१३ श्रीहरदत्तसूरिविरचितराघवनैषधीयम्

कवि-परिचय : ‘राघवनैषधीयम्’ के रचयिता कवि श्रीहरदत्तसूरि के जीवनवृत्तान्त के विषय में काव्य के अन्तिम दो त्रुटित श्लोकों से जो कुछ संकेत प्राप्त होते हैं, तदनुसार हरदत्तसूरि गर्ग गोत्रीय थे। इनके पिता का नाम जयशंकर था। ये ज्योतिषशास्त्रज्ञ, नीतिशास्त्रविशारद एवं धर्मोपदेशनिपुण कविश्रेष्ठ थे। श्री हरदत्तसूरि इन्हीं जयशंकर के पुत्र थे। हरदत्तसूरि व्याकरणमहाभाष्य एवं छन्दः शास्त्र के अधीती विद्वान एवं कविवर थे । गर्गर्षिवंशतिलको जयशंकराख्यो यसमा भाग लिन । ज्योतिर्विदां प्रणयकृत्सुकवीन्द्रमान्यः पन्ना आध्यात्मिकावगतिशान्तिपरायणोऽभूदू धर्मोपदेशनपटुर्जयबोध आसीत् ।। तत्सूनुर्हरदत्त इत्यमलधीः श्रीमत्फणींद्रोदिते भाष्ये पाटवतः प्रथामधिगतश्छन्दश्चितीनां बुधः। ना साहित्यार्णवमन्थनैक को कालनिर्णय : कवि हरदत्तसूरि के स्थितिकाल का निर्धारण करने के लिए यद्यपि कोई निश्चित प्रमाण-पलब्ध नहीं है, तथापि इनकी रचना पर कविराज विरचित ‘राघवपाण्डवीयम्’ के प्रभाव को परिलक्षित कर यह कहा जा सकता है कि इनका स्थितिकाल कविराज के अनन्तर होना चाहिए। ऐतिहासिकों के अनुसार कविराज जयन्तीपुर के शासक कादम्बवंशज राजा कामदेव के आश्रित थे। राजा कामदेव का समय ११८२ से ११८७ ई. निर्धारित है। अतः कवि हरदत्तसूरि का समय तेरहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के आसपास निर्धारित किया जा सकता है। कुछ विद्वानों ने प्रस्तुत काव्य का रचनाकाल अठारहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस काव्य की ‘काश्मीरनरेश-ग्रन्थालय’ से उपलब्ध एकमात्र हस्तप्रति में उल्लिखित “आकाशाम्नायाद्रिचन्द्रे (१७४०) शके कृष्णत्रयोदशीयुते भौमर्कनक्षत्रे ह्यलिखत्मवल्लभः" इस वचन के आधार पर उन विद्वानों ने ऐसा निर्णय किया होगा। वस्तुस्थिति तो यह है कि उक्त वचन से प्राप्त समय तो पुस्तकलेखन का है न कि काव्यरचना का। राधवनैषधीयम् : कवि हरदत्तसूरि की एकमात्र रचना ‘राघवनैषधीयम्’ काव्य है। इस काव्य में कवि ने दशरथनन्दन श्रीराम एवं निषधाधिपति राजा नल के जीवनवृत्तान्त को एक साथ वर्ण्य-विषय के रूप में स्वीकृत किया है। प्रस्तुत काव्य दो सर्गों में विभक्त है। प्रथम सर्ग में १२४ श्लोक एवं द्वितीय सर्ग में कुल २२ श्लोक हैं। इनमें से प्रथम सर्ग के अन्तिम दो श्लोक तथा द्वितीय सर्ग के अन्तिम श्लोक के दो चरण त्रुटित हैं। प्रथम सर्ग में कवि ने श्रीराम के जन्म से लेकर सीता के पातालगमनपर्यन्त एवं नल के जन्म से लेकर दमयन्ती द्वारा नल की पुनः प्राप्तिपर्यन्त कथा श्लेषमयी कविता द्वारा युगपत् वर्णित की है। द्वितीय सर्ग में कवि ने एकार्थक कविता का प्रयोग कर प्रथम सर्ग की जटिलता से पाठकों को मुक्ति प्रदान की है। इस सर्ग में प्रधानतया ऋतुवर्णन ही किया गया है। इस सर्ग के अन्तिम दो श्लोकों में कविपरिचय प्राप्त होता है। भाषा : ‘राघवनैषधीयम्’ की भाषा विशेषतया प्रथम सर्ग में अत्यन्त क्लिष्ट है। यतः कवि ने दो नितान्त भिन्न कथानकों को एक साथ कविता का वर्ण्य विषय बनाया है। अतः उसमें शब्दों की खींचतान ही प्रधानता को पा सकी है। दूसरी ओर १२४ श्लोकों में विशाल कथानक को समाविष्ट करने का प्रयास तथा दोनों कथानकों में साम्यान्वेषण का प्रयत्न शास्त्रकाव्य, सन्धानकाव्य, चित्रकाव्य तथा यमककाव्य २३७ केवल उन्हीं कथांशों की सूचना मात्र दिला पाया है, जिनमें कथं कथमपि समानता आविष्कृत की जा सकी है। यतः राम एवं नल के चरित्र में साम्य सहज सुलभ नहीं है। अतएव इस प्रयत्न में कवि को अत्यन्त प्रयास करना पड़ा है। उदाहरणार्थ हम निम्नलिखित श्लोक को ले सकते हैं, इसमें यज्ञ की समाप्ति के अनन्तर महर्षि विश्वामित्र राजा जनक से कहते हैं कि यदि मेरे कथन से तुम राम को शिव-धनु दिखाओगे तो निःसन्देह तुम्हें हर्ष की प्राप्ति होगी- का विना बभाषे कहकं सवान्ते श राणPPEEFFER तपस्विना भोणिपतिर्विनीतः।लात्कायमा कोदण्डमग्रं परिदर्शयंस्त्वं रामाय तोषं खलु लप्स्यसे मे।। (१।१२) यहाँ राम के पक्ष में ‘सवान्ते’ (सवस्य यज्ञस्य अन्ते) का अर्थ यज्ञ की समाप्ति के अनन्तर है वहीं नलपक्ष में ‘सवान्ते’ को ‘षु’ अभिषवे धातु से निर्मित कर तथा अभिषव का अर्थ पीडन लेकर ‘हंस के मुक्त होने के अनन्तर’ - यह अर्थ किया गया है, इसी प्रकार इस श्लोक में प्रयुक्त विना’ ‘रामाय’ आदि शब्दों से भी सप्रयास दो अर्थ निकालने पड़ते हैं। अलंकार-प्रयोग:दो विभिन्न वर्णनों को युगपत् प्रस्तुत करने के लिए दत्तावधान कवि हरदत्तसूरि की इस रचना में कवि का सम्पूर्ण ध्यान “श्लेष’ के प्रयोग में ही यद्यपि व्यापृत है, तथापि रचना में कहीं-कहीं स्वाभाविकरूपेण अर्थालंकारों का समुदय अत्यन्त ही हृदयावर्जक है। राम एवं नल को देख उनकी सुन्दरता से आश्चर्यान्वित जनों द्वारा उनके विषय में किये जा रहे वितर्क में ‘सन्देह’ अलंकार की छटा नितान्त रमणीय है। कार “कामोऽयं कथमगी वृत्रध्नोऽयं कथं द्विनेत्र इति। गरम ब्रघ्नोऽयं न हि तीक्ष्णस्तदित्यमूहा व्यकल्पन्त।। (१।११५) का इसी प्रकार यत्र तत्र उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलङ्कारों की भी मनोरम छटा परिलक्षित होती है। भगवान व छन्दः प्रयोग : कवि हरदत्तसूरि ने काव्य के प्रथम सर्ग में यद्यपि प्रधानतया उपगीति एवं उपजाति छन्द का ही प्रयोग किया है, परन्तु स्थान-स्थान पर मालिनी-११, भुजंगप्रयात ११३७, १।३८, आर्या ११६१ १६६, १/१०२, ११११,१११६ आदि छन्द भी प्रयुक्त हैं। द्वितीय सर्ग में कवि ने पृथ्वी, प्रमाणिका, प्रहर्षिणी, शार्दूलविक्रीडित, वसन्ततिलका, स्रग्धरा आदि प्रायः समस्त महत्त्वपूर्ण छन्दों का प्रयोग किया है। मामी की कामना

  • इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि कविवर श्री हरदत्तसूरिविरचित काव्य ‘राघवनैषधीयम्’ उस परम्परा का प्रमुख काव्य है, जो परम्परा काव्य में चमत्कारप्रदर्शन को २३८ ही प्रधान मानती रही है। स्वयं हरदत्तसूरि ने अपने काव्य की ‘स्वोपज्ञटीका’ में निम्न शब्दों से इसी तथ्य को अंगीकृत किया है - संस्कृतभाषारूपोऽर्थान्तरश्लेषसंघटितो दुर्घटः काव्यान्तरैः स्वप्नेऽपि व्यधायिक प्रबन्धोऽयम्। (१७ - व्याख्या) पद्यकाव्यप्रणयन में कालिदासादि महाकवियों द्वारा संप्राप्त उच्चता एवं गद्यकाव्य प्रणयन में सुबन्धु एवं बाणभट्ट द्वारा संस्पृष्ट प्रकर्ष को पार न कर पाने की विवशता एवं स्वीय वैदुष्य-प्रदर्शन की अदम्य लालसा ने कवियों को इस प्रकार के श्लेषमय सन्धान-काव्यों के प्रणयन के लिए उन्मुख किया है। इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है। परन्तु कवि हरदत्तसूरि अपनी इस रचना द्वारा अपने पाण्डित्य की अभिव्यक्ति करने में तो यथाकथंचित सफल हो सके हैं, परन्तु अपने कवित्वकौशल की अभिव्यक्ति करने में वे कथमपि सफल नहीं हो सके हैं। हाँ, काव्य के द्वितीय सर्ग में-जहाँ ऋतुवर्णन करते समय कवि ने एकार्थक कविता का प्रयोग किया है- वहाँ उनके काव्यकौशल से सहृदय निःसन्देह आनन्दानुभव कर सकते हैं। उदाहरणार्थ हम निम्न श्लोक देख सकते हैं - दर्श दर्शितदैन्य एव कतिचित्काश्चित्कलाः प्रापता न्मत्तो मत्त इवायमिन्दुरधिकं जाड्याश्रयो हैमनः। मत्तेजस्तपसि व्यतीतशरदं मत्वेति नूनं रवि ग्रीष्मे भीष्मकरैर्विशोषयति किं क्रोधाज्जगद्व्यायतः।। को इस ग्रीष्मवर्णन में कवि द्वारा वर्णित भाव एवं उत्पेक्षालंकार उनके कविकर्मनैपुण्य को स्पष्ट अभिव्यक्त करते हैं। कार राघव-पाण्डव-यादवीयम् (चिदम्बरसुमति)-सन्धानकाव्य-प्रणयन-पाटव की पराकाष्ठा का दर्शन हमें कवि चिदम्बर के काव्य ‘राघव-पाण्डव-यादवीयम्’ में होता है। कवि ने रामायण-महाभारत एवं भागवत की कथाएँ इस काव्य में एक साथ समुपस्थापित की है। कवि चिदम्बर के पिता का नाम अनन्तनारायण एवं माता का नाम वेंकटा था। कौशिक गोत्रीय सर्यनारायण इसके पितामह थे। कवि चिदम्बर विजयानगर के शासक राजा वेंकट (जिनका समय १५८६ से १६१४ ई. माना गया है) के आश्रित थे। इस काव्य पर कवि के पिता अनन्तनारायण ने एक टीका भी लिखी है। इस टीका के सहयोग से काव्य के तीनों अर्थ स्पष्ट हो जाते हैं। कवि चिदम्बर सुमति ने एक चम्पूकाव्य ‘पञ्चकल्याणचम्पू’ भी लिखा है। इस चम्पू में राम, कृष्ण, विष्णु, शिव एवं सुब्रह्मण्य, पाँचों के विवाह की कथा एक साथ निबद्ध है। कवि चिदम्बर ने इस चम्पू पर एक स्वोपज्ञटीका भी लिखी है। इस टीका का नाम ‘शब्दशाणोपल’ है। यह चम्पू दो स्तबकों में विभक्त है। हम
  1. 104 - History of classical Sanskrit literature by M. Krishnamachariar २३६ शास्त्रकाव्य, सन्धानकाव्य, चित्रकाव्य तथा यमककाव्य मैसूर के उदयेन्द्रपरवास्तव्य कवि ‘अनन्ताचार्य ने भी “यादव-राघव-पाण्डवीयम्’ नामक एक काव्य लिखा है इसका संकेत एम. कृष्णमाचारियर के इतिहास-ग्रन्थ में प्राप्त होता है। इसी प्रकार ‘अबोधाकर’ नामक काव्य कवि घनश्याम-विरचित है। इसमें श्री कृष्ण, नल एवं हरिश्चन्द्र की कथा युगपत् वर्णित की गई है। इस काव्य पर कवि द्वारा एक टीका भी लिखी गई है। तंजावुर नरेश रघुनाथ के सभाकवि राजचूडामणि दीक्षित द्वारा राम, कृष्ण एवं पाण्डवकथा एक ही काव्य ‘राघव-यादव-पाण्डवीयम्’ में उपस्थापित की गई 22 इन सन्धान-काव्यों के अतिरिक्त भी अनेक सन्धान-काव्यों की चर्चा इतिहास-ग्रन्थों में प्राप्त होती है। सोमेश्वर कवि, रघुनाथाचार्य, श्रीनिवासाचार्य एवं वासुदेव कवि ने विभिन्न समयों में एक समान नाम वाले ‘राघव-यादवीयम्’ नामक काव्यों की रचना की ऐसा संकेत श्रीवरदाचार्य के इतिहास के अवलोकन से ज्ञात होता है। इसके अतिरिक्त भी एक अज्ञातनामा कवि की रचना ‘राघवयादवीयम्’ जिसमें ६४ छन्द हैं प्राप्त है, इण्डिया आफिस ग्रन्थालय लन्दन में यह पुस्तक ७१३३ संख्या से उपलब्ध है। समस्त इसी प्रकार मद्रास राज्य-ग्रन्थालय में हस्तलिखित काव्य ‘यादवराघवीयम्’ उपलब्ध है, इसकी संख्या डी. ११८६१ है।