- ‘पार्वतीरुक्मिणीयम्" काव्य के रचयिता कवि विद्यामाधव चालुक्यवंशी राजा सोमदेव के सभापण्डित थे। ऐतिहासिकों ने सोमदेव का समय ११२६ से ११३८ ई. स्वीकार किया है। कवि विद्यामाधव गुणवती के निकटस्थ नीलालय के निवासी थे। कवि विद्यामाधव ने प्रस्तुत काव्य के अतिरिक्त ‘किरातार्जुनीयम्’ आदि अनेक काव्यग्रन्थों पर टीकाएँ लिखी हैं। ये वेद वेदांग के प्रकाण्ड विद्वान थे। ‘पार्वतीरुक्मिणीयम्’ काव्य : सर्गों में विभक्त है। इसमें श्लेष की सहायता से पार्वती एवं रुक्मिणी के परिणय की कथा एक साथ वर्णित है। कवि की काव्यशैली अतीव मनोहर २३५ शास्त्रकाव्य, सन्धानकाव्य, चित्रकाव्य तथा यमककाव्य है। उसकी प्रांजल भाषा एवं मनोरम काव्यशैली का निदर्शन निम्न श्लोक से हो जाता है नाम्ना कृतोमेशसमानधाम्ना तीन अष्टा सा रुक्मिणी रत्नकृतीर्द्विजेभ्यः । प्रयच्छता नामगुणस्य वेत्रा। वा पित्रा स्वमित्राभिवृतेन तेन ।। मद्रासस्थित ओरिएण्टल ग्रन्थालय में इस काव्य की हस्तलिखित प्रति उपलब्ध है। रामपालचरित-कवि सन्ध्याकरनन्दी ने बारहवीं शती के उत्तरार्ध में ‘रामपालचरित’ नामक द्विसन्धानकाव्य का प्रणयन किया है। पिता का नाम ‘प्रजापतिनन्दी" था। ये राजा रामपाल के मन्त्री थे। कवि सन्धाकरनन्दी ने, जो राजा रामपाल के पुत्र मदनपाल के समसामयिक थे-अपने पिता से राजा रामपाल का चरित्र प्राप्त कर उसी कथानक को अपने काव्य का मुख्य विषय बनाया। कवि ने श्लेष की सहायता से राजा रामपाल के वृत्तान्त के साथ-साथ दशरथनन्दन श्रीराम की कथा भी युगपत् समुपस्थापित की है। काव्य के अन्त में कवि-प्रशस्ति में जो विवरण दिया गया है तदनुसार कवि का निवास स्थान ‘पुण्ड्रवर्धन’ के निकट ‘बृहद्बट’ था। इसके पितामह का नाम पिनाकनन्दी था। कवि के पिता काव्य के नायक राजा रामपाल (१०७७-११२० ई.) के मन्त्री (सन्धिविग्रहक) थे। मदनपाल ने ११६० ई. तक शासन किया था अतः कवि का समय बारहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जा सकता है। रामपालचरित चार परिच्छेदों में विभक्त है। इसमें २२० आर्याछन्द हैं। कवि ने राजा रामपाल का साम्य श्रीराम से तथा उनके पुत्र कुमारपाल, मदनपाल एवं पौत्र गोपाल का साम्य भरत शत्रुघ्न एवं कुश से किया है। काव्य श्लेषप्रधान होने के कारण अत्यन्त क्लिष्ट है परन्तु कवि ने उसे रसस्रवन्ती रचना बताया है। कथानक के अप्रसिद्ध होने के कारण भी काव्य की क्लिष्टता बढ़ गयी