१४ यादवराघवीयम् (वेंकटाध्वरी)

सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में कविवर वेंकटाध्वरी ने स्वीय काव्य ‘यादवराघवीयम्’ में रामायण एवं भागवत की कथा को एक साथ वर्णित किया है। ये बैंकटाध्वरी विश्वगुणादर्शचम्पू के रचयिता वेंकटावरि से अभिन्न हैं। । प्रस्तुत काव्य का कलेवर ३०० श्लोकों का है। इस काव्य की भाषा अतीव कठिन एवं प्रवाहरहित है। इसमें दो कथाओं की उपस्थापना के लिए श्लेष का सहयोग नहीं लिया गया है। इस काव्य की विशेषता यह है कि इस काव्य को सामान्य क्रम से यदि पढ़ा जाय तो रामकथा एवं विपरीत क्रम से पढ़ने पर श्रीकृष्णचरित प्राप्त होता है। अतएव इस कात्य को श्लेषकाव्य न कहकर विलोमकाव्य ही कहना उचित है। काव्य की कठिनता का आभास स्वयं लेखक को भी था सम्भवतः इसी कारण उसने इसे बोधगम्य बनाने के लिए एक टीका भी लिखी है।