन्य सन्थानकाव्य

अन्य सन्धान-काव्यों में ‘नामेयनेमिद्विसन्धान’ नामक जैन परम्परा के काव्य का हस्तलिखित रूप में विद्यमान होने का विवरण मिलता है। इस काव्य का रचनाकाल संवत् History of Classical Sanskrit Literature Sarme काव्य-खण्ड २४० १०४० (१०२३ ई.) है। इसके रचयिता सुराचार्य हैं। इसमें तीर्थंकर ऋषभदेव तथा नेमिनाथ का चरित्र एक साथ वर्णित है। इसी नाम से एक काव्य बृहद्गच्छीय हेमचन्द्रसूरि ने भी लिखा था-ऐसा उल्लेख मिलता है। इस काव्य का संशोधन कवि चक्रवर्ती श्रीपाल ने किया। इस काव्य की हस्तलिखित प्रतियाँ बड़ौदा तथा पाटन के ग्रन्थागारों में हैं। इसी प्रकार मनोहर तथा शोभन नामक कवियों ने चतुस्सन्धान नाम से अलग-अलग काव्य लिखे तथा जगन्नाथ कवि के द्वारा सप्तसन्धान तथा चतुर्विंशतिसन्धान तक लिखे जाने का उल्लेख मिलता है। चतुर्विंशतिसन्धान नामक काव्य के प्राप्त होने की सूचना श्रीनाथूराम प्रेमी ने दी है। इस काव्य में प्रत्येक श्लोक के चौबीस-चौबीस अर्थ हैं। यह काव्य वि.सं. १६६६ (१६४२ ई.) में लिखा गया है। सह इन सन्धान-महाकाव्यों के अतिरिक्त जैन परम्परा में सन्धानस्तोत्र भी रचे गये, जिनमें निम्नलिखित उल्लेखार्ह हैं- नवखण्डपार्श्वस्तव (ज्ञानसागरसूरि), विविधार्थमय सर्वज्ञस्तोत्र (सोमसागरसूरि)। नवग्रहगर्भितपार्श्वस्तव तथा पार्श्वस्तव (रलशेखरसूरि), पञ्चतीर्थीस्तुति (मेघविजय), व्यर्थकर्णपार्श्वस्तव (समयसमुन्दर) आदि। सन्धानपरम्परा का आश्चर्यजनक उदाहरण अष्टलक्षी मिलता है। अकबर के सम्मुख इस ग्रन्थ को आचार्य समयसुन्दर ने प्रस्तुत किया था, इसमें ‘राजानो ददते सांख्यम्’-मात्र इस बाक्य के दस लाख बाईस हजार चार सौ सात अर्थ किये गये हैं। इसी प्रकार लाभविजय का एक प्रबन्ध मिलता है, जिसमें एक ही पद्य के पाँच सौ अर्थ किये गये हैं।