‘वासुदेवविजयम्’ के रचयिता वासुदेव का परिचय इस काव्य की पूर्ति करने वाले नारायण भट्ट ने धातुकाव्य में दिया है। कुछ विद्वानों के अनुसार ‘युधिष्ठिरविजय’ के रचयिता कवि वासुदेव, समान नाम एवं समान जन्मस्थान होने के कारण एक ही है, परन्तु अद्यावधि इस विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। ऐतिहासिकों ने इस कवि का समय पन्द्रहवीं शती निर्धारित किया है। ‘वासुदेवविजयम्’ काव्य को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि कवि वासुदेव अद्भुत वैयाकरण थे। जा वासुदेवविजयम् की विषयवस्तु : कवि वासुदेव द्वारा विरचित यह काव्य तीन सर्गों में विभक्त है। कवि ने पाणिनीयाष्टाध्यायी के चतुरध्यायात्मक लघुरूप की परिकल्पना कर उसके उदाहरणों को उपस्थापित करने के लिए ३ सर्गों के काव्य का प्रणयन किया। इस काव्य में कंस के अत्याचार, श्रीकृष्णजन्म, वसुदेव का नन्दगृहगमन, नन्दकन्यासहित वसुदेव का परावर्तन, कंस द्वारा देवकी-पुत्री की हत्या का प्रयास एवं कंस के हाथ से निकल कर आकाशस्थ देवी (कन्या) द्वारा कंस के मारने वाले की उत्पत्ति की आकाशवाणी तक की भागवतीय कथा वर्णित है। कथा की दृष्टि से यह काव्य अपूर्ण परिलक्षित होता है, इसीलिये नारायण भट्ट ने .इसके पूरक के रूप में धातुकाव्य की रचना की, परन्तु कवि वासुदेव के मुख्य ध्येय पाणिनीय सूत्रों के उदाहरणोपस्थापन की दृष्टि से काव्य में किसी प्रकार की अपूर्णता परिलक्षित नहीं होती है। शास्त्रकाव्य, सन्यानकाव्य, चित्रकाव्य तथा यमककाव्य २२५ भाषा : वासुदेवविजयम् की भाषा अत्यन्त क्लिष्ट है। इसके अर्थावबोध के लिए टीका की अत्यधिक अपेक्षा है। संभवतः इसी कारण कवि वासुदेव ने ‘पदचन्द्रिका’ नामक टीका भी इस काव्य की निर्मित की है। टीका के सहयोग से श्लोकार्थ बोधगम्य हो जाता है। व्याकरण जैसे क्लिष्ट शास्त्रीय विषय के उपस्थापन में दत्तावधान कवि भी स्थान-स्थान पर सरल एवं सरस श्लोक रचना कर बैठते हैं जो उनकी कवित्वशक्ति की परिनिष्ठता का परिचायक है। कंस के कारागृह में प्रसववेदनायुक्ता देवकी के वर्णन में कवि के पांडित्य के साथ-साथ कवित्व भी परिलक्षित होता है - मितपचंकिंचिदरुन्तुदं तां प्रसूतिजं दुःखमयांबभूव। चक्र ललाटम्तपभास्कराभं दधानमीशं शरणं गता सा।। (३५) (देवकी ने प्रसूतिजन्य प्राणान्तक क्लेश सहा तथा सूर्यवत् प्रकाशमान चक्र धारण करने वाले विष्णु की शरण में गयी)