देशकाल अज्ञात कवि वासुदेव विरचित ‘वासुदेवविजयम्’ काव्य की शेषपूर्ति करने के उद्देश्य से कवि एवं वैयाकरण ‘नारायण भट्ट’ ने ‘धातुकाव्य’ नामक काव्य की रचना की। कवि नारायण भट्ट के विषय में यद्यपि कोई प्रामाणिक सूचना प्राप्त नहीं होती है, तथापि उनकी रचना ‘धातुकाव्य’ के विषय में काव्य का प्रथम श्लोक ही पर्याप्त सूचना प्रदान कर देता है - “उदाहृतं पाणिनिसूत्रमण्डलं प्राग्वासुदेवेन तदूर्ध्वतोऽपरः उदाहरत्यद्य वृकोदरोदितान्धातून्क्रमेणैव हि माधवाश्रयात्।। श्लोक के पर्यालोचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि भीमसेन द्वारा पठित धातुओं के उदाहरण उसी क्रम में माधवीय धातुवृत्ति के आधार पर इस काव्य में उपस्थापित किये जायेंगे। धातुकाव्य में मुख्य लक्ष्य तो समस्त धातुओं का उसी क्रम में उदाहरण उपस्थापित करना है, परन्तु इसके लिए कवि ने कथा को वहाँ से आगे ग्रहण किया है जहाँ से कवि वासुदेव ने छोड़ दिया था। इस काव्य में इस कथा को कंसवधपर्यन्त पहुँचा कर पूर्णता प्रदान की है। 4 धातुकाव्य भी वासुदेवविजय के समान ३ सर्गों में विभक्त है। धातुओं के उदाहरणों के उपस्थापन के कारण भाषा अत्यन्त क्लिष्ट हो गई है। इसी कारण धातुकाव्य में काव्यगत लालित्य का सर्वथा अभाव परिलक्षित होता है - स गान्दिनीभूरथ गोकुलैधितं स्पर्धालुधीगाधितकार्यबाधिनम् । व्रक्ष्यन्हरिं नाधितलोकनाथकं देथे मुधास्कुन्दितमन्तरिन्द्रियम् ।। २२६ काव्य-खण्ड प्रस्तुत श्लोक में कवि ने भू, एध, स्पर्ध, गाधू, बाघृ, नाथू, नाघ, दध, स्कुदि आदि धातुओं के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। ये धातुएँ धातुपाठ में इसी क्रम एवं अर्थ में पड़ी गई कवित्व एवं पांडित्य का अद्भुत संयोग हमें धातुकाव्य के रचयिता में परिलक्षित होता है जो अन्यत्र दुर्लभप्राय है।